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छानबीन आयोग, कर्मकाण्डी साबित न हो ? -रणधीर चौधरी

 

एक प्रश्न है जो मेरे मन मे बार–बार उठता आ रहा है । क्यों इस आयोग ने मधेश के जिलों में एक भी हेल्प डेस्क नही रखा उजुरी संकलन के लिये ?

क्या मधेश मे इन्टरनेट पर लोगों की पहुँच है जहाँ वो लोग अपनी उजुरी अनलाईन भर सके ?

क्यों पीड़ितो में यह अनुभूत नहीं हो पा रहा है कि इस आयोग द्वारा उन लोगो को न्याय मिल पाएगा ?  madhesh-aandolan-justice

रणधीर चौधरी
पुष्पकमल दहाल नेतृत्व का कांग्रेस–माओवादी सहित का गठबन्धन ने निर्माण के वक्त मधेशी मोर्चा के साथ ३ बुँदे सहमति किया था । उस सहमति के दूसरे बुंदा मे शहीद घोषणा और एक एक उच्चस्तरीय छानबिन आयोग गठन करने की लिखित समझौता की गयी थी । तीन बुंदे समझौता के तहत अब सिर्फ नेपाल के संविधान मे सार्थक संसोधन की आवश्यकता है ।
क्या है ये आयोग ?
नेपाल सरकार ने जाँचबूझ आयोग एन, २०२६ के दफा ३ के उपदफा २ द्वारा दिए गए अधिकार का उपभोग कर मिति २०७२ साल श्रावण से

दशकों बीत गए प्रतिवेदन तैयारी का और आज की तारीख तक किसी भी आम नेपाली को वह प्रतिवेदन पढ़ने तक का मौका नही मिल पाया है । सिंहदरवार के किस घर में और किस दराज मे वह प्रतिवेदन को रखा गया है किसी को अन्दाजा तक नही होगा
तराई, मधेश और थरुहट लगायत के क्षेत्र मे विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा किये गये आन्दोलन के क्रम मे हुए हिंसा, हत्या, तोड़फोड़, आगजनी लगायत की घटनाओं के सत्य तथ्य छानबिन कार्य किये गये मिति से ६ महीना भीतर प्रतिवेदन पेश करने के हिसाब से एक उच्च स्तरीय जाँचबूझ आयोग किया गया । यह आयोग सर्वोच्च अदालत के पूर्व न्यायाधीश माननीय श्री गिरीशचन्द्र लाल की अध्यक्षता में हुआ है । जिस में सूर्य कोइराला, नवराज ढकाल, सुख चन्द्र झा, सुजन लोप्चन, खुसी प्रसाद थारु एक सुरक्षा समन्वय महाशाखा, गृहमन्त्रालय के सह–सचिव हैं इस आयोग मे ।
नेपाल मे आयोग
नेपाल जैसे देश मे जब कभी भी कोई छानबीन आयोग की बात उठती है तो व्यक्तिगत हिसाब से मेरे भीतर नकारात्मकता डेरा जमाने लगती है । फिर भी इस आयोग से एक आस आवश्य है । वो यह है कि पिछले मधेश आन्दोलन के दौरान राज्य के बन्दुक से निकले नश्लीय गोलियाें ने ५२ वीर मधेशी आन्दोलनकारियों को मौत के घाट उतारा था । तब के मधेशी दल के नेता लोग चिल्लाते रह गये परंतु राज्यद्वारा किये गये एक भी गैरन्यायिक हत्याओ की छानबीन नहीं की गई और कहा जाता है कि आरोपित पीड़क को अगर दण्ड न मिले तो दण्डहीनता बढ़ती है और दण्डहीनता बढ़ने का मतलब किसी भी राज्य में कानून के शासन की खिल्ली उड़ाना ।
इसबार मधेश आन्दोलन मे मारे जाने वाले परिवार या कहें तो न्याय प्रेमियों के लिये यह सुखद खबर है कि कम–से–कम मधेश आन्दोलन के दौरान हुई घटनाओं की छानबी तो की जाएगी । परंतु शंका की भरपुर जगह है इस आयोग के क्रियाकलाप को ले कर आयोग के आयुक्तो पर फिर भी विश्वास करने की जगह है । आयोग गठन के दो महीने बाद सिर्फ इस आयोग के कामकाज करने का वातावरण निर्माण हुआ था । कार्यालय तक की व्यवस्था नहीं की गयी थी नेपाल सरकार की तरफ से । कर्मचारी करार मे भी आवश्यकता से ज्यादा ढीला सुस्ती होना राज्य की नीयत को खुद बया करता है । पचास से अधिक नेपालियों का कत्लेआम हुआ था राज्य के द्वारा । जिसका दस्तावेज सम्भवतः हरेक मानव अधिकार संस्थाओं के पास है । परंतु घायलो की सही संख्या अभी भी नहीं है किसी के पास । ऐसे में तराई मानव अधिकार रक्षक संजाल (थर्ड एलायन्स) मधेश के जिलाें में काम कर रहे मानव अधिकार संस्था ने अपनी अग्रसरता दिखायी थी आन्दोलन के दौरान घायलो का विवरण जमा करने में । पूरब से पश्चिम हरेक कसबों में जा–जा कर आयोग में उजुरी संकलन में सहयोग कर रहा है, दिन–रात एक करके । एक महीने की समय सीमा को बढ़ा कर आयोग ने १५ दिन का समय बढ़ाया था आयोग ने । परंतु यह समय सीमा भी कम पड़ रहा है उजुरी संकलन के लिये ।
एक प्रश्न है जो मेरे मन मे बार–बार उठता आ रहा है । क्यों इस आयोग ने मधेश के जिलों में एक भी हेल्प डेस्क नही रखा उजुरी संकलन के लिये ? क्या मधेश मे इन्टरनेट पर लोगों की पहुँच है जहाँ वो लोग अपनी उजुरी अनलाईन भर सके ? क्यों पीड़ितो में यह अनुभूत नहीं हो पा रहा है कि इस आयोग द्वारा उन लोगो को न्याय मिल पाएगा ? इस स्तम्भकार का अनुभव है जमीन पर रह कर पीड़ितो से बात चीत कर के लिया हुआ ।
वैसे तो नेपाल मे बडे बड़े आयोग गठन का इतिहास है । इस से पहले भी कई आयोग बने हैं । बड़े जोरशोर के साथ उन आयोगों ने काम किया था । प्रतिवेदन भी तैयार किया गया था । उन मे से दो आयोग है मल्लिक आयोग और रायमाझी आयोग । नेपाल के दो बड़े लोकतान्त्रिक आन्दोलन में राज्यद्वारा किये गये बल के अत्यधिक प्रयोग के कारण जो आन्दोलनकारी की जान गयी थी और जो लोग घायल हुए थे उन घटनाआें का अनुसन्धान किया गया था और आरोपित को सजा दिलवाने के लिये उन आयोगो ने काम किया था । परंतु दशकों बीत गए प्रतिवेदन तैयारी का और आज की तारीख तक किसी भी आम नेपाली को वह प्रतिवेदन पढ़ने तक का मौका नही मिल पाया है । सिंहदरवार के किस घर में और किस दराज मे वह प्रतिवेदन को रखा गया है किसी को अन्दाजा तक नही होगा । मैने बहुत बार उन प्रतिवेदन को अध्ययन के लिये उपलब्ध कराना चाहा पर असफलतारूपी इँट का प्रहार सहना पड़ा ।
उम्मीद की शमा
इतनी निराशा के बावजूद भी यही कहना चाहुँगा कि मधेश आन्दोलन में हुई घटनाआें की छानबीन के लिये जो आयोग बना है वह अपने आप मे एक काविले तारीफ पहल है । विश्वास करता हुँ कि यह आयोग कर्मकाण्डी नही साबित होगा । काठमाण्डौ से नीचे अभी तक नहीं आये आयोग के आयुक्त घाटी मे रह कर ही घटनाओं का अनुसन्धान नही करेंगे । आयोग अपने हरेक काम काज और प्रगति विवरण जनता को सुचित करेगा । राज्य के द्वारा बने इस आयोग से मनचाही सहायता मिलने में मुझे अभी भी आशंका है । क्योंकि जितनी भी घटना हुई उनमें से अधिकतम राज्यपक्ष के द्वारा ही हुआ है । दूसरी एक और अहम बात यह है कि ये आयोग उस आन्दोलन की घटनाओं की छानबीन करेगा जिस में नेपाल के हरेक नश्लीये नेताओ के द्वारा मधेशी और थारुओ के उपर अपना बन्दुक दम्भ का कहर ढाया था । स्वेच्छाचारिता की सीमाआें का उल्लंघन कर दमन किया था आन्दोलन में । तो भला ऐसे में राज्यपक्ष क्यों इसका साथ देगा ? फिर भी इस आयोग के बारे में दृढ़ता के साथ कर्तब्य पथ पर आगे बढ़ना है । आम जनता को भी इस छानबिन प्रक्रिया में अपना सहयोगी हाथ आगे बढ़ाना होगा । कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया टिकी है । हम उम्मीद करना न छोड़ें और दण्डहीनता को रोकने के लिये भी इस आयोग के हरेक कार्यों को बारीकी से देखना होगा हमें । जो कोई इस की सफलता में रुकावट डालेगा उन सब को जनता के बीच में लाना होगा ।
अन्त में भारत के मशहूर कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित कविता का एक छोटा हिस्सा रखते हुए अपने लेख को बिराम देना चाहुंगा । रोक हृदय में उसे, अतल से मेघ उठा जो आता है । घिरती है जो सुधा, बोलकर तू क्याें उसे गँवाता है ? कलम उठा मत दौड़ प्राण के कंपन पर प्रत्येक घड़ी । नहीं जानता, गीत लेख बनते–बनते मर जाता है ?

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