देश पुनः गृहयुद्ध की तरफ अग्रसर हो रहा हैं ः जिवछ यादव
नेपाल की राजनीति में विगत दो दशकों से उतार–चढ़ाव होता आ रहा हैं । इसका मुख्य कारण हैं बिदेशी शक्तियों का प्रभाब, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, उत्पीडन, शोषण, सभी प्रकारों के बिभेद, जातीय छुआछूत, बेइमानी, सत्ता की लडाई, नाताबाद, कृपावाद, जातिवाद, एकात्मक व केन्द्रिकृत शासन व्यवस्था आदि । इन्हीं समस्याओं के कारण मधेशी, आदिवासी जनजाति, दलित, मुसलिम, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, सीमान्तकृत जैसे समुदाय देश के शासन सत्ता में भागिदारी से बंचित रहे । औंर बाध्य होकर अपने हक एवम् पहचान कायम करने के लिए उन्हें आन्दोलन करना पड़ा । फलतः देश में माओवादी जनयुद्ध, मधेश जनबिद्रोह, दलित आन्दोलन हुआ । इन आन्दोलन के ग्यारह बर्षों के बाद देश को संबिधान सभा में जाना पड़ा । देश में दो–दो बार संबिधान सभा का चुनाब हुआ लेकिन दोनों संबिधान सभा से मधेशी आदिवासी जनजाति, दलित मुसलिम, पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक सीमान्तकृत आदि समुदायों की भावना अनुकूल संबिधान बन्ने नहीं दिया । खस मानसिकता से ओतप्रोत शासक इन समुदायों कि समस्याओं को सम्बोधन करने के पक्ष में कभी नही दिखें ।

तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपी ओली ने राजनीति तिकड़मबाजी से मधेशी आदिवासी जनजाति, दलित, मुसलिम, अल्पसंख्यक, पिछड़ावर्ग, सीमान्तकृत आदि समुदायों कि समस्याओं को दरकिनार करते कथित खस बाहुल्य संबिधान जारी किया । ओली का कहना है कि यह संबिधान विश्व का सर्वाेत्कृष्ट संबिधान है, अगर यह सर्बाेत्कृष्ट होता, तो वंचित एवम् बहिष्कृत समुदाय असन्तुष्ट क्यों होते ? देश में आन्दोलन क्यों होता ? मधेशी सपुत को शहादत क्यों देनी पड़ती ? सारी दुनिया जानती हैं कि इन समुदायों के साथ अन्याय हुआ हैं ।
चौतरफा दबाब के पश्चात दाहाल जी ने बाध्य होकर अगहन १४ गते संविधान संशोधन बिधेयक संसद सचिवालय में पञ्जीकृत किया हैं । लेकिन प्रतिपक्षी इसके प्रतिरोध में हैं । वे देश को अपने चंगुल में रखने के लिए मधेशी, आदिवासी जनजाति, दलित मुसलिम, पिछड़ावर्ग आदि समुदायों को अपनी मुठी में रखन के लिए, देश में उग्रवादी शासन कायम करने के लिए प्रतिरोध में उतरे हैं । उनकी कथनी व करनी से साफ दिखाई देता हैं कि देश पुनः गृहयुद्ध की तरफ अग्रसर हो रहा है । उन्हें समझना चाहिए कि विश्व इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है । हर जाति, समुदाय इस सदी में आत्मसम्मान व गौरव के साथ जीना चाहता हैं । अपने अधिकार व पहचान सहित गुजर–बसर करना चाहता है । शासन सत्ता में भागीदारी चाहता है । अतः मधेशी, आदिवासी जनजाति, दलित, पिछड़ावर्ग, अल्पसंख्यक, सीमान्तकृत आदि समुदायों की मांगों को सम्बोधित कर विद्यमान पञ्जीकृत विधेयक को पारित कर देश को गृहयुद्ध में जाने से रोकें ।
(जिवछ यादव राजनीतिक विश्लेषक हैं)

