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थोपा हुआ प्रयास देश को संवैधानिक संकट में धकेल सकता है : विनोद विश्वकर्मा

 

विनोदकुमार विश्वकर्मा,काठमांडू, १८ फरवरी |
संविधान संशोधन व चुनाव प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक सहमति बनाने की कवायद एक बार फिर गतिरोध का शिकार बनती दिख रही है । सतारुढ़ पार्टियां संविधान में दर्ज समय–सीमा के भतिर चुनाव कराने के लिए रूपरेखा तय करने में जुटी हैं । उधर मधेशी पार्टियों की दलील है कि संविधान संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद चुनाव संबंधी विधेयक पास होना चाहिए और स्थानीय निकायों के चुनावों की तारीख घोषित की जानी चाहिए । सत्ताधारी पार्टियों की चिंता यह है कि यदि वक्त पर चुनाव न हुए, तो संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है । इसलिए वे अपनी योजना की दिशा में बढ़ रही हैं ।

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प्रधानमंत्री दाहाल पंजीकृत संविधान संशोधन विधेयक को दरकिनार कर बार–बार कह रहे हैं कि देश में स्थानीय चुनाव मई या जून तक करा लिए जाएंगे । सत्तारुढ़ दल ने इस सिलसिले में मधेशियों के साथ ही एमाले से भी बातचीत शुरू कर दी है । हालांंकि तयशुदा समय पर चुनाव होने को लेकर संशय लगातार कायम है । हकीकत यह है कि देश ऐसे हर बडेÞ मुद्दे पर संशय में है, जिनका निपटारा चुनावों से पहले हो जाना चाहिए । पहली बात, मधेशी पार्टियां सीमाओं के पुनर्निधारण की मांग पर अड़ी है और उन्होंने इस संबंध में संविधान संशोधन होने तक चुनाव प्रक्रिया में शामिल न होने की चेतावनी भी दे रखी है । उनकी मांगों से सरकार भी सहमत है, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल एमाले संविधान संशोधन को अप्रासंगिक बताते हुए चुनाव कराने के पक्ष में है । दूसरी बात, इस बात पर भी अभी एक राय नहीं है कि चुनाव नई व्यवस्थाओं के अनुसार हों या पुरानी व्यवस्था पर । मधेशीयों को पुरानी व्यवस्था मंजुर नहीं है । वे इसे यथास्थिति को बढ़ाने बाला और परिवर्तन विरोधी मानते हैं । जबकि एमाले पुराने ढ़र्रे पर चुनाव चाहता है और नेपाली कांगे्रस भी बदलावों के लिए पर्याप्त समय की कमी का हवाला देकर एक तरह से विरोध में ही है । माओवादी केन्द्र अभी तक अनिर्णय की स्थिति में है । तीसरी बात, स्थानीय निकायों के प्रस्तावित स्वरूप पर लोकल लेवल रिस्ट्रक्चरिंग कमिशन की सिफारिशों पर भी आम सहमति नहीं दिख रही । खासकार मधेशी पार्टियां लोकल लेवल रिस्ट्रक्चरिंग कमिशन की रिपोर्ट पर आधारित सिफारिशों का विरोध कर रही हैं । उनका कहना है कि चुकि तराई के २० जिलों में देश की करीब ५१ प्रतिशत आबादी बसती हंै, इसलिए सभी स्थानीय निकायों में तराई के लिए ५० प्रतिशत सीटें तय होनी चाहिए । यह उनका वाजिब तर्क भी है ।
ये सारे मुद्दे जटिल हैं और इस बात की कोई संभावना नहीं दिखती कि इनका हल निकट भविष्य में निकल पाएगा । ऐसे हालात में यह सोचना होगा कि क्या सारे महत्वपूर्ण मसलों का हल निकाले बिना शांतिपूर्ण निष्पक्ष चुनाव संभव हो पाएंगे ? गौरतलव है कि ऐसा कोई थोपा हुआ प्रयास देश को संवैधानिक संकट में धकेलने बाला सावित हो सकता है । सवाल यह भी है कि क्या सभी पक्ष इस स्थिति की गंभीरता से भांप रहे हैं ? यदि नहीं, तो उन्हें इन पर गंभीरता से सोचना होगा । वरना फिर देश में २०१२ जैसा संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा ।
(विनोदकुमार विश्वकर्मा हिमालिनी के सहसंपादक हैं ।)

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