जानिए कब है 2017 की होली मनाने और होलिकादहन की शुभ मुहूर्त
११ मार्च ,आचार्य राधाकान्त शास्त्री
जानिए कब है 2017 की होली मानाने और होलिकादहन की शुभ मुहूर्त ।
इस वर्ष २०१७ के होली में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा रविवार 12 मार्च रविवार को सायं 6:45 से रात्रि 7:25 तक होलिका दहन कर लेना सबके लिए शुभद है
चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 13 मार्च सोमवार को होलिकोत्सव, रंगोत्सव, सर्वत्र होली, धुरेड्डी, फगुआ वसंतोत्सव एवं होलिका विभूति धारण:-
होली का वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक है, होली हमारे स्वर्णिम पौराणिक महत्व को दर्शाती तो इसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व भी है सामाजिक दृष्टि से बहुत विशेष है तो इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है इसलिए होली वास्तव में एक सम्पूर्ण पर्व है।
पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है जो इस वर्ष 12 मार्च रविवार को सायं 6:45 से रात्रि 7:25 तक कर लेना होगा ।और अगले दिन चैत्रकृष्ण प्रतिपदा 13 मार्च सोमवार को रंग अर्थत दुल्हैंडी का पर्व मनाया जायेगा ।
होलिका दहन की तिथि को माना जाता है सिद्ध रात्रि: होली का आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से भी बड़ा महत्व है होलिका दहन अर्थात छोटी होली की रात्रि को एक परम सिद्ध रात्रि माना गया है जो किसी भी साधना जप तप ध्यान आदि के लिए बहुत श्रेष्ठ समय होता है। होलिका दहन वाले दिन किए गए दान-धर्म पूजन आदि का बड़ा विशेष महत्व होता है। साथ ही सामाजिक दृष्टि से देखें तो भी सभी व्यक्तियों का आपस में मिलकर विभिन्न प्रकार के रंगों के द्वारा हर्षपूर्वक इस त्यौहार को मनाना समाज को भी संगठित करता है। इसके अलावा इस त्यौहार का एक वैज्ञानिक महत्व भी है होली पर्व का समय वास्तव में संक्रमण काल या ऋतुपरिवर्तन का समय होता है जब वायुमण्डल में रोग कारक जीव अधिक होते हैं जिससे यह समय रोग वृद्धि का भी होता है।
जो होलिका दहन कर समाप्त किया जाता है ।
वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग होता है जिसे आनंद या उल्लास कहते हैं लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का भी एक त्यौहार पूरी दुनिया में हिंदू धर्म के मानने वाले मनाते हैं। यह है होली का त्यौहार इसमें एक और रंगों के माध्यम से संस्कृति के रंग में रंगकर सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं वहीं दूसरी और धार्मिक रूप से भी होली बहुत महत्वपूर्ण हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वयं को ही भगवान मान बैठे हरिण्यकशिपु ने भगवान की भक्ति में लीन अपने ही पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका के माध्यम से जिंदा जला देना चाहा था लेकिन भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और प्रह्लाद के लिये बनाई चिता में स्वयं होलिका जल मरी। इसलिये इस दिन होलिका दहन की परंपरा भी है। होलिका दहन से अगले दिन असत्य पर सत्य की विजयोत्सव को रंगों से खेला व् मनाया जाता है इसलिये इसे रंगवाली वसंतोत्सव होली और दुलहंडी भी कहा जाता है।
होली पूजा का महत्व
घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति आदि के लिये महिलाएं और पुरुष इस दिन होली की पूजा करते हैं। होलिका दहन के लिये लगभग एक महीने पहले से तैयारियां शुरु कर दी जाती हैं। कांटेदार झाड़ियों या लकड़ियों को इकट्ठा किया जाता है फिर होलीका का स्वरूप मानकर प्रदोष काल या शुभ मुहूर्त में होलिका का दहन किया जाता है। और फिर अगले दिन पूड़ी, पुआ, खीर, मिठाई इत्यादि अपने कुल देवी देवताओं को समर्पित कर आपस में रंगोत्सव करते हुवे सब मिल बाँट कर मिठाई और खुशियां बांटा जाता है
होली वसंतोत्सव, रंगोत्सव आप सब के जीवन में ढ़ेर सारी खुशियां , प्रसन्नता और मिठास लाये , आप सबको होली की हार्दिक हार्दिक शुभकामना ,
आचार्य राधाकान्त शास्त्री



