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कन्या विद्यालयों की व्यवस्था हो – सीमा खान

Seema Khan
 

इक्कीसवीं सदी के नेपाली समाज में मुस्लिम महिलाएं हर क्षेत्रों में पिछड़ी हुई है । हां, नीति निर्माण के क्षेत्रों में किसी–किसी की पहुँच हो गई है, जिसे सकारात्मक रूप में लिया जा सकता है । लेकिन दो–चार की पहुँच कोई मायने नहीं रखती है । ये सिर्फ फोटो खींचने की बात होती है । मुस्लिम महिला खासकर शिक्षा, पहुँच व अधिकार में ज्यादा पिछड़ी हुई है ।

Seema Khan
कन्या विद्यालयों की व्यवस्था हो
– सीमा खान, अध्यक्ष, नेपाल मुस्लिम वेलफेयर सोसाइटी

मैं समझती हूँ कि उन्हें बहुत आगे बढ़ना और सशक्त भी होना है ।
जहां तक सवाल है शिक्षा का, तो मेरे ख्याल से मदरसा शिक्षा के साथ–साथ जेनरल, शिक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए । वैसे अभी दो प्रकार के मदरसे देखे गये हैं नेपाल में । एक है पढ़ानेवाले और दूसरे है– दिखाने वाले । जो मदरसा पढ़ानेवाले या पुराने है वे अच्छी तरह से शिक्षा दे रहे हैं । कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने पाँच कक्षा तक की मान्यता दी है । लोगों ने मदरसा को पंजीकृत किया । दूसरी तरफ सरकार भी उसी मदरसा को मदद करने लगी । लेकिन इस मदरसा में न विद्यार्थी है और न ही अच्छे शिक्षक हैं । यहां तक कि पाठ्यक्रम भी नहीं है । बस, कुरान की पढ़ाई मात्र होती है वहां । आज की बदलती दुनिया में सिर्फ कुरान पढ़ने से कुछ नहीं होेनेवाला है । वैसे मैं कुरान की विरोधी नहीं हूँ । मेरे कहने का आशय यह है कि सिर्फ कुरान पढ़ लेने से ही शिक्षा पूरी नहीं होती है । उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, पाइलट, वैज्ञानिक बनना है । इसलिए स्कूली शिक्षा अथवा जेनरल शिक्षा की आवश्यकता है । दूसरी बात यह भी है कि १०÷११ वर्ष होने के बाद ही लड़कियों को मदरसा में दाखिला कराया जाता है और मदरसा शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् उन्हें घर में रहने के लिए कहा जाता है । इसलिए यह जरूरी है कि मदरसा को शिक्षा के मूलधारा में लाया जाए । इसके साथ–साथ कन्या स्कूल की भी व्यवस्था की जाए । क्योंकि मुस्लिम लड़कियों को लड़कों के साथ पढ़ना वर्जित है ।
इसी प्रकार राजनैतिक पहुँच बढ़ाने हेतु आरक्षण की भी व्यवस्था होनी चाहिए । खासकर मुस्लिम बहुलता क्षेत्र के अनुसार चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण होना चाहिए । इसी प्रसंग में में कहना चाहूंगी कि जहां मुस्लिम महिलाओं की अधिकार की बात उठती है, तो यह तर्क दिया जाता है कि मुस्लिम महिलाओं में परदा की भी समस्या है । उन्हें समझना चाहिए कि इसमें कोई समस्या नहीं है । अगर बुरका पहननेवालों को कोई समस्या नहीं है, तो देखनेवालों को क्यों समस्या होती है । बुरके ने शिक्षा नौकरी, नेतृत्व किसी को भी नहीं रोका है । यह तो उनका सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकार है । इसलिए इस बुरका को बहस का विषय नहीं बनाया जाए तो ही बेहतर होगा ।

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