दिनभर प्रायः सड़क पर रहनेवाली चालक महिलाओं को शौचालय के समस्या से मलमूत्र दबाकर वा सहन करते हुए ड्राइविंग करने की बाध्यता है । बाहरी रूप से देखने पर उक्त समस्या उतनी विकाराल न दिखाई दे लेकिन वास्तव में चालक महिलाओं को कितनी हद तक दिक्कत होती होगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है । कई बार उनके वस्त्र तक गन्दे हो जाते हैं । ठंड के मौसम में पेशाब ज्यादा न हो इसके लिए वो कम मात्रा में पानी पीती हैं जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है
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शौचालय के अभाव में सेनेटरी पैड बदलने की समस्या तथा मलमूत्र दबाकर रखने से महिला चालक रोज ही कई संक्रमित रोग को बुलावा दे रही हैं । प्रायः टेम्पुचालक महिलाएँ सरकार की उदासीनता से चिढ़ी हुई हैं । चालक महिलाएँ आक्रोश जताती हुई कहती हैं कि– जनता के दुःखदर्द को न समझ पाने वाली सरकार से शिकायत करने का कोई अर्थ नहीं ।
काठमांडू के छाउनी रुट में चलानेवाली ३० वर्षिया बविता श्रेष्ठ पीडि़त लहजे में कहती हैं– अब तो जब भी कोई एनजीओ वाले आते हैं और समस्या पूछते हैं तो गाली देने का मन करता है । वो कहती हैं– शौचालय सभी स्थानों में नहीं हैं, पार्किंग के स्थानो में भी नहीं बनवाया गया है । मिन्सुलेसन के समय में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है । पैड बदलने के लिए शौचालय ही नहीं होता है अतः पार्किङ स्टेशन ही पहुँचना होता है । वे बताती हैं ठंढ में और भी दिकक्त महसूस होती है । जाडेÞ में बारÞबार पेसाब का प्रेसर होता हैं ऐसे में ड्राइविंग करना मुश्किल होता हैै ।
२४ वर्षिया वर्षा गौतम ९वीं तक पढ़ी हुई हैं । सिन्धुपालचोक की गौतम ४ वर्षों से टेम्पु चलाती आ रही हैं । अपनी समस्या बताते हुए वे कहती हैं कि– शौचालय गन्दा रहता है ऊपर से शौचालय के अभाव से सहन करके रहना पड़ता है । उनका मानना है कि अब के दस वर्षो में हम महिला चालक रोग से मर जाएगें । १४ नं. घुम्ती में चलानेवाली वे कहती हैं– स्टेशन से निकलने के बाद फिर वापस एनएसी पहुँचकर मात्र शौचालय प्रयोग करना पड़ता है । इस बीच कितना भी प्रेशर हो सहना ही पड़ता है ।
वर्ष ४० की सूर्य कुमारी कुँवर को शौचालय के अभाव से पेट दुखने की समस्या है । सार्वजनिक शौचालय में एक बार जाने का ५ या १० रूपया देना पड़ता है जो हमारे लिए महंगा है । वे शिकायत के लहजे में कहती हैं इतने वर्षों से सरकार व गैरसरकारी संस्थाएं समस्या मात्र सुनने के लिए आती है पर ऐसा नहीं करती कि प्रत्येक पड़ाव अर्थात स्टोपेज में साधारण शौचालय बनबा दें । वे प्रतिप्रश्न करती हुईं कहती हैं शौचालय समेत निर्माण न कर पाने वाली सरकार किस काम की ?
दिनभर प्रायः सड़क पर रहनेवाली चालक महिलाओं को शौचालय के समस्या से मलमूत्र दबाकर वा सहन करते हुए ड्राइविंग करने की बाध्यता है । बाहरी रूप से देखने पर उक्त समस्या उतनी विकाराल न दिखाई दे लेकिन वास्तव में चालक महिलाओं को कितनी हद तक दिक्कत होती होगी इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है । कई बार उनके वस्त्र तक गन्दे हो जाते हैं । ठंड के मौसम में पेशाब ज्यादा न हो इसके लिए वो कम मात्रा में पानी पीती हैं जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है ।
लगनखेल रुट में चलानेवाली २८ वर्षिया उर्मिला कार्की बताती हैं कि – शौचालय की सुविधा नहीं है । स्टापेजों में शौचालय न होने की वजह से पिसाब दबाकर ही रखना पड़ता है इसीलिए पानी पीने में डर लगता है । उनको पानी कम पीने की वजह से पैर दुखने की समस्या है । इसी प्रकार कलंकी ६ की ३६ वर्षिया बीणा रिजाल, सातदोबाटो १४ नं. रुट में टेम्पु चलाती हैं । १३ वर्ष से इस पेशे से जुड़ी रिजाल सफा परिवहन चालक संघ की कोषाध्यक्ष भी हैं । स्वयम् कोषाध्यक्ष होकर भी वे कहती हैं कि पैसा देने के बाद भी शौचालय की सुविधा अच्छी नहीं है । इस सन्दर्भ में यातायात मजदूर संगठन के अध्यक्ष मानबहादुर दर्लामी बताते हैं कि– शौचालय की समस्या विकराल है । महिला चालकों की शिकायतें बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार को कई बार ध्यानाकर्षण करवाने के बाद भी सरकार कान में तेल डालकर सोई हुई है । दर्लामी बताते हैं सरकार हर बार आश्वासन मात्र देकर भेज देती है ।
इस विषय में इलेक्ट्रिक वेहिकल एशोसीएशन नेपाल की मैनेजर यशोदा राई कहती हैं – महिला चालकों की तरफ से शौचालय सम्बन्धी शिकायत अभी तक हमारे यहाँ नहीं आयी है । वे कहती हैं कि इस सन्दर्भ में सभी सुनवाई इकाई समिति करती है । यद्यपि उन्होंने कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या होने के कारण सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए ।
मेडिकेयर नेशनल हस्पिटल एण्ड रिसर्च सेन्टर की सिनियर नर्स अमृता थापा ने बताया कि पानी कम पीने तथा पेसाब ज्यादा समय तक दबाकर रखने से महिलाओं को युरिन इन्फेक्सन होने का सबसे अधिक खतरा है । साथ ही शरीर में पानी कम होने से शरीर सुखा होने, पेट दुखने जैसे अन्य रोग लगने का खतरा उतना ही बना रहता है ।
Reporter Himalini |
Bijeta is known as a journalist, writer and has worked as sub editor in different magazines. she writes in maithili,Nepali and Hindi.