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बिबाद अवि बकी है

लक्ष्मणलाल कर्ण

 

संविधान निर्माण के क्रम कई महत्वपर्ूण्ा विषयों पर विवाद अभी ज्यों का त्यों ही बना हुआ है । बाहर कहने के लिए बडÞे दल के नेता चाहे जितनी डिंगे हाँक ले लेकिन यथार्थ कुछ और ही है । जिस तरह से बडÞे दलों के बडेÞ नेता कहते घुम रहे हैं कि ८० प्रतिशत काम पूरा हो गया है और सिर्फ२० प्रतिशत ही शेष रह गया है वह ठीक है लेकिन जिन २० प्रतिशत पर विवाद बना हुआ है वही ८० प्रतिशत से कहीं अधिक है । विवादित विषय इतने महत्वपर्ूण्ा है, जिनके बिना संविधान का काम पूरा हो ही नहीं सकता । और नहीं संविधान का प्रारम्भिक मसौदा ही तैयार हो सकता है । जिसका दावा बडÞे दल कर रहे हैं ।
संविधान निर्माण के क्रम में देखे गए विवादित विषयों पर सहमति जुटाने के लिए माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के संयोजकत्व में गठित उपसमिति ने कई विवादों पर सहमति बना ली है । इस समिति के पास २२० विवादित विषयों पर सहमति जुटाने की जिम्मेवारी दी गई थी । काफी बैठकों का दौर करने के बाद अब भी २० बडेÞ मुद्दों पर विवाद बना ही हुआ है । ये ऐसे मुद्दे है जिनपर लोकतंत्र के लिए जनआन्दोलन हुआ, माअेावादी का १० वर्षो का सशस्त्र संर्घष्ा हुआ, मधेश आन्दोलन हुआ, संविधान सभा का निर्वाचन हुआ । इन्ही मुद्दों पर सहमति होना अभी बाँकी है ।
शासकीय स्वरुप, निर्वाचन प्रणाली, प्रदेश संरचना जैसे मुद्दे इतने जटिल है कि इन पर सहमति होना मुश्किल दिखाई दे रहा है । हालांकि ये असंभव नहीं है । तीन बडे दल यदि इमान्दारी से संविधान निर्माण के काम पर ध्यान दे तो कुछ भी असंभव नहीं है । लेकिन हमे तीन बडे दल माओवादी, कांग्रेस और एमाले की नीयत पर ही संदेह है । अपने को बडÞा दल होने का दम्भ भरने वाली इन पार्टियों में जितनी सत्ता की भुख है, उसका भी यदि संविधान निर्माण की चाहत हो जाए तो एक महीने में ही विवाद सुलझ जाएगा । हमारा मानना है कि दुनियाँ में कोई ऐसा विवाद नहीं है, जिसे बैठकर बातचीत, आपसी विचार-विमर्श के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता है । बशर्ते इस ओर इमान्दारी से प्रयास हो । लेकिन तीन बडेÞ दल के शर्ीष्ा नेता नहीं चाहते कि विवाद आसानी से सुलझे । संविधान के प्रति तीन दलों की नीयत ठीक नहीं है । क्योंकि उनको संविधान की आवश्यकता ही नहीं । बिना वजह संविधान बनाने में देरी कर तीन बडेÞ दल सिर्फबारी बारी से सत्ता में जमे रहना चाहते हैं ।
ऐसे कई उदाहरण भी है । संविधान निर्माण में देखे गए विवाद को सुझलाने के लिए गठित उपसमिति की जब दूसरी बार समय सीमा बढर्Þाई गई तो उस दौरान एक भी बेठक नहीं हो पाई क्योंकि तीनों दल सत्ता के गंदे खेल में व्यस्त थे । इसलिए उन्हें संविधान बनाने की फर्ुसद ही नहीं । इसी तरह तीसरी बार भी बहुत कम बैठक हो पाई ।
इस समय उपसमिति के पास जो विवादित विषय बच गए है, उनमें संघ की शासन प्रणाली, निर्वाचन प्रणाली, मौलिक अधिकार, आत्मनिर्ण्र्ााका अधिकार व राजनीतिक अग्राधिकार, प्रस्तावना, संविधान संशोधन संबंधी व्यवस्था, संक्रमणकालीन व्यवस्था, नागरिक कर्तव्य, नेपाली सेना संबंधी व्यवस्था, राज्यपुनर्संरचना, व राज्य शक्ति स्वरुप, संघीय नेपाल के तहत प्रदेश का निर्माण, संघीय राजधानी, स्थानीय स्वशासन का निर्माण तथा क्षेत्र निर्धारण, विशेष संरचना संबंधी व्यवस्था, संघ, प्रदेश, स्थानीय तह, व विशेष संरचना का अधिकारों का बँटवारा, संघीय इकाइयों के बीच उत्पन्न विवाद समाधान संबंधी व्यवस्था, प्रदेशों की संख्या, सीमा व क्षेत्र, स्वायत्त क्षेत्र की सूची, संघ के अधिकारों की सूची व प्रदेशों के अधिकारों की सूची जैसे विषय शामिल है ।
-संवैधानिक समिति तथा विवाद समाधान उपसमिति के वरिष्ठ सदस्य रहे कर्ण्र्ााे बातचित पर आधारित) ििि

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