दमन और शोषण की उम्र लम्बी नहीं होती, इतिहास गवाह है : श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १९ जून | एक बार फिर सत्ता ने साबित कर दिया कि उनकी नजर और उनकी सोच मधेश के लिए जो कल थी वही आज है और आगे भी किसी बदलाव की सम्भावना नजर नहीं आ रही । मधेश को सत्ता ने खुद बाँट दिया है । सिर्फ क्षेत्र नम्बर २ के चुनाव की तिथि बढाकर आखिर सरकार क्या जताना चाहती है ? क्या मधेश में सिर्फ २ नम्बर प्रदेश को जनसंख्या के आधार पर क्षेत्र निर्धारण चाहिए ? क्या अधिकार और पहचान का मुद्दा सिर्फ क्षेत्र न. २ के लिए है ? क्या मधेश सिर्फ २ नम्बर क्षेत्र है ? चुनाव स्थगन अगर किया जाना था तो सभी क्षेत्रों में किया जाना चाहिए था, नहीं तो जिस तरह सेना के बल पर ही चुनाव सम्पन्न कराना है तो क्षेत्र नम्बर २ में भी कराया जाना चाहिए ।
मधेश को छावनी में तो परिवर्तित किया ही जा चुका है और अघोषित कर्फ्यू भी लागू ही है । ऐसे में सरकार आसाढ १४ गते आराम से चुनाव सम्पन्न करा सकती थी, फिर यह ढोंग क्यों ? एक तरफ यह माना जा रहा है कि राजपा के साथ कोई जनलहर नहीं है तो ऐसे में सरकार को चिन्ता करने की या दमन की नीति अपनाने की आवश्यकता ही नहीं है । किन्तु देखा जाय तो राजपा नेपाल की आम सभा के दौरान हुई नवलपरासी की घटना और उसके बाद गिरफ्तारियों का सिलसिला भी तयशुदा थी । प्रहरी के बल पर जहाँ एक पार्टी विशेष की सभा को सम्पूर्ण कराया जाता है वहीं दूसरी ओर उसी प्रहरी के बल पर मधेशवादी सभा को खण्डित करने की कोशिश की जाती है । शांतिपूर्ण कार्यक्रम में अचानक भगदड़ मचना और तत्काल ही प्रहरियों के द्वारा गोली प्रहार करना सब तय नजर आता है । राजपा के शीर्ष नेताओं को एक तरह से नजरबन्द कर के रखा गया है और कार्यकर्ताओं को असाढ १४ तक हिरासत में रखने की प्रबल सम्भावना दिख रही है । सेना और शक्ति के बल पर चुनाव कराने की जिद है सरकार की और साथ ही मधेशियों को खिलौना बना कर रखने की चाहत भी । सरकार कोई भी आए, चेहरे कोई भी हों नीयत सबकी एक है । मधेश की खीझ और असंतोष बढती जा रही है पर इसे गम्भीरता से सत्ता पक्ष की ओर से नहीं लिया जा रहा है जो निःसन्देह घातक है ।
दमन और शोषण की उम्र ज्यादा लम्बी नहीं होती इस बात का विश्व इतिहास गवाह है । और इतिहास से सीख लिया जाता है उसे अनदेखा नहीं किया जाता । इसी बीच भारत के पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग के भाषाई विवाद को जिस तरह से यहाँ समुदाय विशेष की ओर से अलग गोर्खालैण्ड की माँग से जोड़कर समर्थन किया जा रहा है यह पक्ष देश के हित में बिल्कुल नहीं है । क्योंकि कमोवेश मधेश की लड़ाई भी पहचान, अधिकार और भाषा से सम्बद्ध है और डा. राउत जैसा समूह स्वराज की माँग कर रहे हैं ऐसे में यह भावना और भी भडक सकती है । मधेशी दल या मधेश विखण्डन की बात नहीं कर रहा किन्तु इनकी माँग को बहुत पहले से विखण्डन की माँग कह कर प्रचारित किया जाता रहा है । कहते हैं जिनके मकान शीशे के हों उन्हें दूसरों के मकान पर पत्थर नहीं मारने चाहिए क्योंकि अपना मकान भी टूटने का डर होता है । मधेश की मिट्टी जब आन्दोलन के क्रम में रक्ताम्भ हो रही थी तभी यही लोग कहने वाले थे कि यह आन्तरिक मामला है इसमें किसी का हस्तक्षेप सहन नहीं होगा । रोज लाशें गिर रही थीं और आज दार्जिलिंग के मामले में जिनकी आँखें नम हैं वो उस वक्त मुस्कुरा रहे थे । मरने वालों को आम झरने की संज्ञा देकर मजाक उड़ाया जा रहा था । जनकपुर के विरोध प्रदर्शन में जिसतरह का क्रुर रवैया प्रशासन दिखायी है, महिलाओं को जिस तरह पुरुष प्रहरी के द्वारा आतंकित किया जा रहा है उस पर खामोशी क्यों ? क्या ये अपने नहीं हैं ? या इन्हें भी आयातीत ही कहा जाएगा । कल तक मधेशी की भूमि पर ललकारने वाले उपेन्द्र यादव जी को आज वहाँ की जनता सीमा पार की नजर आ रही है । मधेशी जनता की उम्मीद थे ये, पर इनकी नीति ने वहाँ की जनता को ही बाँट दिया है और इसका भरपूर फायदा अन्य को मिलने वाला है । एक गम्भीर जननेता से मधेश ने यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की थी । पहले भी मधेश अपने नेतृत्व की वजह से ही ठगा गया था और आज भी वो अपनी ही जगह कायम है ।
एक ही दिन में मधेश की धरती पर राजपा कार्यकर्ताओं की दो हजार से भी अधिक गिरफ्तारी हुई है और नवलपरासी से हुई गिरफ्तारी में कई लोगों की स्थिति अज्ञात है । क्या नेपाल का लोकतंत्र यही है ? सरकार को इन कार्यकर्ताओं को बिना शर्त तत्काल रिहा करना चाहिए ।


