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शुद्ध और अच्छी हिन्दी कैसे लिखें – ४

 

वर्तनी–सम्बन्धी अशुद्धियां–
वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियां, मूलतः संरचनात्मक अशुद्धि का ही अंग है । किसी शब्द में प्रयुक्त ध्वनियों का गलत उच्चारण अथवा किसी शब्द का उसके उच्चारित रूप से भिन्न रूप में लेखन ‘वर्तनी’ सम्बन्धी अशुद्धि के अन्तर्गत माना जाएगा । जैसे– सकूल (स्कूल) सवासथ्य (स्वास्थ्य), महिना (महीना), किरपा (कृपा) आदि ।
‘कि’ एवं ‘की’ का प्रयोग
– ‘कि’ योजक का काम करता है अर्थात् दो वाक्यों को जोड़ता है । जैसे– राम ने कहा था कि इस साल भी गरमी काफी होगी ।
– यदि वाक्य में ‘इसलिए’ का प्रयोग हो, तो ‘क्योंकि’ का प्रयोग न कर ‘कि’ का प्रयोग ही करना चाहिए । जैसे– जल, यौगिक इसलिए है कि इसमें हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु है ।
‘की’ का प्रयोग
– दो पदों के बीच संबंध दर्शाने में ‘ की’ का प्रयोग होता है । जैसे– हरि की बहन पढ़ने में काफी तेज है । रामनारायण की गाय बहुत दूध देती है ।
– ‘करना’ क्रिया के भूतकालिक रूप में भी ‘की’ का प्रयोग होता है । जैसे– मैंने लड़ाई नहीं की । मालिनी ने अच्छी पढ़ाई की थी ।
वाला÷वाली÷वाले÷ कर आदि प्रत्ययों का प्रयोग
– इन प्रत्ययों के प्रयोग में बड़े–बड़े लोग भी गलतियां कर बैठते हैं । इन प्रत्ययों में से वाला÷वाले÷वाली का प्रयोग विशेषण बनाने के लिए और ‘कर’ का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया या क्रियाविशेषण बनाने के लिए होता है । प्रत्यय कभी शब्दों से अलग नहीं लिखे जाते । जैसे– दूधवाला आया है । फलवाले ने अजीव आवाज निकाली । राम खाकर चला गया है । श्याम बैठकर खाता है ।
भी, तो, तक, भर, श्री, श्रीमती, जी का प्रयोग
– ये सभी बिना मिलाए अलग–अलग लिखे जाने चाहिए । जैसे– हरि भी, रोटी तो, पानी तक, नहीं दिया, शेर भर आटा, श्री, गुप्त, महामहिम जी, आदि ।
विसर्ग (ः) का प्रयोग
– कुछ लोग ‘दुःख’ में विसर्ग का प्रयोग करते हैं, किन्तु कुछ लोग नहीं । ऐसे ही कुछ लोग ‘छ’ः लिखते हैं तो कुछ लोग ‘छह’ तथा कुछ ‘छिः’ तो कुछ ‘छि’ । दुख हिन्दी का अपना शब्द बन गया है, और इससे ‘दुखिया’ जैसे हिन्दी के अपने ठेठ शब्दों का भी निर्माण हुआ है । अतः इसमें विसर्ग नहीं आना चाहिए । जहां तक ‘छः’– ‘छह’ तथा ‘छिः’– का प्रश्न है, दोनों ही काफी प्रचलित है । अतः इनके दोनों रूपों को स्वीकार किया जा सकता है ।
‘श’, ‘ष’ एवं ‘स’ का प्रयोग
– यदि किसी शब्द में ‘स’ हो और उसके पहले ‘अ’ या ‘आ’ हो तो ‘स’ नहीं बदलता । जैसे– दस (स के पहले ‘अ’)
पास, घास, विश्वास, इतिहास के पहले ‘आ’) ।
– यदि अ÷आ से भिन्न स्वर रहे तो ‘ष’ का प्रयोग होता है । जैसे– विषम, भूषण, प्रेषित, आकर्षित, हर्षित, धनुष, पुरुष, पौरुष, आभूषण, आकर्षण आदि ।
– ‘टवर्ग’ के पूर्व ‘ष’ का प्रयोग होता है । जैसे– क्लिष्ट, विशिष्ट, शिष्ट, नष्ट, कष्ट, भ्रष्ट आदि ।
– ‘ऋ’ के बाद ‘ष’ का प्रयोग होता है । जैसे– ऋषि, महर्षि, कृषि, पुष्टि, वृष्टि, कृषक, ऋषभ आदि ।
– आगे ‘चवर्ग’ रहने पर ‘श’ का प्रयोग होता है । जैसे निश्चित, निश्चिय, निश्चिंत, निश्छल आदि ।
यदि ‘श’ एवं ‘ष’ दोनों का साथ प्रयोग हो तो पहले ‘श’ फिर ‘ष’ का प्रयोग होगा । यदि ‘स’ भी रहे तो क्रमशः ‘स’, ‘श’ और ‘ष’ होगा । जैसें– विशेष, विशेषण, शेष, विशेष्य, शोषण, शीर्षक, विश्लेषण, संश्लेषण आदि ।
‘ब’ ओर ‘व’ का भ्रम
‘ब’ और ‘व’ के प्रयोग में सतर्क रहना चाहिए । ध्यान रहे कि संस्कृत में ‘ब’ का प्रयोग नहीं के बराबर होता है, ठीक इसके विपरीत हिन्दी में ‘ब’ का प्रयोग ज्यादा होता है ।
‘ब’ वाले संस्कृत शब्द– बंधु, ब्रह्म, बकुल, ब्राह्मण, आबद्ध, पदबंध, बर्बर, बाला, बलि, बीज, बालक, बालिका, प्रतिबिंब, बृहत्, ब्रह्माण्ड आदि ।
‘व’ वाले संस्कृत शब्द– वायु, विलास, वधू, वचन, वर्जन, विनय, व्यवहार, व्याज–व्याल, वंश, बन्दना, वदन, वत्स, वहन, निर्वहन, वक्र, व्यास, व्याधि, व्यथा, व्यवधान, स्वभाव, स्वर्ग, स्वान्त, स्वार्थ, स्वल्प, स्वाधीन, स्वस्थ, वंचना, वपु, वर्ण, वन्यं, वसुधा, विजय, वाचाल, व्यापक आदि ।
हिन्दी–उर्दू में प्रयुक्त ‘ब’ वाले कुछ शब्द
बसंत, बदमाश, बंदिश, बकरा, बंदूक, जवाब, हिसाब, किताब, बगावत, नवाब, बगदाद, बेवकूफ, बदजात, बज्र, ब्रज, बदतमीज, बदनसीव, बदहाली, बंदगी, बारात, बलात्कार, बला, बुलंद, बुनकर, बूढ़ा, बुढ़ापा, बीमार, बहुलीकरण, बनाना, बिगड़ना, बदसूरत, बंदा, बलशाली आदि ।
प्रस्तुतिः विनोदकुमार विश्वकर्मा

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