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बाँके बिहारी के दर्शन से हाेते हैं मनाेरथ पूर्ण

बांके बिहारी में समाहित हैं राधा कृष्‍ण दोनों

राधा-कृष्‍ण यानी आत्‍मा और परमात्‍मा। राधा ही एक मात्र ऐसा नाम है जो भगवान श्रीकृष्‍ण के नाम से पहले लिया जाता है। राधेकृष्‍ण! राधा के बिना कृष्‍ण अधूरे हैं और बिना कान्‍हा के राधा के अस्तित्‍व की कल्‍पना ही नहीं की जा सकती है। भगवान के ऐसे ही स्‍वरूप के दर्शन की कामना की थी संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्‍वामी हरिदास जी ने…भगवान की भक्ति में लीन स्‍वामी हरिदास जी जब भजन गाया करते तो कान्‍हा स्‍वयं इनके समक्ष प्रकट हो जाते। एक दिन हरिदास जी के शिष्‍य ने कहा कि आप अकेले ही श्रीकृष्‍ण के दर्शन का लाभ प्राप्‍त करते हैं कभी हमें भी प्रभु के दर्शन करवाएं। इसके बाद स्‍वामी जी अपने भजन गाने लगे। तब राधा-कृष्‍ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई।राधा-कृष्‍ण को युगल रूप में देखकर स्‍वामी जी की खुशी का ठिकाना न था। मगर वह मन ही मन इस दुविधा में थे, ‘मेरे भगवान आज साक्षात मेरे सामने युगल रूप में प्रकट हुए हैं। मैं क्‍या ऐसा करूं कि भगवान प्रसन्‍न हो जाएं।’ परेशान होकर वह स्‍वयं भगवान से ही पूछ बैठे, हे प्रभु मैं तो संत हूं, आपको तो लंगोट पहना दूंगा, लेकिन माता के लिए आभूषण कहां से लाऊंगा।अपने परम भक्‍त की इस दुविधा का समाधान करते हुए राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई।

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तब प्रकट हुआ बांके बिहारी का विग्रह स्‍वरूप

हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया। वृंदावन में बांके बिहारीजी के मंदिर में इसी स्‍वरूप के दर्शन होते हैं। यहां काले रंग की भगवान की प्रतिमा को आधा स्‍त्री और आधा पुरुष का रूप प्रदान किया गया है।मान्‍यता है कि बांके बिहारी के विग्रह में राधा और कृष्‍ण दोनों ही समाहित हैं और इनके दर्शन से दोनों के दर्शन का लाभ मिलता है। भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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