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नेपाल, मधेश और इतिहास का सच : अब्दुल खानं

 

यदि किसी दिन मधेश हमेशा के लिए नेपालियाे का क्षेत्र बन गया तो यह केवल मधेश का अंत नही होगा बल्कि भारत के लिए भी एक स्थायी खतरा बन जायेगा़ –

अब्दुल खानं, बर्दिया। पिछले दिनों नेपाल ने मधेश में दुरुत-गति का राजमार्ग का निर्माण कर न केवल मधेश पर अपनी पकड मजबूत कर ली है बल्कि इससे उसे वहाँ के खनिजो के दोहन का भरपूर अवसर भी मिलेगा। इससे नेपाल की सामरिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होगी जो चिन काेरिया जैसे कम्युनिष्ट देश से सम्बन्ध बना कर भारत के खिलाफ साजिस का अड्डा बन सक्ता है,यह भारत के लिए चिन्ता की बात होनी चाहिए। अाज कल चिन से रेल मार्ग बना कर नेपाल सिधा चिन से अायात निर्यात करने के समझाैते मे लगा है। भारत के खिलाफ नारेबाजी कर नेपाल मे बाम पन्थियाे ने लोकप्रियता हासिल करली है। भारत के प्रधान मन्त्री श्री नरेन्द्र माेदी जी का पुत्ला फुंककर नेपालियाे ने सिधा भारत के प्रति पच्क्ष हाेने का दावा किया है। नेपाल मे सरकार जिस कि सी के नेतृव मे क्याें न बने वह भारत के हित कर नही हाे सक्ते।

मधेश जैसा शांतिप्रिय देश आज नेपाल के सैन्यीकरण का मुख्य अडडा बन चुका है। जिस देश को दुनिया भगवान बुद्ध अाैर माता सीता के देश के रुप मे माना जाता था, आज वह बुद्घ का विज्ञापन कर डलर असुल करने का प्रयाेग शाला अाैर नेपालियाें का कचरा फेंकने का कूड़ा दान बन गया है। इसके कारण धीरे- धीरे मधेश , नेपाल का सीमा पर्वत अर्थात चुरिया पहाड का जंगल कट रहा है, वहाँ पर अनियन्त्रित बस्तियां बैठाई जा रही है, अवैध रुप मे बालु अाैर गिटंया उत्खनन् हाे रहा हैं जिस कारण पूरा मधेश जलासय के रुप मे बदल जाता है, उस का सिधा अाराेप भारत के उपर लगाया जाता है। उन सब नदियों का जल भयानक रूप से दूषित हो गया है, जाे मधेश के रास्ते बह रही हैं, ये नदियाँ शारदा, घाघरा, ब्रहमपुत्र, आदि दक्षिणी एशिया के अनेक देशों में बहती है, जिनमें भारत जैसे घनी आबादी वाले देश हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों ने भी नेपाल को विदेशी मुद्रा देकर यह छूट हासिल कर ली है कि वे मधेश में अपना अाैपनिवेशिक सेना का क्याम्प खडा कर सकें।
कहा जाता है कि जब सन १९२३ मे बेलायत सरकार द्वारा नेपाल काे सर्वभाैम का मान्यता दे दिया गया मगर जब भारत उपर से सन १९४७ मे चले गए मधेश काे क्याें नही मुक्त किया जब कि मधेश पर भी ईष्ट ईन्डिया कम्पनी सरकार का हुकुमत था।अंग्रेजाे ने मधेश के उपर सिर्फ शासन ही नही बल्की अपने स्वार्थ हेतु मधेश की भूमि ही सन १८१६ अाैर १८६० मे नेपालियाें काे दे दिया अाैर हम गुलाम बना गए। सन १९५५ मे नेपाल संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य हाेने से पहले सन१९५४ फेब्रुवरी २४ मे नेपाल से भुमि सिमा सम्बन्ध अाैर संघ के ७३ अनुच्छेद अनुसार की भुमी पडती या नही, तब नेपाल ने झुठ बाेला था तभी संघ का सदस्य बन पाया था उसका छान विन भी हाेनी चाहिए। भारत सरकार अाैर नेपाल सरकार के विच सन1950 में शान्ति अाैर मैत्री सन्िधी हुई थी वह भी लागू नही हाे रहा है। नेपाल का दावा रहा है कि मधेश उसका हिस्सा है, किन्तु अगर हम अतीत में लौटते हैं तो कई रोचक जानकारियां सामने आती हैं । मधेश और नेपाली लोगों का संबंध हजाराे हजार वर्षों से भी ज्यादा का रहा है। आम लोगों को शायद यह जानकारी नहीं होगी कि मधेशयाें का एक विशाल साम्राज्य हुआ करता था, जो नेपाल पर भी अपनि हुकुमते करते थे छठी सदि मे मधेश मे जय बर्धन शलेहश मधेश के राजा हुवे सन १०९७ मे नान्देव का शासन मधेश पर था उन कि राज धानी सिमराैनगढ़ थी सन ११११ मे उनहाेने नेपाल पर जीत हासिल कर अापना शासन कायम किया था | सन १३२४ मे मधेश का शासन दिल्ली का वादशाह गयासुद्दीन के हाथ मे अाया ,सन १५७७ मे बादसाह अक्बर का शासन मधेश पर था।१६ वी सदि मे मधेश मे सेन वंश का शासन था  उनहाेने सन १६६४ मे मुगल वाद शाह काे मालवाजी के रुप मे प्रति वर्ष १४ हाथ खडी दाे हाथी नजराना के रुप मे सेन राजा दे ते थे। लाेहागं सेन के समय मे मधेश का एकीकरण हुवा था चितवन से लेकर टिष्टा नदी तक उनका शासन था। वाद मे मधेश की भुमी ईष्ट- ईन्डिया कम्पनी के अधीन हुई कप्तान किनलाेक ने सिर्फ वारा पर्सा राैतहट से सालाना २४ हजार रुपये मालपाेत रकम असुल किया करते थे। सन १७७०-७१ मे गाेरखाली शासक दरभगां मे रहे अंग्रेजी अपसर मेजर केली के पास दिना नाथ उपध्धाय काे पृथ्वीनारायण शाह ने भेजा था पत्र मे कहा था जितनी राशी सेन राजा देते है उतना हम भी देगें यह प्रसताव कल्कत्ता मे रहे जनरल कार्टियर तक पहुचाया गया, अंग्रेज व्यापार के लिए काठमाडाैं घाँटी हाेकर तिब्बत जाना चाहते थे, तब तक नेपाल गाेरखालियाें के अधीन हाेगया था। मधेश मे काेई उत्तर अधिकारी न हाेने पर अंग्रजाे ने भाेग चल के लिए मधेश का भूखण्ड दे दिया। नेपाली लाेग ताे कहते है हम लाेग कभी भी अंग्रेजाे के अधीन नही रहे है, मधेश ताे रहा है फिर मधेश नेपाल का कैसा ?

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नेपाल के राष्ट्रियता अाैर क्षेत्रयता नामक पुस्तक मे फ्रेडरिक गेज लिखते है। सन १९९० तक मुलत भाषा के अाधार पर नेपाल कि राष्ट्रियता मानी जाती थी, अागे लिखते है मधेश बहुत हद तक उपनिवेश है बस थाेडा सिष्टाे मेटिक, सन १९५८ तक नेपाल घाँटी जाने के लिए मधेशियाे काे भिषा ( पार- पत्र) लेना पडता था।
अब्दुल खानं,बर्दिया।

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