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माँ कुष्मांडा करती हैं मनाेकामना पूर्ण

 

 

 

चौथे दिन पूजी जाती ये माता

नवरात्रि के चौथे दिन शक्‍ति के जिस रूप की आराधना होती है उसे कुष्‍मांडा कहते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि इस दिन साधक का मन अदाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और स्‍थिर मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा, उपासना के कार्य में लगना चाहिए। चतुर्थी के दिन मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग, शोक दूर होकर आयु और यश में वृद्धि होती है।

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माता की पूजा में प्रयोग करें ये श्‍लोक

इस दिन माता कुष्‍मांडा की पूजा के दौरान माता का एक श्‍लोक अत्‍यंत प्रभावी है। देवी की आराधना का यह श्‍लोक अत्‍यंत सरल और स्पष्ट है। इसे कंठस्थ कर के नवरात्रि में चौथे दिन इसका जाप करना चाहिए। ‘या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।’ श्‍लोक का अर्थ इस प्रकार है, हे मां सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। हे मां, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के रूप में पूजा जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी मां कूष्माण्डा कहलाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन जहां तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर होता है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। इससे माता प्रसन्न होती हैं, और मनवांछित फलों प्रदान करती हैं।

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