Sat. Feb 29th, 2020

प्रचंड की भारत यात्रा : वाक्पटुता की खाली टोकरी

from twit of indian PM Modi
डा.गीता कोछड़ जायसवाल,सीपू तिवारी | सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरे शीर्ष नेता श्री पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड ने भारत की चार दिवसीय यात्रा में थे, जिसके बाद वह चीन जाएंगे । अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य नेताओं से मुलाकात किया ।  इंडियन काउंसिल आफ वल्र्ड अफेयर्स और पीएचडी हाउस में कुछ व्याख्यान भी दिया ।
आधिकारिक तौर पर उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य “विकास” है, हालांकि इसका स्पष्ट रूप से विवरण नहीं दिया गया है । जैसा कि अधिकतम प्रकाश भारत के दौरे के बाद चीन की यात्रा पर डाला गया है, इसलिए इस यात्रा के वास्तविक उद्देश्य पर एक बड़ा सवाल है । क्या यह सिर्फ दोस्ताना बैठकों के लिए है और बढ़ते सहयोग के लिए नेपाल के सकारात्मक संकेत दिखाता है ? या ‘भारत को दूर किए बिना चीन से बंधने’ की एक भव्य रणनीति है ? दूसरे शब्दों में, भारत और चीन के बीच ‘पारगमन’ के रूप में कार्य करने की कूटनीति ।
पीएम ओली की इस साल जून में चीन की यात्रा के दौरान, ऐसा प्रतीत हुआ कि चीन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह भारत का विरोध कर के नेपाल के साथ संबंध बनाने का कोई इरादा नहीं रखता । इसके बजाय, एक त्रिपक्षीय सहयोग को लागू करने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसके लिए नेपाल को सक्रिय होने की सलाह दी गई थी । प्रचंड की वर्तमान यात्रा उस दिशा में एक कदम होगी इसकी अधिक संभावना है ।वह त्रिपक्षीय सहयोग यानी भारत चीन नेपाल पे सहमत होने के लिए भारत को लुभाने के सभी प्रयास करेंगे । दिलचस्प बात यह है कि चीन त्रिपक्षीय सहयोग की आड़ में बीआरआई परियोजनाओं को बढ़ावा देने के अधिक इच्छुक हैं, बजाए नेपाल पर अपना प्रभाव फैलाने के लिए भारत को विरोधी बनाने के । ध्यान देने योग्य बात यह है कि वह प्रचंड ही थे जिन्होंने बीजिंग में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए बेल्ट और रोड फोरम से दो दिन पहले मई २०१७ में बीआरआई पर चीन के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे ।
सैन्य गठबंधन या सैन्य सहयोग ः सतर्क पथ
यद्यपि उच्चस्तरीय नेताओं की पारस्परिक यात्राएं एक अच्छा संकेत है, लेकिन चीन के साथ नेपाल के दूसरे १० दिनों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से पहले प्रचंड की भारत यात्रा महत्वपूर्ण है । परंपरागत रूप से, भारत सभी सुरक्षा और रक्षा संबंधी उद्देश्यों के लिए नेपाल को समर्थन छतरी प्रदान करता है । भारत के करीबी मित्र के रूप में जाने जाने वाले प्रचंड, पिछले कुछ सालों से अपना प्यार बदल के चीन के प्रति कर चुके हैं । महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल में प्रचंड के नेतृत्व में माओवादी विद्रोह के दौरान, वह चीन ही था जिसने राजा ज्ञानेंद्र को माओवादी के खिलाफ लड़ने के लिए हथियार और गोला बारूद प्रदान किया था । फिर भी, वर्तमान में प्रचंड एक परिवर्तित व्यक्ति है जो अपने वैचारिक झुकाव को अपने पारंपरिक संबंधों से ज्यादा प्यार करते हैं ।
नेपाल के वर्तमान शासन के साथ निकट सैन्य संबंध बनाने की दिशा में चीन का झुकाव चीनी रक्षा मंत्री जनरल छाअंग वानछुवैन  की मार्च २०१७ में हुई तीन दिवसीय नेपाल सद्भावना यात्रा से स्पष्ट दिखाई देता है, जो १९ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल लेकर नेपाल पहुँचे थे । वह १६ साल के अंतराल के बाद नेपाल जाने वाले पहले चीनी रक्षा मंत्री थे । यह यात्रा चीनी पीएलए और नेपाली सेना के बीच पहली संयुक्त सैन्य अभ्यास “सागरमाथा मैत्री“  से कुछ समय पहले हुई थी ।
हालांकि, इस क्षेत्र में सैन्य गठबंधन को खोजने के लिए चीन में आंतरिक प्रवचन गर्म हो गया है । चीन में यथार्थवादी मानते हैं कि चीन को क्षेत्रीय और वैश्विक सुपर पावर स्थिति हासिल करने के लिए सैन्य गठबंधन बनाने की जरूरत है, जो की अमेरिका द्वारा चुना गया मार्ग भी था । परंतु जब चीन के अन्य देशों में सैन्य आधार होंगे और सभी सैन्य अभियानों में सहयोगियों को समर्थन मिलेगा, तब ही चीन नेतृत्व की स्थिति हासिल कर सकता है ।
चीन में विरोधियों ने इस तरह के दृष्टिकोण के खतरों की चेतावनी दी है । उनका प्रस्ताव यह है कि सैन्य संगठन के लिए किसी भी बड़े सैन्य समर्थन को देना खÞतरे से खÞाली नहीं है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि चीन का सोवियत संघ जैसे करीबी सहयोगी देशों के साथ युद्ध हुआ है । वास्तव में, राज्य व्यवहार क्षेत्रीय और वैश्विक परिवर्तन पर अत्यधिक निर्भर है । यहां तक कि अगर चीन ने पाकिस्तान या उत्तरी कोरिया के परमाणु कार्यक्रमों का समर्थन किया है, तो यह आवश्यक नहीं है कि वे चीन को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में मान्यता देंगे और पूर्ण समर्थन प्रदान करेंगे अथवा इस क्षेत्र में या उससे बाहर चीन के सभी सैन्य कार्यों का समर्थन करने के लिए खड़े होंगे । इसलिए, चीन के ‘सामान्य भाग्य के समुदाय’  बनाने के तहत सैन्य गठबंधन की तलाश करने के लिए किसी भी प्रकार की आक्रामक कार्रवाई को नापा तोला जाता है और चीन की सतर्क दृष्टिकोण लेने की संभावना अधिक है ।
नेपाल के लिए जोखिम बहुत अधिक हैं, क्योंकि चीन सिर्फ एक पास का सौहार्दपूर्ण पड़ोसी नहीं है, बल्कि एक शक्तिशाली ड्रैगन है जो की भारत सहित आसपास के सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बढ़ा रहा है । नेपाल में कई आवाजों ने हमेशा भारत के हितों से सावधान रहने के लिए अभिजात वर्गों को चेतावनी दी है । वह मानते हैं कि इससे अधिक निर्भरता हो सकती है और ’सिक्किम’ जैसी स्थिति हो सकती है, लेकिन वही आवाजÞें संभवतः ’ऋण जाल’ पर चुप रही हैं या ’तिब्बत’ की स्थिति पर कोई विचार प्रकट नहीं करती है। क्या यह ड्रैगन का डर है या दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का आकर्षण ? नेपाल स्पष्ट विकल्प बनाने की दुविधा में है । प्रचंड की वर्तमान यात्रा ’विकास’ के खाली वक्तव्य पर निर्भर है, मगर भारत या चीन को दोस्ती पर पूर्ण विश्वास की पेशकश नहीं करती है । जब तक कि प्रचंड ‘पारस्परिक विकास के लिए आपसी सहयोग’ के वादे पर कार्य करने और वितरित करने में सक्षम न हो, यह यात्रा केवल भारत के प्रति एक सद्भावना संकेत के रूप में ही रहेगी ।
डा.गीता कोछड़ जायसवाल
सीपू तिवारी
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