धन है तो यह दुनिया दनादन है, नहीं तो उजाड़ और वीरान वन है
समुद्र मन्थन करते समय जिन चौद्ह रत्नों की प्राप्ति हुई उनमें से लक्ष्मीजी और भगवान धन्वन्तरी भी है । पर लक्ष्मी जी की जयकारे के कारण धन्वन्तरी जी हाशिए पर चले गए हैं । लक्ष्मीजी अपने वाहन उल्लू पर सवार हो कर सभी को उल्लू बनाती हैं और जिस के धन यानी लक्ष्मीजी आ जाती हैं तो वह वास्तव में उल्लू ही बन जाता है उस के और दिमाग का खजाना धन्वन्तरी जी के पास ही रह जाता है ।
मन कड़ा हो या नरम सभी के पास हैं ही पर धन सभी के पास नहीं हैं इसी लिए सभी को धन अधिक मात्रा में चाहिए इसीलिए धनतेरस मना रहे हैं । भले ही इस के लिए कर्ज ही क्यों न लेना पडेÞ । पर धन तेरस मनाएगें जरुर और कर्ज में भी डूबेगें । पूरी दुनिया दिखावे पें मरी जा रही है और जो इस में अपवाद है उस को पागल करार दिया जाता है । नहीं तो चेतनशील मनुष्य आज का दिन आयुर्वेद के जन्मदाता भगवान धन्वन्तरी का जन्मदिन मनाता और अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखता । पर धन्वन्तरी किस चिडि़या का नाम है यह किसी को पता भी नहीं होगा । क्यों कि अब लोगों को हेल्थ नहीं सिर्फ वेल्थ चाहिए इसी लिए तो माता लक्ष्मी की जय, जयकार होती है, दीपावली धूमधाम से मनाई जाती है ।
समुद्र मन्थन करते समय जिन चौद्ह रत्नों की प्राप्ति हुई उनमें से लक्ष्मीजी और भगवान धन्वन्तरी भी है । पर लक्ष्मी जी की जयकारे के कारण धन्वन्तरी जी हाशिए पर चले गए हैं । लक्ष्मीजी अपने वाहन उल्लू पर सवार हो कर सभी को उल्लू बनाती हैं और जिस के धन यानी लक्ष्मीजी आ जाती हैं तो वह वास्तव में उल्लू ही बन जाता है उस के और दिमाग का खजाना धन्वन्तरी जी के पास ही रह जाता है । सभी को दिमाग हो न हो, बुद्धि हो या न हो, चेतना या जागरण हो या न हो कोई फर्क नहीं पड्ता है । पर धन, सम्पति जरुर होनी चाहिए । वह भी थोडा बहुत नहीं बहुतायत में हो तो अच्छी बात है । क्यों कि लोगों के पास सन्तुष्टि नाम का तुलसीदल ही नहीं जो उसे तृप्ति दिला सके ।
भगवान महावीर का पेट बहुत स्वादिष्ट खाना खा चुकने के बाद भी नहीं भर सका था । सभी हैरान थे अन्त में माता सीता ने जो भोजन में तुलसी का पत्ता डाल दिया हनुमान जी तृप्त हो गए । पर पैसा कमाने के दौड में तृप्ति या सन्तुष्टि का तुलसीदल कहीं खो गया है । इसी लिए चारों तरफ अराजकता मची है । हर कोई दूसरे को पछाड कर आगे निकल जाना चाहता हैं । भले ही इस में उस का तन और मन साथ न दें पर वहधनकमाने के लिएअपने तनऔर मन को भीतिलाजंली दे देता है । उस को लगता है कि जब धन आ जाएगा पास में तब तन और मन तो अपना ही है वह कहां जाएगा भला? इसी चक्कर में तन और मन स्वार्थी ईंसान का साथ छोड देता है और वह बीमार बन जाता है । जब तन और मन ही स्वस्थ्यन हीं रहेगें तो तो बाढ की तरह आए हुए धन का क्या फायदा ? धनकमाने से पहले दूसरों का मन जीतना जरुरी है और इस के लिए तन का स्वस्थ्य रहना जरुरी है ।
पर तन और मन को अनदेखा कर के सभी अंधी दौड़ में शामिल हैं । खुद का पैर नहीं हैं या पैर में जूता नहीं है इस का कोई मलाल नहीं है पर दूसरे को लगंडा देख कर लोग खुश हो जाते हैं कि देखो यह बेचारा तो दुखी है । दूसरों के दुख में खुद की खुशी तलाशने की यह कैसी मानसिकता पनप रही है जो ईंसान को बेचैन कर रहा है । तन और मन को रोगी बना लिया है और चले हैं धन कमाने । बीमार काया में सोने का आभुषण भी नहीं जंचता है । दांत और आंत का संतुलन होना चाहिएउसी तरह तन और मन के बीच में भी एक लय न हो तो चाहे जितना धन कमा लो सब क्षय हो जाता है । और क्षय करा रहा है आज की उपभोक्तवादी सोच और बजार । जिसकी मुठ्ठी पैसे से जितनी देर गरम रहती बजार की आग भी उसी को चारों तरफ से लपेट कर गर्माहट देती है । इसी लिए खाली मुठ्ठी या खाली जेब ईंसान को सिर्फ ठोकर खिलवाता है भोजन नहीं । पास में पैसा है तो यह दुनिया ईंसान के लिए एक तमाशा है अगर पैसे नहीं हैं तो दुनिया ईंसान को तमाशा या जोकर बना देती है ।
इसी लिए तो धन तेरस के दिन ईंसान के स्वास्थ्य के जन्मदाता भगवान धन्वन्तरी कहीं हासिए पर चले जाते हैं । दीपावली में लक्ष्मीजी के आगे भगवान बिष्णु को तो कोई नहीं पूछता है तो बेचारे धन्वन्तरी जी की क्या मजाल की वह हिलडूल भी कर लें । यह संसार ही लक्ष्मीजी की माया है । ईसी लिए तो बील गेट्स से ले कर मुकेश अबांनी तक मालामाल है । बांकी दुनिया कगांल भी है तो क्या फर्क पड्ता है ? धन तेरस के दिन सोने, चांदी या बर्तन के दुकान में लोगों का हुजुम होगा । पर कोई आज भूले से भी च्यवनप्राश या त्रिफला चूर्ण खरीद कर भगवानधन्वन्तरी को यादन हीं करेगा । क्यों कि लोगों के मन में यह भावना घर कर गयीं है कि अगर धनपास में होगा तो तन और मन को तो खरीदा भी जा सकता है । धन है तो यह दुनिया दनादन है नहीं तो उजाड और विरान वन है ।

