‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना में शामिल देशों के पीछे हटते कदम – डॉ. श्वेता दीप्ति
नेपाल सरकार को यह तय करना आवश्यक है कि विकास की राह प्रशस्त हो किन्तु अपनी स्थिति की मजबूती को बनाए रखने की शर्त पर

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,नेपाल पर बढता चीन का प्रभाव विकास की सम्भावनाओं के साथ कई बार कई सवालों को जन्म देता रहा है । अगर गौर से अध्ययन किया जाय तो कई अविकसित देश जो चीन का सहारा लेकर विकास की राह पर बढ़ने के लिए तत्पर हैं और चीन के सहयोग को स्वीकार कर आगे बढ़ चुके हैं। उनका मोहभंग होता नजर आ रहा है और वो पुनः एक बार इस विषय पर सोचने का मन बना रहे हैं । ऐसे में नेपाल को चीन पर निर्भर होकर विकास के सपने को देखने से पहले विश्व के अन्य देशों के अनुभवों का भी अध्ययन कर, सुरक्षित तरीके से अपने कदम बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हो रही है ताकि विकास हो, बरबादी नहीं ।
साल २०१३ में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी बहुचर्चित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना की घोषणा की थी तब दुनिया के ७० देशों ने इसका हिस्सा बनने की इच्छा जाहिर की थी । ये देश इस परियोजना को लेकर अगर खासे उत्साहित थे तो इसका बड़ा कारण इस योजना में चीन द्वारा लगाया जाने वाला बड़ा फंड था । इन देशों को लगा कि चीन के इस बड़े निवेश से उनकी अर्थव्यवस्था को नयी गति मिलेगी । साथ ही इस परियोजना से जुड़ना न केवल उनके घरेलू बाजार के लिए फायदेमंद साबित होगा बल्कि इससे उनके लिए दुनियाभर में आयात–निर्यात करना भी आसान हो जाएगा ।
लेकिन, अब इस परियोजना के शुरू होने के तीन साल बाद ही इसे लेकर इन देशों के रुख में बड़ा बदलाव आता दिख रहा है । विकास के सपनों के साथ भविष्य के सपनों की दुर्दशा भी नजर आने लगी है । जिसकी वजह चीन के द्वारा दिया गया कर्ज है । पिछले कुछ महीनों में कई देशों ने चीनी निवेश के कारण अपने ऊपर बढ़ते कर्ज को लेकर चिंता जाहिर की है । इन देशों ने आशंका जताई है कि कर्ज न चुका पाने की स्थिति में चीन इनकी संप्रभुता का उल्लंघन कर सकता है । यही वजह है कि इनमें से कुछ देशों ने अपने यहां बीआरआई के तहत प्रस्तावित कई प्रोजेक्ट रद्द भी कर दिए हैं ।
२०१४ में चीन ने मलेशिया में बीआरआई के तहत ५० अरब डॉलर से ज्यादा की परियोजनाओं में निवेश करने के लिए समझौते किए थे । लेकिन, बीते मई में हुए आम चुनाव में महातिर मोहम्मद की जीत ने काफी हद तक उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया । सत्ता में आने के बाद महातिर मोहम्मद ने सबसे पहले चीनी निवेश पर ही प्रहार किया है । उन्होंने करीब २५ अरब डॉलर की चीनी परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया । अगस्त में जब चीन की यात्रा पर महातिर मोहम्मद थे तो उन्होंने चीन से साफ शब्दों में कहा, ‘मलेशिया इतने ज्यादा कर्ज को चुका नहीं पाएगा और इसलिए ही हमने आपके कई प्रोजेक्ट रद्द किए हैं । फिलहाल हमारी प्राथमिकता कर्ज को कम करना है । अगर हमने अभी कदम नहीं उठाये तो हम जल्द ही दिवालिया होने की कगार पर पहुंच सकते हैं ।’
बताया जाता है कि केवल कर्ज ही नहीं, मलेशियाई प्रधानमंत्री को चीन से हुए समझौतों की शर्तें भी काफी अखर रही थीं । चीन के ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में ८५ फीसदी तक पैसा चीनी बैंकों का लगना था, जो मलेशिया को लोन के रूप में दिया जाता । लोन की शर्तों में लिखा था कि प्रोजेक्ट के ठेके चीनी कंपनियों को ही दिए जाएंगे । साथ ही प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूर और मैटेरियल भी चीन से ही आएगा । चीन की यह शर्तें सिर्फ मलेशिया के लिए नही होती हैं बल्कि वह जहाँ भी अपने पैसे लगाता है वहाँ उसकी शर्तें यही होती हैं ।
प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद मलेशिया में चीनी निवेश के फायदों को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं । एक साक्षात्कार में उनका कहना भी था, ‘यह चीनी निवेश तो उपनिवेशवाद का नया रूप है’ मुझे इससे मलेशिया को बचाना है । सरकार का काम देश में निवेश लाना होता है, न कि बाहर से मजदूरों को लाना । मेरा काम पूंजी और तकनीक देश में लाना है और अपने लोगों को अपने देश में ही रोजगार दिलवाना है ।’
प्रधानमंत्री महातिर की ये चिन्ता क्या नेपाल के परिवेश में भी सटीक नही बैठती ? जहाँ रोजगार की आवश्यकता है, जहाँ रोज युवा विदेश पलायन कर रहे हैं, जहाँ उद्योग धंधे ना के बराबर हैं वहाँ सरकार की पहली चिन्ता इन परिस्थितियों से निकलने की होनी चाहिए ।
मलेशिया द्वारा इसके प्रोजेक्ट रद्द होने का कारण इनकी बहुत ज्यादा लागत भी है क्योंकि मलेशिया यह समझ रहा है कि इस लागत के लिए जो रकम ली जाएगी वह मलेशिया के लिए चुकाना अत्यन्त कठिन है । तस्मानिया विश्वविद्यालय में एशिया संस्थान के निदेशक जेम्स चिन ने एक समाचार पत्र को बताया कि ‘महातिर मोहम्मद ने जो प्रोजेक्ट रद्द किये हैं, उनमें ‘ईस्ट कोस्ट रेल लिंक’ परियोजना भी शामिल है जिसकी लागत २० अरब डालर के करीब है । इस लिहाज से इसमें प्रति किलोमीटर रेल लाइन बनाने में औसतन ११० मिलियन डॉलर का खर्च आएगा ।’ चिन आगे बताते हैं, ‘अब आप बांग्लादेश की ‘पद्म रेल लिंक’ परियोजना को देखिये जिसे एक चीनी कम्पनी ही बना रही है । लेकिन, इसमें प्रति किलोमीटर रेल लाइन बनाने में औसतन केवल १० मिलियन डॉलर का ही खर्च आ रहा है ।’
जेम्स चिन मानते हैं कि दुनिया के अलग अलग हिस्सों में एक ही प्रोजेक्ट की अलग कीमत हो सकती है । लेकिन, कीमत में अंतर इतना बड़ा भी नहीं हो सकता जो बांग्लादेश और मलेशिया की रेल परियोजनाओं में है । चिन मलेशिया द्वारा रद्द किए गए अन्य प्रोजेक्ट्स की शर्तों को भी सही नहीं मानते । वे कहते हैं, ‘जो गैस पाइप लाइन प्रोजेक्ट रद्द किया गया है, उसकी शर्तें ऐसी थीं कि पाइपलाइन का केवल १३ फीसदी काम पूरा होने पर ही चीनी कंपनी के पास प्रोजेक्ट के कुल बजट का ९० फीसदी हिस्सा पहुंच जाता ।’
इसी तरह नेपाल के सन्दर्भ में अगर गम्भीरता से सोचें तो स्थिति लगभग एक सी है । चीन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता कहते हैं, “तिब्बत के ऊपर ल्हासा तक जो रेललाइन है उसे बढ़ा कर काठमांडू तक लाए जाने की योजना है । इसके लिए कई ब्रिज और सुरंगें बनानी होगी जो काफी कठिन काम के साथ साथ बेहद खतरनाक भी माना जाता है ।”
“इसमें काफी खर्च भी आएगा जो नेपाल की क्षमता नहीं है । उधार लेने की सूरत में नेपाल तीस–चालीस साल तक कर्ज चुकाता रहेगा । इसके बारे में नेपाल को सोचना होगा ।”
“फिर आगे ये रेल आएगी तो करेगी क्या ये भी सरकार को सोचना होगा. नेपाल के लिए चीन खरीदार नहीं लेकिन चीन के लिए नेपाल खरीदार है ।” इन तथ्यों पर नेपाल सरकार को मलेशिया की ही तरह सोचने की जरुरत है ।
मलेशिया के बाद बीआरआई में शामिल म्यांमार ने भी बड़े चीनी निवेश को लेकर पिछले सालों में अपनी चिंताएं जाहिर की हैं । चीन म्यांमार में गैस और तेल पाइप लाइन के अलावा कई और प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है । इनमें से एक प्रोजेक्ट म्यांमार के पश्चिम में स्थित क्याउकप्यू बंदरगाह के निर्माण का है । चीन के इस प्रोजेक्ट की कुल लागत ७.३ अरब डॉलर है ।
साल २०१६ में हुए इस समझौते के तहत बंदरगाह के निर्माण में ८५ फीसदी पैसा चीन देगा और १५ फीसदी म्यांमार को खुद वहन करना होगा । लेकिन, सितम्बर २०१७ में म्यांमार ने अचानक चीनी निवेश में कटौती किये जाने की बात करनी शुरू कर दी । म्यांमार ने चीन से लंबी बातचीत के बाद चीनी निवेश को ८५ फीसदी से घटाकर ७० फीसदी करवा दिया ।
म्यांमार सरकार से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि उनकी सरकार ने यह फैसला श्रीलंका से सबक लेकर किया है । श्रीलंका ने अपने हम्बनटोटा बंदरगाह के निर्माण के लिए चीन से एक अरब डालर का कर्ज लिया था, लेकिन यह न चुका पाने की स्थिति में उसे यह बंदरगाह चीनी कंपनी को ९९ साल की लीज पर देना पड़ा है ।
इस साल जुलाई–अगस्त में जब मलेशिया सहित कई देशों में चीन के निवेश के खिलाफ आवाजें उठीं तो म्यांमार ने एक बार फिर चीन से प्रोजेक्ट की कीमत पर बातचीत करने की अपील की । म्यांमार ने चीन से कहा कि उसे लगता है कि वह इतना कर्ज नहीं चुका सकेगा इसलिए बंदरगाह का निर्माण ७.३ अरब डॉलर की जगह १.३ अरब डॉलर में ही किया जाए ।
इस दौरान म्यांमार के उप वित्त मंत्री सेट आंग का रायटर्स को दिए साक्षात्कार में कहना था, ‘हमारी इस बारे में चीन से बात जारी है । हम भारी कर्ज से बचने के लिए प्रोजेक्ट की कीमत को घटाना चाहते हैं ।’ चीन म्यांमार में जितना बड़ा बंदरगाह निर्माण करना चाह रहा था उसकी जरुरत फिलहाल म्यांमार को नहीं है इसलिए म्यांमार ने इस प्रोजेक्ट पर फिर से विचार किया । विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि म्यांमार ने काफी सूझबूझ भरा फैसला लिया है । इनके मुताबिक चीन ज्यादा बड़ा और ज्यादा लागत वाला बंदरगाह म्यांमार की नहीं, बल्कि अपनी जरूरत के हिसाब से विकसित करना चाहता था ।
लेकिन, इसकी पूरी कीमत म्यांमार को कर्ज के रूप चुकानी पड़ती । दरअसल, चीन म्यांमार के इस बंदरगाह को मध्य एशिया और अफ्रीकी देशों से आने वाले अपने क्रूड आयल और अन्य चीजों के आयात–निर्यात के लिए इस्तेमाल करना चाहता है, ऐसे में इस बंदरगाह का ज्यादा बड़ा होना मुख्य रूप से उसके लिए ही ज्यादा फायदेमंद साबित होता । बिलकुल यही स्थिति नेपाल के केरुंग रेल परियोजना की है । इस परियोजना से चीन का एक ही मकसद है कि वो भारत के दरवाजे पर नेपाल के रास्ते अपना माल लाना चाहता है चाहे इसके लिए उसे नुकसान ही क्यों ना झेलना पड़े । यह नीति अपनाकर वह भारत पर भारतीय व्यापारियों के द्वारा यह दवाब भी बनाना चाहता है कि वह भारत को अपनी परियोजना में शामिल कर सके ।
पिछले साल ६ मार्च को अमरीका के तत्कालीन विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन ने कहा था, “चीन कई देशों को अपने ऊपर निर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है । वो जिन अनुबंधों को हासिल कर रहा है वो पूरी तरह से अपारदर्शी हैं । नियम और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है । बेहिसाब कर्ज दिए जा रहे हैं और इससे गलत कामों को बढ़ावा मिलेगा । उन देशों की आत्मनिर्भता तो खत्म होगी है साथ में संप्रभुता पर भी असर पड़ेगा । चीन में क्षमता है कि वो आधारभूत ढांचों को विकास करे, लेकिन वो इसके नाम पर कर्ज के बोझ को बढ़ाने का काम कर रहा है । “द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट का कहना है कि वन बेल्ट वन रोड में भागीदार बनने वाले आठ देश चीनी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं । ये देश हैं— जिबुती, कीर्गिस्तान, लाओस, मालदीव, मंगोलिया, मोंटेन्ग्रो, पाकिस्तान और तजाकिस्तान । शोधकर्ताओं का कहना है कि इन देशों ने यह अनुमान तक नहीं लगाया कि कर्ज से उनकी प्रगति किस हद तक प्रभावित होगी । कर्ज नहीं चुकाने की स्थिति में ही कर्ज लेने वाले देशों को पूरा प्रोजेक्ट उस देश के हवाले करना पड़ता है ।
चीन का एक करीबी मित्र पाकिस्तान भी इन दिनों चीन के साथ रिश्ते को लेकर थोड़ा असहज है । वैसे आर्थिक तंगी से जूझते पाकिस्तान को इस हालात से निकालने के लिए चीन ने अपना हाथ और साथ बढा दिया है ।
बावजूद इसके बीआरआई परियोजना को लेकर पिछले दिनों चीन को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पाकिस्तान ने भी इसे लेकर अपना रुख बदलना शुरू कर दिया था । पाकिस्तान की नई सरकार ने चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को लेकर कई तरह की आपत्तियां जताई हैं । सरकार का कहना है कि इतने बड़े चीनी निवेश को ब्याज सहित लौटाना उसके लिए आसान नहीं होगा और इसलिए कई चीनी प्रोजेक्ट्स के बजट पर दोबारा विचार करना जरूरी है । इमरान खान की सरकार ने चीनी बजट को कम करना भी शुरू कर दिया है । पिछले दिनों उसने कराची से पेशावर को जोड़ने वाली रेल परियोजना के चीनी बजट में दो अरब डॉलर की कटौती कर दी । चीनी निवेश को कम करने के मकसद से ही पाकिस्तान ने सऊदी अरब से सीपीईसी परियोजना का तीसरा साझेदार बनने की भी गुहार लगाई लेकिन, सऊदी ने इससे इनकार कर दिया ।
इमरान खान की सरकार ने इस परियोजना से जुड़ी शर्तों पर भी आपत्ति जताते हुए चीन से इनमें बदलाव करने की मांग की है । नई सरकार का मानना है कि पिछली सरकार सीपीईसी को लेकर जिन शर्तों पर तैयार हो गई थी, उनसे केवल चीन को ही फायदा हो रहा है । इस समय पाकिस्तान विदेशी मुद्रा के संकट से निपटने के लिए आईएमएफ के पास गया है । पाकिस्तान से जुड़े कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि पाकिस्तान की इस स्थिति के लिये चीन की सीपीईसी परियोजना से जुड़ी शर्तें भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं ।
कहा जा रहा है कि सीपीईसी में चीन के बड़े निवेश से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि इस परियोजना में मैन पावर से लेकर मटीरियल और मशीनरी तक सब चीन के ही इस्तेमाल हो रहे हैं । इस वजह से पाकिस्तान में जो निवेश आ रहा है वह आखिर में वापस चीन को ही मिल रहा है । ऊपर से पाकिस्तान पर कर्ज चढ़ता जा रहा है । मीडिया रिपोर्टों की मानें तो पिछले दो सालों में सीपीईसी के लिए पाकिस्तान को जो मशीनरी बाहर से मंगवानी पड़ी है, केवल उससे ही देश के चालू खाता घाटे में ५० प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है । इसके अलावा चीनी कंपनियों और उनसे जुड़े लोगों को टैक्स में दी जा रही भारी छूट और अन्य शर्तों से भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को अच्छा खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है । इसके तहत इन परियोजनाओं पर फिर से विचार किया जा रहा है ।
मलेशिया, म्यांमार और पाकिस्तान के अलावा चीन को इंडोनेशिया, लाओस, कजाखिस्तान और बांग्लादेश में भी अपने बीआरआई से जुड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है । इसके अलावा पिछले सालों में चीन ने मालदीव में भी बड़ा निवेश किया है । बीते सितम्बर में मालदीव में आम चुनाव जीतने वाली पार्टी के नेता मोहम्मद सालेह का कहना है कि मालदीव पर बढ़ रहे चीनी कर्ज को लेकर वे चिंतित हैं और इस मामले पर जल्द ही कुछ करेंगे ।
इन सारे तथ्यों को देखते हुए नेपाल सरकार को यह तय करना आवश्यक है कि विकास की राह प्रशस्त हो किन्तु अपनी स्थिति की मजबूती को बनाए रखने की शर्त पर । जिसके लिए ऋण की प्रकृति पर गम्भीरता से विचार कर देश को आने वाले समय में बंगलादेश वाली स्थिति से बचाकर आगे की नीति तय करने की आवश्यकता है । चीन के केरुंग से काठमाण्डू रेल मार्ग निर्माण २.५७ खरब रूपये खर्च का अनुमान है । चीन द्वारा अनुदान देने की संभावना समाप्त हो चुकी है । सरकार की नीति है कि वो हर वर्ष वार्षिक २८ अरब ५५ करोड़ रूपये निवेश करेगी । विकास नेपाली जनता की चाहत है, पर सही नीति और निर्माण के साथ न कि पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अस्तित्व को गिरवी रखने की हालात के साथ ।

