चट्टान का दम्भ टूटता है पर नदी की धारा अपना रास्ता नही बदलती : प्राची शाह
कविता : प्राची शाह 
हम नदी हैं
चट्टान का दम्भ टूटता है
पर नदी की धारा
अपना रास्ता नही बदलती
तरल धार सघनता को पाकर भी अपनी आदत
नही भूलती।
वो पिघलती है बार बार
पिघलना उसकी कमजोरी नही उसकी हिम्मत है ।
वो अपनी पहचान नही भूलती
पिघल कर अपने उसी रूप में पुनः परिणत होती है ।
जो उसकी पहचान है ।
सृष्टि को बनाने की क्षमता
और अपनी पर आ जाये तो सब कुछ बहा कर
ले जाने की क्षमता
ये है उसकी पहचान ।
हम नदी हैं
बहना जानती हैं, बंधना नही
तट बिखर जाते हैं
पर बहाव नही रुकता
किनारे उतनी ही बनाओ
जिसे वो स्वेच्छा से स्वीकार करे
वरना तट का टूटना तय है ।
हम नदी है ।


