ओशो एक ब्रह्माण्डीय गुरु ! : अजयकुमार झा

‘प्रेम तुम्हें ध्यानस्थ बना देता है यदि वह ठीक दिशा में हो । ध्यान तुम्हें प्रेमपूर्ण बना देता है यदि वह ठीक दिशा में हो ।’
यह महावाणी ओशो की है । ओशो रजनीश (११ दिसम्बर, १९३१–१९ जनवरी १९९०) का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के जबलपुर (रायसेन जिला) कुचबाडा ग्राम में हुआ था । १९६० के दशक में ओशो, आचार्य रजनीश के नाम से, लोगों के दिलो में छाए रहे । वे संवोधि को उपलब्ध एक आध्यात्मिक सदगुरु थें । क्रांतिकारी महामानवीय, नये धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिये मशहूर थें, ओशो विश्व के सभी देशों में अपनी ओजपूर्ण तथा सुक्ष्मतम आध्यात्मिक व्याख्यान के लिए सम्मान के साथ आज भी याद किए जा रहे हैं । भगवान ओशो रजनीश ने प्रचलित धर्मों की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या की तथा होशपूर्ण कर्म, प्रेम, ध्यान और आनन्द को जीवन का प्रमुख आधार बताया ।
लोग ओशो को संत, सतगुरू, भगवान, दार्शनिक, विचारक, संबुद्ध रहस्यदर्शी के नाम से संबोधित करते हैं । जो भी हो, स्वीकार और इंकार के बीच, प्रेम और घृणा के बीच ओशो ऐसे निखर कर आए हैं जैसे मथनी से मक्खन । ओशो की यह खासियत लोगों में एक ओर जिज्ञासा पैदा करती है तो दूसरी ओर उन्हें हैरत में भी डालती है । ऐसा क्या है ओशो में जो उनसे पहले के और उनके समकालिक एवं आज के संतों में नहीं है । क्यों आज ओशो अपने देह त्याग के बाद भी इतने अधिक जीवंत एवं मौजूद दिखाई देते है ।
ओशो ने हर एक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और धार्मिक पाखंड का पर्दाफाश कर उसके मौलिक स्वरूपों का रहस्योदघाटन किया । सन्यास की अवधारणा को उन्होंने भारत की विश्व के लिए अनुपम देन बताते हुए सन्यास के नाम पर भगवा कपड़े पहनने वाले भगोड़े पाखंडियों की जड़े उखाड़ समाज को सामूहिक नपुंसकता से बचाया । ओशो ने सम्यक सन्यास को पुनर्जीवित किया। ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी है । ओशो की नजर में सन्यासी वह है जो अपने घर–संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए ।
ओशो कहते हैं—
“आपने घर–परिवार छोड़ दिया, भगवे वस्त्र पहन लिए, चल पड़े जंगल की ओर । यह जीवन से भगोड़ापन है । और वह सन्यास आसान है क्योंकि आप संसारिक समस्याओं से भाग खड़े हुए और अपनी जरूरतों के लिए संसार पर भार भी बने रहे और त्यागी भी । लेकिन ऐसा सन्यास आनंद न बन सका, रुग्न हो गया । सन्यास से वे बांसुरी के गीत खो गए जो भगवान श्रीकृष्ण के समय कभी गूंजे होंगे,मीरा के घुंघुरू में खनके होंगे, कबीर के साखी में आह्लादित हुए होंगे, बुद्ध के शान्ति में सराबोर हुए होंगे, नानक के पपीहे बन पीहु पीहु किए होंगे ।’’
ओशो सरस संत, प्रफुल्ल दार्शनिक और जीवंत सदगुरु हैं । उनकी काव्यात्मक भाषा शैली हृदय को स्पंदित करने वाली भावना की उच्चतम बिंदु है और विचारों को झँकझोरने वाली अकूत गहराई भी । उनका ज्ञान, सरल सुगम और सहज ग्राह्य है ।
ओशो ने प्रचलित धर्मों की आधुनिक, वैज्ञानिक व्याख्या की और व्यक्ति को उसकी अपनी आंतरिक क्षमता से अवगत करा बुद्धत्व का पथ प्रशस्त किया है । उन्होंने आदमी की पिच्छलग्गू प्रवृत्ति को ललकारा और उसकी अदम्य, अनंत ऊर्जा शक्ति को उजागर करके उसे एक गौरव दिया । अपने नए विचारों से बौद्धिक जगत को हिला देने वाले, भारतीय गुरु ओशो से अमेरिकी सरकार इस कदर प्रभावित हुई कि भय से उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा ।
आज से २५०० वर्ष पूर्व, सत्य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था । ईसा मसीह भी भारत आए थे ।
ईसा मसीह के १३ से ३० वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्लेख नहीं है । और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्योंकि ३३ वर्ष की उम्र में तो उन्हें सूली ही चढ़ा दिया गया था । तेरह से ३० तक १७ सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है, इतने समय वे कहां रहे ? उन्हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं । तथाकथित लोकतंत्र के रक्षक अपनी आधारहीन इशाईयत को धराशायी होते देख उन्हें अमेरिका लगायत सभी युरोपीयन देशों में प्रवेश निषेध करवा दिया । इधर भारत की सरकार तथा धर्मान्ध पंडितों ने भारत कुलभूषण, प्राज्ञ शिरोमणी, ब्रह्मस्वरूप ओशो का विदेशियों के द्वारा किए जा रहे अपमान सहते भी रहे और करते भी रहे । परन्तु जैसे सोना अग्नि में जलकर निखर जाता है वैसे ही अब ओशो विश्व मानस पटल पर सूर्य की भाँति दिखाई देने लगे ।
दुनिया भर में हुए संतों और आध्यात्मिक गुरुओ की श्रृंखला में वे एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनका बोला गया एक–एक शब्द प्रिंट, ऑडिओ और वीडिओ में उपलब्ध है । आज ओशो एक ऐसी शख्सियत हैं जिनको दुनिया भर में सबसे अधिक पढ़ा जाता हैं । उनकी किताबों का सबसे ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हो चुका है । उनकी पुस्तकों के लिए दुनिया की ५४ भाषाओं में २५६७ प्रकाशन करार हुए । ओशो साहित्य की सालाना बिक्री तीस लाख प्रतियों से अधिक हो गई । ओशो की पुस्तकों का पहला मुद्रण २५ हजार तक होना मामूली बात है । ओशो की पुस्तक ‘जीवन की अभिनव अंतदृष्टि’ सारी दुनिया में बेस्ट सेलर साबित हुयी है । वियतनाम और इंडोनेशिया में इसकी दस लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं ।
३ जनवरी, १९८६ को काठमांडू एयरपोर्ट पर प्यारे सदगुरु ओशो के पदार्पण का उत्साह था । विशिष्ट व्यक्तियों के स्वागत की नेपाली परंपरा के अनुसार पानी से भरे १०८ कलश एयरपोर्ट के आगमन द्वार से पार्किग एरिया तक दो कÞतारों में लगे हुए थे—और उनके पीछे सैकड़ों पूरबी पश्चिमी संन्यासियों का समूह नाच गा रहा था । रंग बिरंगी तख्तियां गर्व से घोषणा कर रही थी, “बुद्ध की धरती नए बुद्ध का स्वागत करती है ।”
नेपाल की मिट्टी में अध्यात्म की विशेष संभावना की भविष्यवाणी ओशो ने उसी समय किया था, जो आज आनंद मैत्रेय और आनंद अरुण जी के अथक प्रयास से संभव होते दिख रहा है । ‘वोधिसत्व आनंद अरुण द्वारा संचालित तपोवन’ और आचार्यश्री ‘आनंद मैत्रेय के संयोजकत्व में संचालित ओशो धारा गंगोत्रिधाम’ (सौराहा) से जुड़े सैकड़ो आचार्य, आचार्यश्री तथा लाखों नेपाली सन्यासी और हजारों ध्यान केन्द्र, ध्यान की अलख जगाते हुए नेपाल के हर शहर और टोल में मिल जाएंगे ।
परमगुरु ओशो का नेपाल और भारतवासियों के लिए
सन्देश !
इतना ही कहना चाहता हूँ भारत से कि तुम अपने असली चेहरे को पहचानो । तुम गौतम बुद्ध के देश हो, तुम कृष्ण के देश हो, तुम पतँजलि के देश हो । तुमने उन सितारों को जन्म दिया है, जिनका कोई मुकाबला दुनिया में नहीं है । सारे आकाश के तारे तुम्हारे तारों के सामने फीके हैं । तुम जागो ताकि दो कौड़ी के राजनीतिज्ञ तुम्हारा और तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों का शोषण न कर सकें, ताकि अन्धे लोग आँखवालों के देश का मार्गदर्शन न कर सकें । तुम जरा उन सारी सुगंधों को फिर से याद करो— उपनिषदों की गूँज, कबीर के गीत, मीरा के नृत्य, तुम अद्वितीय हो !
छोटे–मोटे लोग तुम्हारे ऊपर अधिकार किए बैठे हैं । इन्हें उतार फेंको । तुम्हारा देश अभी भी बुद्धिमानों से खाली नहीं है । लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति चुनाव में भीखमंगों की तरह तुम्हारे पास वोट माँगने नहीं आएँगे । जो तुम्हारे पास वोट माँगने आए, उसे वोट मत देना । जिसे वोट देने योग्य समझो, उसके पैर पड़ना, उसे समझाना–बुझाना कि तुम खड़े हो जाओ, हम तुम्हें वोट देना चाहते हैं । जो तुम्हारे पास वोट भीख माँगने आता है, वह दो कौड़ी का है । जिसकी कोई कीमत है और जिसकी कोई आत्मा है और जिसका कोई स्वाभिमान है,वह तुमसे भीख माँगने नहीं आएगा । तुम्हें उससे जाकर प्रार्थना करनी होगी । भारत को एक नए ढंग का लोकतंत्र दुनिया को देना होगा, जहाँ नेता भीख नहीं माँगता, जहाँ जनता बुद्धिमानों को, विचारशीलो को प्रार्थना करती है कि थोड़ा–सा समय, थोड़ी–सी बुद्धिमत्ता इस गरीब देश के लिए भी दे दो।
अमृता प्रीतम के द्वारा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विशाल जनसमूह के सामने दिया गया ओशो रजनीश का भावपूर्ण परिचय प्रस्तुत कर रहा हूँ।
‘पूरे चांद की रात जब सागर की छाती में उतर जाती है, तो अहसास की जाने कैसे इंतहा उसके पानी में लहर–लहर होने लगती है । कुछ उसी तरह की घटना होती है जब रजनीश जी की आवाज, सुनने वाले की रगों में उतरती है और अंतर्मन में जाने कितना कुछ भीगने और छलकने लगता है । एक सरसराहट पैदा होती है, जब बहती हुई पवन पेड़ के पत्तों में से गुजरती है । लेकिन वो सरसराहट एक टकराव से पैदा होती है । पवन के और पत्तों के टकराव से ।
‘एक नदी के पास बैठ जाएं तो कलकल का एक नाद सुनाई देता है,वीणा के तार, शंख की नाद, इन सब ध्वनियों की ओर संकेत करते हुए रजनीश हमें वहाँ ले जाते हैं, नानक के एक ओंकार की ओर जहां हर तरह का टकराव खो गया, द्वैत खो गया । जहां शक्ति कणों ने एक आकार ले लिया, एक ध्वनि का, ओंकार की ध्वनि का । इसी ध्वनि को गुरु नानक ने सत्तनाम कहा, एक संकेत दिया जहां दुनिया के दिए हुए सभी नाम खो जाते हैं। एक ही बचता है(इक ओंकार सतनाम। इक ओंकार सतनाम ।
‘रजनीश जी की आवाज हमें सत्त और सत्य के अंतर में ले जाती है । जहां विज्ञान अकेले मस्तक के माध्यम से सत्य को खोजता है और कवि अकेले मन के माध्यम से सत्त को खोजता है । मन और मस्तक अकेले–अकेले पड़ जाते हैं । और रजनीश एक संकेत बन जाते हैं नानक के उस अंतर्अनुभव का, जहां दोनों का मिलन होता है । विज्ञान और कला का द्वंद्व खो जाता है और हम ओंकार में प्रवेश करते हैं ।
‘रजनीश जी की आवाज जब बहती हुई पवन की तरह किसी के अंतर में सरसराती है, एक बादल की तरह घिरती हुई बूंद–बूंद बरसती है, और सूरज की एक किरण होकर कहीं अंतर्मन में उतरती है तो कह सकती हूं वहां चेतना का सोया हुआ बीज पनपने लगता है । फिर कितने ही रंगों का जो फूल खिलता है उसका कोई भी नाम हो सकता है । वो बुद्ध , महावीर , कृष्ण और नानक होकर भी खिलता है ।’
‘अलौकिक सच्चाइयां जो दुनियावालों की पकड़ में नहीं आतीं, उन्हें कहने के लिए कुछ प्रतीक चुन लिए जाते हैं । कुछ गाथाएं जोड़ ली जाती हैं, जो सच्चाइयों की ओर एक संकेत बनकर सदियों के संग–संग चलती हैं । ये गाथाएं लोगों के अंतर में सोई हुई संभावनाओं को जगाने के लिए होती हैं । लेकिन जब संप्रदाय बनते हैं, नजर और नजरिया छोटी–छोटी इकाइयों में सीमित होता चला जाता है, तो प्रतीक रह जाते हैं, अर्थ खो जाते हैं। और लोग खाली–खाली निगाहों से हर प्रतीक को नमस्कार करते हैं लेकिन उसी तरह उदासीन बने रहते हैं ।
‘कोई नाम, कोई सत्य अपना नहीं होता जब तक वह अपने अनुभव में नहीं उतरता। इसी अपने अनुभव की बात करते हुए मैं कह सकती हूं कि मैं जब भी नानक को समझना चाहती हूं तो देखती हूं कि रजनीश वहां खड़े हैं । मुझे संकेत से वहां ले जाते हैं जहां नानक के दीदार की झलक मिलती है ।
‘मैं कृष्ण को समझना चाहती हूं तो पाती हूं कि सामने रजनीश हैं और फिर वो मुस्कराते से कृष्ण की ओट में हो जाते हैं । वो बुद्ध के मौन में भी छिपते हैं और मीरा की पायल में भी बोलते हैं ।’
‘जपुजी की आत्मा में उतरना हो तो मैं समझती हूं कि इस काल में हमें रजनीश जी की आवाज एक वरदान की तरह मिली है जिससे हमारी चेतना का बीज इस तरह पनप सकता है कि हमारे भीतर नानक खिल जाएंगे, इक ओंकार खिल जाएगा।’ (अमृता प्रीतम)
ओशो पर बोलते हुए ‘पूज्य मोरारी बापू’
मैंने ओशो के दो बार दर्शन किए, दो बार उन्हें सुनने का मौका मिला ।
एक बार मुंबई में व दूसरी बार पुणे में । मैं गया, लेकिन मेरा दुर्भाग्य तो नहीं कहूं, लेकिन वह सीरीज, वह प्रवचनमाला अंग्रेजी में थी । लेकिन शब्द समझ में नहीं आए तो क्या चिंता, एक नाद, देवीय आवाज, जो श्रवणपुट को प्रसन्न कर रही थी, वह आनंद मैंने लूटा । आज मैं उस पर बहुत जिम्मेदारी से बोलना चाहता हूं, ओशो केवल पंचभौतिक शरीर नहीं थे, आप सहमत हो न हो इसकी मुझे कोई चिंता नहीं मैं तो २० मिनट बोल कर निकल जाऊंगा ।
आगे वह ओशो के बाबत कहते हैं कि इस विश्व की चोखट पर बहुत उजाला है इसलिए कहना चाहिए कि एक पृथ्वी नामक ग्रह से कोई गुजरा है । ओशो यहां से पास हुए हैं । ओशो को सुनना फैशन नहीं होनी चाहिए, ओशो को फैशन से सुनना ओशो परम तत्व का अपमान है । ओशो को स्वभाव से सुनो, स्वभाव ही आत्मा के बिल्कुल निकट से निकट, ज्यादा परिचय करवा सकता है । ओशो के बारे में क्या कहूं यह मैं मेरी अपनी जिम्मेदारी से बोल रहा हूं, साहब । आप कबूल करें ना करें इसकी मुझे चिंता नहीं । कोई मुझे कहे कि ओशो के प्रति इतना बड़ा अहोभाव मुरारी बाबू प्रकट कर रहे हैं….तो कर रहा हूं ।
आज धर्म जगत में प्रवचन करने वाले रोज रात को अपने तकिए के नीचे ओशो की कैसेट सुनते हैं ।
ओशो की कैसेट सुनते–सुनते सुबह ९.०० बजे ओशो का पुण्य स्मरण किए बिना… तुम तुम्हारे नाम से सूत्रपात करते हो, इससे बड़ा अपराध कौन हो सकता है ? ओशो का नाम लेकर अहोभाव से कहना चाहिए कि ये विचार ओशो के हैं ।
ओशो के बारे में बोलने से आनंद आता है साहब । और जिस पर बोलने में आनंद आए, वह भजन है,वह साधना है । मैंने ओशो के बारे में एक कथा की है,पूना में ।
धर्म जगत को तकलीफ हुई है लेकिन…किसी को तकलीफ हुई तो हम करें भी क्या ? हम क्या कर सकते हैं ? मैंने यह पूरी कथा ओशो की समाधी को समर्पित की है । मेरा यह मनोरथ था, साहब । और कैंपस कथा का योग होगा तो “आई विल ट्राई” शुभ विचार जहां से मिले लेना चाहिए, तकिए के नीचे कैसेट डालकर सुनना, सुबह के प्रवचनों में उनके विचारों को डालना बिना नाम लिए कि, यह विचार ओशो के हैं । यह प्रज्ञा अपराध है । ओशो से बातें मिली तो इसमें शर्माने की बात क्या है…? तर्क उनका गजब का था, केवल उसको तार्किक कहना ओशो का अपमान है । ओशो ने सामान्य भोग की बात नहीं की है साहब । परम भोग की बात,परम को भोगो…किसी को किस साधना से परम को पाना है उसके लिए सभी गेट खोल दिए थे इस आदमी ने…पांच प्रकार से बने ,एक बुद्ध पुरुष ओशो है ऐसा कोई माने ना माने, मैं मानता हूं । आखिर में इतना ही कहना चाहता हूं कि इस आदमी ने आचार्य रजनीश के रूप में संसार में परिभ्रमण करके शिक्षा दी ।
भगवान रजनीश के रूप में पुणे में बैठकर उसने सबको दीक्षा दी । और साहब, ओशो के रूप में पूरे विश्व को प्रेम की भिक्षा दी । यही मुरारी बापू का ओशो है ।
मैं ओशो सन्यासियों से कहना चाहता हूं कि व्यास पीठ की तरह ही,ओशो पीठ स्थापित करके ओशो के विचारों को दुनिया में फैलाएं । उस पीठ का नाम व्यास पीठ देने की जरूरत नहीं है ओशो पीठ दीजियेगा, यह ओशो पीठ है । ओशो नाम की एक यूनिवर्सिटी होनी चाहिए, उसके लिए एक लाख रुपए का तुलसी पत्र (एक चैक देते हुए)आप इसे कबूल करें,ऐसी मेरी प्रार्थना है,आप इसको ग्रहण करें ।
इसी तरह राष्ट्र संत जैन मुनि तरुण सागर जी महराज ने ओशो पर बोलते हुए कहा कि भारत की भूमि ने ओशो के रूप में हमें दूसरा कोहिनूर हीरा दिया है । और ओशो ने भारत को कोहिनूर हीरो से भर दिया । जहाँ देखो वही गेरुए वस्त्र लगाए अपनी आँखों में प्रेम और करुणा लिए, होठो पे मधुर संगीत और मुखड़े पे दिव्य आभा मंडल लिए थिरकते पावों से जीवन का आनंद लुटाते हुए लाखों ओशो के सन्यासी मिल जाएंगे । ओशो ने विश्व मानवता को नाचत हुआ, झूमता हुआ,गाता हुआ, थिरकता हुआ धर्म दिया है । रुग्न मानवता के लिए आनंद के चरमोत्कर्ष का मार्ग दर्शन कराया है । जब पेड़–पौधे झूम रहे हैं, पक्षी गा रहे हैं, पशुएँ मस्त हैं, पहाड़ परम शान्त है, नदियाँ उमंगायित और उत्साहित हंै, सूरज और चाँद मुस्कुरा रहें हैं, तारे सितारे खुशियाँ लुटा रहे हैं, ग्रह–उपग्रह नाच रहे हैं फिर इन मनुष्यों को क्या हुआ ? ये इतने उदास और हताश क्यों हैं ? ओशो ने मनुष्यता की इसी रोग को मिटाने के लिए सुगम मार्ग रूपी अनेकों ध्यान विधियाँ दी । बुद्ध का सुत्र दिया । मृत्यु से अमृत का राह दिया । पत्थर से परमात्मा तक पहुंचाया । शिला में शिव का दीदार कराया । सम्यकता से समाधि तक पहुंचाया । द्रष्टा साक्षी और बोध हेतु होशपूर्ण बनाया । हमें गरिमावान और महिमावान बनाया । प्रेमपूर्ण बनाया ।
याद रहे ! सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं । यह भूमि दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्वी पर कहीं नहीं हैं । लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है ।



वाह! मन मन बाग बाग होगया। कैसे और किस अलफाजसे इस लेखकको शुकृया अदाकरु। शब्द नहि है। जितना कहुंगा कम होगा। आपको शत शत नमन करताहु अजय झाजी। आपका कलम सत्य और न्यायकेलिये सतत चलतारहे यहि हमसब ओशो सन्यासियोका शुभकामना है। आँप बिश्वको अपने लेखके माध्यमसे परम सदगुरु ओशोका देसना बताते रहिये और नवयूग निर्माणमे आगे बढते रहिये। ओशोके मार्ग और देसनाकोहि अबलम्बन करनेसे नवयूग निर्मान हो सकता है बाकी तो कचरा है। कोटि कोटि नमन परम सदगुरु ओशोको।