मेकअप
व्यग्ंय………..बिम्मी शर्मा

यह दुनिया मेकअप पर ही टिकी है । यदि दुनिया मेकअप से ढकी न होती तो ईतनी कुरुप और भद्धी लगती कि रहने के लायक नहीं रहती । मेकअप है ईसीलिए तो लोग मन में एक बात रख कर बाहर सबके सामने दूसरी बात शान से करते हैं और सामने वाला भी उनकी बातों को बिश्वास कर लेता है । क्योंकि सामने वाला भी वैसा ही ढोंगी और मेकअप कर के दूसरों को रिझाने वाला बंदा है । इसीलिए जो मेकअप करता है या कर रहा है वह दुनिया के साथ कदम और ताल मिला कर चल रहा है । यदि वह मेकअप न कर के अपने वास्तविक रुप में सब के सामने आ जाए तो यह दुनिया उसको पागल करार दे कर बहिष्कार कर देगी । ईसी लिए सुखी जीवन जीने के लिए मेकअप करना जरुरी है ।
मिस नेपाल के प्रतियोगिता में एक जज ने एक मेकअप वीहिन प्रतिभागी को उसके मेकअप न करने और चश्मा पहनने कि बात पर सवाल करते हुए कहा कि यहां बिना मेकअप कोई भी नहीं सहभागी हो सकता । इ स पर सोशल मीडिया में उस जज को सभी ने आडे हाथों लेते हुए लताडा । पर उस जज ने सही ही तो कहा था जब सुंदरी प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं तो मेकअप करके आना चाहिए । यह कोई वौद्धिक प्रतियोगिता नहीं है कि बिना मेकअप के सहभागी हो जाओ और सभी आप को हाय, हाय करने लगे । आपकी खोपडी के अदंर कितनी बुद्धि या गिद्धी है यह किसको पता है और यह कौन देखना चाहेगा ? सभी सुंदर चेहरे और शरीर के रसिया है और यही देखना चाहते है । ईसी लिए उस जज ने मेकअप कर के न आनेवाली प्रतिभागी को यह सवाल पुछ कर कुछ गलत नहीं किया । क्योंकि वह खुद ही उसी जमात से आती हैं जहां सुदंरता मेकअप पर बहुत तवज्जो दी जाती है । बेचारी जज ने तो अपनी औकात के अनुसार ही प्रश्न पुछा था । बिना मेकअप के वह जज भी तो चुडैल ही लगती होगी । अब एक चुडैल दुसरी औरत को भी चुडैल के ही रुप में देखना पसंद करती है न ?
जब एक मोटरसाईकिल के विज्ञापन में उसकी बडी को औरत के शरीर से तुलना कर के उस पर एक लचीले शरीर वाली औरत को लिटा कर दिखाया जाता है और सभी इस विज्ञापन को हीट बनाते है । तब कोई औरत या नारीवादी इसका विरोध क्यों नहीं करती कि एक मोटरसाईकिल से औरत की तुलना करना गलत है । तब तो मेकअप से लिपापुता हुआ उसका अर्धनग्न जिस्म सभी को भाया था । तब तो यह नहीं कहा कि यह समस्त नारी जाति का अपमान है । अब क्यों मेकअप न करके आने पर किए गए सवाल पर विरोध और गुस्सा कर रहे हो ? औरत को यह समाज और इसके नुमाईंदो ने ईंसान माना ही कब । वह तो मर्द के हाथ की कठपुतली रही हमेशा । औरत के पास दिमाग और मन भी है और यह मन नेह का प्यासा है । यह कब किसने माना और स्वीकार किया ? सभी तो औरत को एक देह से ज्यादा नहीं मानते । तब क्या किसी देह को क्या जवाब देना और अपना दिमाग दिखाने का अधिकार है ? देह को तो सभी के सामने मेकअप और गहने कपडों से लकदक हो कर सिर्फ प्रदर्शित होना है । किसी स्त्री देह को कोई अधिकार नहीं हैं अपने मेकअप न करने के कारणों का जिक्र करना ।
यदि सच में वह प्रतिभागी सक्षम थी और उसको मेकअप करना नापसंद था तो उसने उसी महिला जज को उस के सवाल के जवाब में यह क्यों नहीं कहा कि आपके लिए आप का चेहरा खिडकी(आंख), दरवाजे(मूंह) जैसा है इसीलिए उसको रगं रोगन कर के चमकाना चाहती है । पर मेरा चेहरा या आंख तो दुनिया को देखने, सोचने और समझने के लिए एक खिडकी है । मैनें अपने दिमाग का मेकअप किया हुआ है ईसी लिए चेहरे के मेकअप पर मैं ध्यान नहीं देती । मैं तन से नहीं मन से सुदंर होना चाहती हुं । तब उस जज का चेहरा देखने लायक होता । पर प्रतिभागी लडकी ने जहां पर अपनी वौद्धिकता दिखानी चाहिए थी वहां पर तो दिखाया नहीं । और शोसल मीडिया पर हायतौबा करने से क्या मतलब ? हां उस जज और उसकी वौद्धिकता को सभी ने जज कर लिया ।
क्यों किसी औरत के पहनने, ओढने और उसके श्रृगांर पर ईतना ध्यान दिया जाता है । जब कोई मर्द बिना किसी श्रृगांर के भी खुद को योग्य सावित कर सकता है तो औरत को क्यों नहीं मौका दिया जाता कि वह अपनी योग्यता से समाज में सम्मान हासिल करें न कि श्रृगांर और वस्त्र से । औरत को मर्द के हाथ का खिलौना मान कर उसी को जिदंगी भर रिझाने के लिए श्रृगांर, आभुषण और कपडे में खुद को जकड कर रख ले । यह एक औरत कि ईच्छा पर निर्भर होनी चाहिए कि उसको मेकअप करना है या नहीं । क्यों समाज और मर्द यह तय करे कि औरत गहने, कपडे और मेकअप में सज कर एक सलज्ज मुस्कान सहित सभी को मोहित करें ? पहले समाज और मर्द दोनो के दिमाग का मेकअप होना जरुरी है । तभी एक औरत ईस समाज में किना मेकअप के भी सुरक्षित रह सकती है । जो खुद अपने वास्तविक रुप, रगं को मेकअप से ढंक कर दिमागी रुप से अपने को बौना सावित कर रहे हैं ।

