हाय हाय ये महंगाई, आजकल टमाटर पर है छाई
व्यग्ंय……………..बिम्मी शर्मा
महंगाई का बिरवा हम में से किसी ने अपने घर में नहीं लगाया । पर यह अपने आप ही वनमारा झाडी जैसा उग कर और फैल कर सभी के मन को मार रहा है । महंगाई में किसी का वश नहीं होता पर जिसका वश नियन्त्रण हो सकता है वह करना नहीं चाहता । क्योंकि इसके लिए कमीशन जो मिलते है । और कमीशन महंगाई से मीठी और प्यारी होती है जो महंगाई के लाखों एब को ढक देती है । जितनी महंगाई बढती है उतने काला बजारी करने वाले व्यापारियों की चांदी होती है और सरकार भी मालामाल होती है । क्योंकि चुनाव के समय यही काले व्यापारी सरकार को मदद करते हैं । इस देश में बर्फ से ढकी संसार की सबसे उंची एक चोटी है जिसे माउंट एभरेष्ट या सगरमाथा कहते हैं । जिसमें चढ कर जीत हासिल करने के लिए इस समय विदेशी टुरिष्ट नेपाल आए हुए हैं । पर वह शायद नहीं जानते जिस सगरमाथा को वह इस सीजन में चढ कर संसार भर अपना नाम रौशन करना चाहते हैं । हम नेपाली बिना मौसम के ही हर सीजन में सगरमाथा चढते है फिर भी हमारा नाम कहीं नहीं आता या छपता । वह सगरमाथा है महंगाई की । जिसे हम नेपाली हर दिन हर क्षण चढ्ते ही रहते है । महंगाई की सगरमाथा की लंबाई, चौडाई और उचाई अनंत है । कोई भी इसको नाप, जोख नही सकता । फर्क बस इतना है वह टुरिष्ट पसीना काढ्ते हुए सगरमाथा चढ्ता है और हम नेपाली जन आंसू की बूंद आंखाें से गिरा कर महंगाई की सगरमाथा की असंख्य सीढिंया चढते है । अभी महंगाई की सीढी चढ्ते हुए टमाटर का भाव तिगुना बढ गया है । रसोई की शान टमाटर अब ड्राईगं रुम की शान बन गया है । अब टमाटर खाने से ज्यादा दिखावे का सबब बन गया है । पाव भर टमाटर भी लोग ऐसे खरीद कर घर ला रहे हैं जैसे कि धन तेरस में लोग हीरा, जवाहरात खरीदते है । सभी का दिन एकदिन फिरता है । ईसी लिए अभी टमाटर का दिन फिरा है जिससे वह खुद सरफिरा हो गया है । कभी प्याज का दिन फिरता है तो वह महंगाई का चक्कू चला कर बिना काटे ही आंख मे आंसू देता है । सौ बात कि एक बात यह है कि महंगाई की महारानी हमारे देह में राज कर रही है और हम सब बेबस से उसके सामने खडे हो कर उसे कोस तो सकते है पर हटा नहीं सकते । महंगाई शेयर के भाव की तरह उपर तो चली जाती है पर वापस आना भूल जाती है । शायद वापस आते समय उसका लिफ्ट खराब हो जाता है ईसी लिए सभी को रुला कर उपर ही अटक जाती है । लोग नीचे से उपर देखते हैं कि कब महंगाई नीचे गिरेगी पर वह बाल थोडे ही है जो नीचे गिरेगी वह तो बढ, चढ कर लोगों के जीवन स्तर काे और नीचे ले आती है । यह सब हमारे कर्मों का ही फल है । टमाटर जैसे गमले पैदा की जाने वाली सब्जी को हम आलस के कारण घर में नहीं उगाते और बाजार का मुँह देखते है । अब बाजार तो आवारा कुत्ता जैसा ही है जो किसी के वश में नहीं आने वाला । इसी लिए हमारे निकम्मेपन और आलसी स्वभाव का फायदा टमाटर उठा रही है । बाजार का सिद्धांत यह भी कहता है कि जब किसी चीज कि भाव अतिशय बढ जाए तब उसका त्याग कर देना चाहिए । तब उसको अपना असली भाव पता चल जाएगा । अब टमाटर महंगा है तो उसका प्रयाेग कम कीजिए । बिना टमाटर के ही सब्जी और चटनी बनाईए । तब देखिए टमाटर खुद नमक खाए हुए मुर्गे की तरह अपनी साईज में आ जाएगी । अब टमाटर को अपनी प्रेमी या प्रेमिका बना लेते है लोग । उसके बिना जीने या खाने की कल्पना भी नहीं कर सकते तो भुगतो । अब क्यों महंगाई का रोना रोते हो ? डीजल, पेट्रोल और मिट्टी का तेल में दो रुपए भी भाव घट्ता है तो ऐसे खुश होते हो जैसे बंपर खजाना मिल गया हो । टमाटर अगर किलो में दो रुपयां भी घटेगा तो कोई फायदा नहीं । महंगाई होती ही बढ्ने के लिए है । आज तक किसी ने महंगाई को घट कर बौना होते हुए नहीं देखा । जब से बाजार और खरीद, फरोख्त का सिद्धांत अस्तित्व में आया है तब से महंगाई भी दाढी, मूछ की तरह अपने आप उग आई है । अब दाढी, मूछ सफाचट तो नहीं होती ? आज काटो कल फिर बढ जाती है । महंगाई भी वैसी ही है । बिन बुलाए मेंहमान की तरह बाजार में आ जाती है । पर महंगाई को उपभोक्त भले ही न बुलातें हो महंगाई और आपूर्ति का सिद्धान्त और बाजार को नियंत्रण में रखने वाले काला बाजारी जान बुझ कर बुलाते हैं । महंगाई जितनी उपर जाएगी इनके बैंक बैलेंस उतने ही ज्यादा बढेगें । महंगाई से ग्राहक की कमर अकड जाती है और पैसे ज्यादा कमाने से व्यापारी अहम से अकड जाता है । महंगाई का रोना सभी रोते हैं पर फिर रोते हुए ही महंगाई को घर भी ले आते हैं । महंगाई आखिर क्यों न ईठलाएं ? उस ने थोडे ही कहां है मुझे खरिदो ? आपकी आवश्यक्त आपको उसके पास ले जाती है और आप उसको खरिदने के लिए वाध्य हो जाते हैं । अब आप अपनी आवश्यक्ताओं को घटाईए पर महंगाई का रोना मत रोईए । महंगाई की मार से रोते हुए कोई भी अच्छा नहीं लगता । अब आप अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाडी मारेगें तो दर्द तो होगा ही । महंगाई भी वही कुल्हाडी है जिसे हम सब जान बुझ कर अपने पैरों पर मारते हैं । दो हजार के मोबाईल से काम चल सकता है पर शोसल स्टेटस दिखावा करने के लिए हम २० हजार रुपएं का मोबाईल खरिदते हैं और महंगाई को कोसते है । बीमार होने पर सरकारी अस्पताल में भी ईलाज हो सकता है पर दुनिया को दिखाने के चक्कर में हजारों रुपएं खर्च कर के अपना बेडा गर्क कर लेते है और दोष महंगाई को देते है । यह महंगाई भी काल जैसी ही है । ईसान मरता है बीमारी के कारण या उम्र हो जाने के बाद पर दोष दिया जाता है कि बेचारे को अकाल में मरना पडा । काल बहुत ही बेरहम है बेचारे कि जिदंगी छीन ली आदि । महंगाई भी वैसा ही है वह हमारे पास नहीं आता हम खुद चल कर जाते हैं और सगरमाथा की तरह उसकी पीठ पर चढ जाते है । और कोसते जी भर कर महंगाई को है ।

