Fri. Sep 20th, 2019

थारुओं की अन्धभक्ति और नेपालीपन का नशा मधेश की संस्कृति के नाश का कारण बना : कैलाश महतो

कैलाश महतो, नवलपरासी | काफी लम्बे बाद मैंने अपने को इस आलेख का शिकार बनाने का दुस्साहस किया है । हकिकत यह है कि गत वर्ष के पाल्गुण २४ गते के दिन स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन और नेपाल सरकार के बीच सम्पन्न ११ बूँदे सहमति के बाद इस कदर विषय विहीन हो गया था, मानों सोंच से ही मैं शुन्य हो गया हूँ । उसके बाद मेरे उपर लगाये गये आधारहीन और बहके बहके बकवासपूर्ण आरोपों के कारण मैं मेरे लेखनीय उर्जातक से नफरत करने लगा था । मैं किंकर्तव्यविमूढ सा हो गया था । मेरे अन्दर के जमीरों ने मेरा साथ छोड सा गया था । मैं अन्दर से ही खाली हो गया था । लेकिन आजके परिदृश्य ने मेरे अन्दर को झकझोरने का काम किया है । मैं पूनः लिखने को बाध्य हुआ हूँ ।

राजनीतिक कृयाकलापों के सिलसिले में ही आज नवलपरासी के भूमही में मधेशी यूवकों से मिलने उनके घर गया था । एक यूवक के जब घर पहुँचा तो मजदूरी के सिलसिले में वो घर से बाहर था । उसे जब जानकारी हुई तो वह काम से विदा लेकर हमसे मिलने घर आया । वैसे उस यूवक से मेरी व्यतिगत जान पहचान नहीं थी । वह मेरा नाम जानता था । पढालिखा है ।

मेरे साथ हमारे जिला अध्यक्ष श्रीकृष्ण यादव थे । उन्हीं के जरिये उससे भूमही में जनमत पार्टी की संगठन बनाने बनाने की बात चली थी । अनेक शंका उपशंकाओं तथा तर्क वितर्कों के बावजूद वह यूवक मधेश के नाम पर जनमत पार्टी का संगठन बनाने को तैयार हुआ । मधेशी नेताओं के चरित्र और नेपाली राज्य की नीतियों से परेशान रहे मधेशी समुदाय हायलकायल लग रहे हैं । बातों ही बातों में मधेशी समुदायों पर पहाडी समुदाय के द्वारा नियोजित रुप में आज भी हो रहे क्रुरता, बर्बरता और नृशंसता की कहानियों में अपने पारिवारिक कहानियों को जोडते हुए वह भाव विव्हल हो गया था । उसके आँखों में आँसु छलछला गये । वहीं एक थारु महिला भी आ गयी और हमारे बातों को सुनकर पहाड़ के वसियों  द्वारा मधेशी थारुओं के प्रति हुए शोषण, अन्याय, अत्याचार, छल, कपट, विभेद और दोहन का उदाहरण देते हुए वो रो ही पडी ।

दृश्य बडा विदारक था । हम भी भावुक हो गये थे । इतने भावुक हुए कि हमने संगठन की बात छोडकर भूमही का इतिहास जानना चाहे । वह थारु महिला उसी भूमही से कुछ किलो मीटर पूरव में रहे बाँसा रामनगर की मायके बाली ठहरी । भूमही में उनकी शादी एक सम्पन्न थारु परिवार में लगभग चालीस वर्ष पहले हुई थी । तीस साल पहलेतक उनके ससुर जी के नाम पर २८ बिगहा जमीन था । ससुर जी के बाद उनके श्रीमान के पास १९ बिगहा जमीन रहा । आज उनके पास पूराने टीन के एक घर और घर में दो बहुओं के साथ पाँच पोता पोती हैं । एक लडका किसी पहाडी के किसी दुकान में बुटवल में काम करता है और दूसरा वैदेशिक रोजगार में है । पति का निधन हो चुका है ।
पूछे यह जाने पर कि उतने जमीन के मालिक रहे उनके परिवार में गरीबी चन्द सालों के भितर ही कैसे स्थान बना ली ।

जबाव बडा स्पष्ट और विचित्र रहा । उन्होंने उनके घर के इर्दगिर्द बने पाँच छः महल टाइप के इमारतों को दिखाते हुए कहा कि उनके सारे जमीन उन्हींं घर बाले पहाडियों ने हडप ली । उनके ससुर और श्रीमान दोनों स्वाभाव से सीधे सादे लोग थे । उन्होंने समय तो नहीं बता पाया । मगर इतना जरुर बताया कि वह बहुदल निर्दल चुनाव के बाद की बात है जब कुछ पहाडी लोग उनके घर में काम करने आये थे । वे गरीब थे । वे न तो थारु भाषा, न भोजपुरी ही जानते थे । काम के तलास में आये थे । उनके मालिक ने उन लोगों को पनाह दे दी । काम करने, रहने और खाने पिने की अच्छी खासी व्यवस्था कर दी गयी । वे काम करते थे । ज्ञान गुण की बातें भी करते थे । व्यवहार से बडे भला आदमी लगते थे । हमारे विश्वास को उन्होंने जिता । धिरे धिरे वे उनके घर के मालिक के साथ में भी उठ बैठ करने लगे । घनिष्टता हो गयी । उनके घर बाले उन्हें उनके ज्ञान से खुश होकर कुछ बिगहा खेत उनके नाम कर दिए । बाद में वे पहाडी लोग भी उनके मालिक और बेटे के साथ शराब भी पीने लगे । नशे के शुर में उनके मालिकों से वे पहाडी लोग उनके जमीन अपने नाम करवाते गये । उनका परिवार मजदूर हो गया और वे ठग पहाडी कामदार अमीर हो गये ।

उस महिला की बात सुनकर मेरे साथ भूमही पहुँचे हमारे जिला अध्यक्ष श्रीकृष्ण यादव ने अपने आँखों देखी बात बतायी । २०३१ साल में वे मलेरिया विभाग अन्तर्गत नवलपरासी जिला के एक कर्मचारी थे । मलेरिया की औषधी छिडकने के सिलसिले में जिला के सैकडों गाँव और इलाकों में उनका भ्रमण होता था । गिनाते गिनाते उन्होंने बताया कि जिला के १९८ गाँवों में केवल और केवल थारुओं की बस्ती थी । बहुत कम अन्य जातियों की उन गाँवों में उपस्थिति थी । और उन गाावों में एक प्रतिशत भी पहाडी लोग नहीं थे । जहाँतक भुमही की बात है, तो वहाँ पूरे के पूरे मधेशियों की ही बस्ती थी । सबसे ज्यादा थारु और १५/२० प्रतिशततक यादव, हरिजन, केवट आदि लोग थे । वहाँ एक भी घर पहाडी का नहीं था ।

बातों के दौरान एक और पूराने बुजुर्ग ने भी कहा कि भूमही सारा हमारा था । प्रधान जी ‐श्रीकृष्ण यादव जी अपने अमरौढ गाविस के उपाध्यक्ष भी रह चुके थे) सही कह रहे हैं । हमारे मुर्खता और निकम्मापन के कारण हम आज उन्हीं पहाडियों के गुलाम हैं और अपने बाल बच्चों को उनके दास बनाने जा रहे हैं । मगर मधेशी सारे नेताओं से उनका एक बहुत गम्भीर शिकायत और असन्तुष्टि भी थी । वे किसी भी मधेशी नेता पर भरोसा करने को राजी नहीं हैं ।
उन्होंने अपने आगे दिख रहे खाली और महलयुत जमीनों के तरफ इसारा करते हुए कहा कि वह जमीन एक मधेशी जमिनदार का था । वह कोई थारु हैं । शायद आज भी जीवित हैं । अति गरीब हैं आज । वह जमीन सत्तर बिगहा क्षेत्रफल का रहा था । मगर आज उसमें उनका एक इंच भी नहीं है । सारा जमीन पहाडियों ने उन्हें शराब पिला पिलाकर उनसे अपने नामों पर करवा ली ।

एक सामाजिक आर्थिक अभियन्ता ‐नाम याद नहीं) के अनुसार आज के सुस्ता पूर्व नवलपरासी के नवलपुर, नारायणगढ, भरतपुर, पर्सा, सौराहा और पूरे चितवन में सन् १९३५ में थारुओं और कुछ अन्य मधेशी समुदाय के लोगों के बीच पहाडियों की उपस्थिति एक प्रतिशत से भी कम थी और आज उसके ठीक विपरीत चितवन और नवलपुर की स्थिति है । वहाँ आज मधेशियों की संख्या १ प्रतिशत भी नहीं है । यह सब थारुओं के सीधापन, भोलेपन, अन्धभक्ति, मूर्खता, हठता, गलत लत और नेपालीपन के नशों ने मधेश के अपार भूमीय जायदाद और संस्कृतियों के नाश के कारण बने । अगर वे नेपाली हैं तो फिर राज्य क्यों शदियों से एक नेपाली को उजाडकर दूसरे नेपाली को नीतिगत रुप में आवाद करती आ रही है ? सुनने में अरुचिकर लग सकता है । थारु लोग गुस्सा कर सकते हैं । आक्रमण भी कर सकते हैं । भले ही सारे थारु ना सही, मगर इस बात से इंकार कतई नहीं किया जा सकता कि मधेश को पहाड़ियों का गुलाम बनाने में थारु रहा है । आज भी हैं । आज भी वे अन्धविश्वास में ही जी रहे हैं ।

 

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