कहीं सुडान ना बन जाए इसलिए:-
चन्द्रकिशोर झा
नेपाल से हजारों मील दूर देश सुडान में विभाजन हुआ और अप|mीका के ५४वें और दुनिया के नक्शे पर १९३वें देश का उदय हुआ। इस बडी घटना की चर्चा दुनियां के तरह नेपाल में भी थोडी बहुत मिली। दक्षिणी सुडान अस्तित्व में आने के पीछे इसके बाहृय और आन्तरिक कारणों के बारे में नेपाली मीडिया में कुछ बहस भी हर्ुइ लेकिन वो पर्याप्त नहीं है। नेपाली सर्ंदर्भ में दक्षिणी भूभाग जिसे तर्राई मधेश के नाम से जाना जाता है, वहां समय समय पर होने वाले आन्दोलन की नीयत को लेकर काठमाण्डू के तथाकथित प्रबुद्ध नागरिक समाज, राजनीतिक दल, सजग संपादकों द्वारा अपने ही तरीके का मनोगत विश्लेषण करता दिखता है। इतना ही नहीं तर्राई और मधेश के नाम पर राजनीति करने वालों के बयान और हरकतों से भी ऐसी आशंका समय समय पर उत्पन्न होती रहती है। इस स्थिति में नेपाल के दक्षिणी भूभाग की राजनीतिक-सामाजिक अस्तित्व और अस्मिता के बारे में गम्भीर लेकिन खुला बहस होना जरुरी है।
यहां समझने वाली बात यह है कि तर्राई अपने आप में विविधता वाली भूभाग है। यहां भाषिक, धार्मिक जातीय, आर्थिक विविधता भरी हर्ुइ है। नेपाल जैसे ही दक्षिणी नेपाल भी विविधतायुक्त है। नेपाली राजनीति में उठ रही ज्वलन्त सवालों के बारे में एक तरह की राय कायम नहीं है। विभिन्न अवधारणा और विभिन्न आधारों पर उदीयमान हो रहा है। राज्य संरक्षित विभेद या राज्य के श्रोत वितरण में असमानता की पृष्ठभूमि नहीं है। इस पर्रि्रेक्ष्य में किसी एक संगठन या वाद दक्षिण नेपाल का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है। दक्षिण नेपाल को कोई एक नेतृत्व या दल नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था ही सही प्रतिनिधित्व कर सकती है। तर्राई सांस्कृतिक समूह से राजनीति समुदाय में परिवर्तित हो रही है। तर्राई का जो यह नया स्वरूप विकसित होते जा रहा है उसे ना तो काठमाण्डू की मानसिकता ही समझ पा रही है और ना ही दिल्ली दरबार उसको अहमीयत ही दे रहा है।
इस समय बहुआयामिक द्वंद्व के कारण तर्राई की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक आधार बुरी तरह खिसकती जा रही है। ऐसी अवस्था में तर्राई के प्रति सूचना, समझदारी, सद्भाव और सहयात्रा की पहल काठमाण्डू से ही किया जाना जरूरी है। लेकिन अभी क्या हो रहा है कि तर्राई को सिर्फमधेशी राजनीति के पर्याय के रुप में देखा जा रहा है, जो कि अपने आप में एकांकी और अधूरा है। तर्राई में विभिन्न पहचान की खोज करने वाले कई समूह हैं लेकिन उनके बीच मौलिक सामीप्यता भी है ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर, सांस्कृतिक अन्तरप्रवाह के आधार पर विभेद के मूल के आधार पर और जागरण के आधार पर। सामीप्यता और दूरी के बीच मौलिक अन्तर को यदाकदा स्वयं तर्राई के बौद्धिक वर्ग और सिंहदरबार के शासक वर्ग द्वारा ना समझने पर थोक में ही दृष्टिकोण बनाया करते हैं।
मधेशी दल धीरे धीरे कमजोर होते जा रहे हैं। बार-बार टूटने के रोग के कारण ही मधेशी दलों का जनाधार ही नहीं खिसका है बल्कि मधेशी दलों में आए विभाजन के कारण इसके लोकतांत्रिक एजेण्डा मधेशी मुद्दा को ओझल करने का काम जो काठमाण्डू में बैठे शासकों द्वारा किया जा रहा है वह एक दिन उन्हीं के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। तर्राई में असंगठित लेकिन मुखर नागरिक समाज स्वस्फर्ूत रूप में विकसित होते जा रहे हैं। जो मधेश के न्यायपर्ूण्ा आवाज को पतवार देने का काम कर सकती है। दलों का अलोकप्रिय होना एक विषय है और एजेण्डा एक अलग विषय है। तर्राई का यथार्थ यह है कि मधेशी मुद्दों के प्रति युवाओं के मन में अविश्वनीयर् इच्छाशक्ति बढी है। युवाओं में बढतर्ीर् इच्छा और चिन्ता मधेशी मुद्दा को यह मरने नहीं देगी। इसलिए मधेशी दलों को दल दल में फंसकर मधेशी मुद्दे को समाप्त करने का दुष्प्रयास काठमाण्डू द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।
मधेशी विद्रोह से तर्राई में पहचान के प्रति आकर्षा और आत्मविश्वास तो बढाया लेकिन असली चुनौती तो उसको राज्य श्रोत और साधन में समतामूलक वितरण तक पहुंचाना है।
नेपाल का दक्षिणी भूभाग तर्राई और मधेश में विभाजित होते जा रहा है। एक पक्ष है जो इसको तर्राई कहना पसन्द करता है और दूसरा पक्ष है जो मधेश के प्रति मोहित है। ध्रुवीकरण की यह प्रक्रिया दलों के बीच दृष्टिकोण, निर्माताओं के बीच और स्वयं इस क्षेत्र के पहचानधर्मी समुदाय के बीच भी झलकती है। मधेश विद्रोह में अपनी जान गंवाने वाले बस इतना चाहते हैं कि उनको मधेशी पहचान सहित नेपाली नागरिक के रूप में किया जाए। दक्षिण एशिया में जहां कहीं भी पहचान की राजनीति गहर्राई है वहां अलग अस्तित्व की बात उठती ही है। श्रीलंका में तमिल, पाकिस्तान में बलुची, भारत में काश्मिरी और पर्ूवोत्तर और चीन में तिब्बती पहचान की खोज इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। आज तिब्बत में चाहे जितनी भी समृद्धि बढा दी जाए लेकिन कोई भी तिब्बती वहां का राज्य प्रमुख नहीं बन सकता है। और ना ही श्रीलंका में ही किसी तमिल के राष्ट्रपति बनने के आसार निकट भविष्य में दिखाई दे रहे हैं। लेकिन तर्राई ने यह सुखद स्थिति का अनुभव किया है।
अब सवाल यह उठता है कि इतनी बडी उपलब्धि होने के बावजूद इतना हलचल क्यों है – मधेशी विद्रोह के बाद की उपलब्धियों को यांत्रिक और नाटकीय प्रतिफल के रूप में व्याख्या करने वालों की एक बडी जमात है और यह समझ रहने तक इसके नाम पर राजनीति की खेती भी होती रहेगी। राजनीति वहीं सफल होती है जिसकी जड नेपाली धरती से जुडी होगी और जो आन्दोलन जनकेन्द्रित होगी।
संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा के अस्तित्व और प्रभाव सत्ता राजनीति से दूरी रहने तक ही होगा। सरकार में सहभागिता होने की स्थिति में मोर्चा के भीतर ही दलों के बीच फिर से विभाजन की स्थिति आ सकती है। लेकिन यह विभाजन चाहे जिस कारण से भी हो लेकिन अपने अधिकारों को लेकर जब काठमाण्डू से आमना सामना होगा तो मधेशी जनता हमेशा यही चाहेगी कि मोर्चा मिलकर ही दबाब डाले ताकि उसका व्यापक असर हो । पर अफसोस मोर्चा की एकता कृत्रिम और अप्राकृतिक है।
मोर्चा का प्रस्ताव अभी भी धरातलीय आकांक्षा को प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रही है। तर्राई की बदलती आर्थिक सामाजिक संरचना, युवाओं की अपेक्षा, सामाजिक सुरक्षा जैसे सवालों पर मोर्चा ठीक ढंग से ध्यान नहीं दे पा रही है। हां पिछले समय में मोर्चा ने कुछ ऋण्मूलक मुद्दा उठाया भी है उसका प्रभाव आम लोगों पर पडा है। लेकिन अभी भी यह बात देखने को मिली है कि मधेशी मोर्चा सत्ता मोह से बाहर नहीं निकल पा रही है। दक्षिण नेपाल को देखने की काठमाण्डू की दृष्टि और मधेश का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वालों की आंखों में अतिवाद दिखता है। फलतः दक्षिण नेपाल राजनीतिक अलगाव का खतरनाक शिकार बनते जा रही है।

