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सादा जीवन उच्च विचार के धनी भीम बहादुर तामांग

 

हिमालिनी डेस्क
काठमांडू। राजनीति में विरले ही ऐसे नेता होते है, जो पद के पीछे नहीं भांगते और अपने आदर्श अपनी निष्ठा से यह साबित करते है कि राजनीति में अच्छे लोगों का अकाल नहीं है।
निष्ठा व मूल्य मान्यता की अपनी राजनीति को जीवन पद्धति बनाने वाले कांग्रेस के नेता भीम बहादुर तामांग अब हमारे बीच नहीं रहे। पाँच दशक से अधिक समय से कांग्रेस की ही राजनीति में सक्रिय तामांग का जन्म दोलखा में वि.सं. १९९१ में हुआ था। कांग्रेस के कन्द्रिय सदस्य तथा पर्ूवमन्त्री समेत रहे तामांग ने वीपी के समाजवादी विचार और दर्शन को जीवन पद्धति में बदल दिया था। संपत्ति के नाम पर उनके पास कुछ कपडेÞ, एक झोला और उसमे रखी कुछ पुस्तके ही थीं। २०५१ साल में चुनाव जीतकर ०५२ साल में वे कानून तथा न्याय मन्त्री बने थे। अपने मन्त्रित्वकाल में उन पर कोई भी अंगुली नहीं उठा सका। खासकर आर्थिक अनियमितता के बारे में, जिसका शिकार आज हर मन्त्री अवश्य ही होता है।
सरल निष्ठावान व जुझारु नेता के रुप में उन्हें सदा याद किया जाएगा। उनकी दिनचर्या विल्कुल ही सादगीपर्ूण्ा थी। उनके अपने ही कुछ दोस्त रिश्तेदार उन्हें वक्त-बेवक्त हजार-पन्ध्र सौ रुपये दिया करते थे, जिससे आराम से उनका गुजारा हो जाता था। बार बार वो कहते थे कि पैसा नहीं कमाने पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए। जीवन में सबसे बडÞी बात इमानदारिता है। इमानदारिता के साथ जिन्दा रहना एक बडÞी सफलता है।
तामांग की राजनीतिक जीवनयात्रा २०१४ के भद्र अवज्ञा आन्दोलन से शुरु हर्ुइ थी। २०१५ के आम चुनाव में तामांग को तत्कालीन गोरखा निर्वाचन क्षेत्र नम्बर ११, १२ और १३ तथा तत्कालीन ओखलढुंगा के निर्वाचन क्षेत्र नम्बर १७ में चुनाव अभियान मंे लगाया गया था।
२०१७ सालमें हुए कू के बाद तामांग को ६ महीने जेल में भी बिताने पडेÞ थे। यहाँ से निकलकर उन्होंने भारत में निर्वासित जीवन व्यतीत किया। शहीद सरोजप्रसाद कोइराला के नेतृत्व में बिहार के जयनगर, दरभंगा से यूपी के बनारस तक पहुँचे। वि.सं. २०१८-१९ में सशस्त्र संर्घष्ा में रामेछाप, सिन्धुली व उदयपुर में सक्रिय रहे। २०२६ में उन्हें आममाफी मिली। स्वदेश वापसी के साथ ही २०२७ साल में फिर निर्वासित होना पडÞा। बनारस में रहने के दौरान तामांग वीपी तथा गिरिजा के सर्म्पर्क में आए। यहीं उन्होंने तरुण पत्रिका व पार्टर्ीीे अन्य प्रकाशन सम्बन्धी कार्य तथा हथियार संकलन का काम भी किया।
भीमबहादुर तामांग के बारे में यह भी कहा जाता है कि वो बंगलादेश की स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी सक्रिय भूमिका निर्वाह करते रहे। वि.सं. २०२९ में उदयपुर, रामेछाप, दोलखा में भूमिगत रुप से पार्टर्ीींगठन में रहने पर उन्हें ६ महीना तक नजरबन्द रखा गया था। ०२९ साल से ०३४ असोज तक वे नख्खु जेल में थे, जहाँ उनकी मुलाकात कृष्णप्रसाद भट्टर्राई से हर्ुइ थी। जेल से ही उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका पुनर्जागरण निकाली थी। ०३८ के आम चुनाव बहिष्कार के सर्न्दर्भ में और ०४२ साल में सत्याग्रह के कारण उन्हें फिर जेल जाना पडÞा था।

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सादा जीवन उच्च विचार के धनी भीम बहादुर तामांग

०४८ में तामांग दोलखा के निर्वाचन क्षेत्र नम्बर १ से चुनाव में हार गए। ०५१ के मध्यावधि चुनाव में जीतने के बाद कानून मन्त्री बनाया गया। मन्त्री पद छोडÞने के अगले ही दिन से वे र्सार्वजनिक बसों में सफर करते देखे गए। उनके करीबी के मुताबिक जिस दिन उन्होंने मन्त्री पद छोडÞा तो मन्त्री क्वार्टर से एक झोला में अपने कुछ कपडÞे रखे और बानेश्वर स्थित किराए के मकान में रहने के लिए र्सार्वजनिक बस पकडÞा। लेकिन बस भाडÞा के लिए उनकी जेब में पैसे भी नहीं थे। उनके साथ ही रहे पार्टर्ीीे एक कार्यकर्ता ने बस भाडÞा दिया था।

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