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तेरी मुस्कान ही मरहम का काम कर जाती है : ज्योति अग्रवाल

 

कितना ही लड लूँ झगड लूँ तुझसे ऐ माँ
खाने का पहला निवाला तु ही तो खिलाती है।
जीवन के हर पडाव में मुझे जरूरत है तेरी
मेरी हार को जीत बनाकर तू जश्न मनाती है।
हाल दिल का सब बताकर ही सुकून मुझे मिलता है।
अच्छा क्या बुरा क्या तू ही तो सिखलाती है।
गलती हो मेरी पर रुठ्ने का हक दिया है मुझे।
सर को सहला के प्यार से फिर तू ही मुझे मनाती है।
चोट लगने पर मुझे इतना घबराया मत कर माँ
तेरी मुस्कान ही मरहम का काम कर जाती है।
सौ जन्म लेकर भी कर्ज तेरा न चुकाया जाएगा
सराहने तेरे त्याग को खुदा खुद धरती पे आएगा।
सराहने तेरे त्याग को खुदा खुद धरती पे आएगा।

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ज्योती अग्रवाल, काठमांडू

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