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तुम्हारा जो डर है : वसन्त लोहनी

 

तुम्हारा जो डर है

तुम और मैं
एक ही शहर में रहते हैं
फासला दुर भी नही
लेकिन तुम्हारा दिन
मेरी रात हो जाती है
मिल नहीं सकते हम
फिर भी हम दो
साथ साथ चले आ रहे हैं
तुम्हें डर है एक बात की
कोई जाहिल हम दोनों को तोड़ ना दे
प्रेम के नाम में
हो सकता है
युद्ध जीतने के नाम में
मुझे भी डर उसी बात की है
तुम मुझे देखते रहते हो
कहीं मैं गुम ना हो जाऊं
अगर मैं गुम हो गया तो
तुम्हारा भी नामो निशान मिट जाएगा
हम दोनों जी रहे हैं
क्योंकि हम दोनों
एक ही प्रवाह में गुजर रहे हैं
प्रवाह रुक गया तो
ना तुम रहोगे, ना मैं
विश्वास करो दोस्त
प्रवाह जो हमनें बनाएं है
वह अनायास रुकेगा नहीं
हम समुंदर तक
साथ साथ ही रहेंगे

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वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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