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अपने (कविता) : अनिल कुमार मिश्र

 

अपने
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जीना तो
अपनों ने सिखाया था
बार-बार अहसास कराया था
‘हम अपने हैं
हम पर विश्वास करना
हाँ और जब मैं तुम्हारे साथ
छल करूँगा,तुम्हें धोखा दूँगा
तब हमारा अपनापन
स्वतः प्रमाणित हो जाएगा।
हम तुम्हारे अपने थे,समझ जाओगे।’
कोरोना ने ईमानदारी से
समर्पित भाव से
माया से दूर होकर
मरना सिखाया
यह भी सिखाया
कि जब भी मरने की अनुभूति होने लगे
दौड़ जाना श्मशान की ओर
अपनी चिता सजवाना
और लेट जाना उसपर
निश्चिंत होकर,तनावमुक्त होकर
उसी चिता पर दम तोड़ना
ताकि तुम्हारी अर्थी का स्पर्श
तुम्हारे शरीर का स्पर्श
तुम्हारे तथाकथित अपनो को
ना करना पड़े
जब ‘वो’अर्थी को,तुम्हारे शरीर को
छूने से इनकार कर देंगे ना
तो बड़ी पीड़ा होगी
याद आएंगे वो पल
जो तुमने
उनके लिए,तुम्हारे अपनों के लिए
मर मर कर जिया था।
आत्मा बिल्कुल शांत हो जाएगी
कर्ज विहीन होकर
जब श्मशान के देवता
खुद अग्नि देेंगे
अग्नि से निकलती लपट
ईश्वर से प्रार्थना करेगी
अगले जन्म में कोई भी अपना
मत देना जिसे
मुझे छूने में भय लगता हो
मेरी राख
जहाँ तक भी उड़कर जाए
वहाँ के सभी लोगों को
अपनो की माया से मुक्त कर देना
ताकि
उनका शरीर,उनकी अर्थी
उनके अपनों को
कोई भी कष्ट ना दे।

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अनिल कुमार मिश्र,राँची,झारखंड,भारत

 

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