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बाहर की ठाट -बाट सजाते गए, अंदर से खोखले होते गए : पल्लवी पाम

 

१
उन रेशों को मत उधेडना”

उन रेशों को मत उधेडना
जो बारीकी से गुंथे हुए हैं ।

जिन पर रिश्तों की बुनियाद है,
उन कङियों को जरा सम्भाल कर रखना ;
ये बङे नाजुक हैं ।
कि जरा अहमियत इनकी बचाए रखना,
सिर्फ लेन देन की तराजू पर मत तौलना
कि भावों का तो कोई मोल नहीं होता।
२
किसी के समर्पण को उसकी कमज़ोरी
न समझना ;
कि संस्कार के लिबास में
परम्पराओं को कोई तो वहन कर रहा।

मत करना अवहेलना,
किसी की सरलता का।
कि सरलता ही शिवत्व है,
और मुक्ति का द्वार भी !!

३
सलीका

कपड़ो में तह लगाना सीखते गए
रिश्तों का तह लगाना भूलते गए

हम अनपढ़ से आधुनिक होते गए

बाहर की ठाट -बाट सजाते गए
अंदर से खोखले होते गए

हम विकासशील से विकसित बनते गए

काश कपड़ो की तरह रिश्तों को भी तह लगाने का सलीका सीखा होता….

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रिश्तों की सिल्वट्न को सुलझाने का भी सलीका सीखा होता…

कपड़ो की तरह रिश्ते भी करीने से सजे होते
तन की तरह मन को भी संवारा होता

दिखावे के लिए ही नहीं…
सच में जीने का सही सलीका सीखा होता
४

“शक्ति जीवन का आधार ”

शक्ति जीवन का आधार
बिन शक्ति निष्क्रिय संसार।
जाने क्यूं भान मुझे यह होता है,
जब अप्रत्याशित कुछ घटित हो जाता है,
मन विस्मित और किंकर्तव्ययविमूढ रह जाता है,
भीड़ के बीच आंख सूनी हो जाती हैं;
ह्रदय का रुदन सिर्फ सुनायी हमें ही देती है।
जाने कब….कैसे…
भीतर से शक्ति प्रकट हो जाती है।
जैसे नदी की धार अवरूद्ध हो जाए अगर,
नई राह वो खोज लेती है,
भीतर जो बह रहा निरंतर,
उसके प्रवाह को रोक कहां फिर पाती है?
जैसे मां शताक्षीके एक नयन मूंदते दूसरी खुल जाती है।
भीतर से शक्ति नये रूप में प्रकट हो जाती है!
शक्ति ही जीवन का आधार ,
बिन शक्ति सूना संसार;
चलता रहे यह जीवन-चक्
प्रकृति कहीं से फिर हमें जीवन का गूढ रहस्य समझाती है,
शक्ति के भी हैं कई द्वार
एक बंद हो जाए अगर,
दूसरी खुल जाती है।
स्वंय नियंता भी शक्ति का आह्वान कर सृष्टि की रचना करते हैं,
क्षय होते ही शक्ति सृष्टि को अपने अंतः में समेट लेते हैं।
शक्ति जीवन का आधार
बिन शक्ति सूना संसार।

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५
*अतीत के पन्ने और भविष्य की आहट *

अतीत के पन्ने स्याह से,
खोये हुए अपनों के बिना निर्जीव से,,
यादों के अवलम्ब पर बनते चित्र निर्मूल ..

घर की पगडंडियों भी अब अपरिचित सी..
मालूम होता अब कोई नहीं रहता वहां !
न मैं,न मेरी आहटें,न खुशियां ,न मेरे अथूरे सपने!

बंद दरख्तों के रोशनदान खुले नहीं कब से..
ये अतीत की गलियां संकरी सी!!
जहां आकृतियां तो हैं, पर स्पंदन नहीं!
अनुभूति तो है पर छाया सी,
छूने जाऊं तो पकङ में नहीं आती!
और भविष्य?
सूर्य के समान जीवंत !
इंद्रधनुष के सभी रंग लिए
अनन्त आकाश के विस्तृत नीले पट पर …
कुछ नवीन आकृतियों के गढ़े जाने की प्रतीक्षा में
तटस्थ खडा है!

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मौन के सानिध्य में ,
मुखर होती आकृतियां…

भविष्य के रूपहले रथ पर …
अंधकार की कालिमा को छोङ,,

रक्तिम आभा से दग्ध..
जीवन को फिर से पुकार रही है।

जो स्वप्न जीने की चाह थी कभी..
वो दूर क्षितिज पर बिखरा सिन्दूरी रंग
उन सपनों में र॔ग भरने भविष्य के रोशनदानों से
झांक रही है!!

डा पल्लवीकुमारी”पाम”
अनिसाबाद, पटना,बिहार

डा पल्लवीकुमारी”पाम”
अनिसाबाद, पटना,बिहार

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