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याद किए गए समाजवादी चिन्तक प्रदीप गिरी (झलकियां)

 

काठमांडू, भादव ४– नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा ने कहा कि उपराष्ट्रपति को राष्ट्रीय सभा का अध्यक्ष बनाया जा सकता है । समाजवादी चिन्तक प्रदीप गिरी की स्मृति में काठमांडू में आयोजित एक कार्यक्रम में देउवा ने कहा कि सहमति के ही आधार में संविधान संशोधन किया जाएगा ।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान संशोधन के लिए उनके और प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली के बीच सहमति हुई है । उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति को राष्ट्रीय सभा का अध्यक्ष बनाने का चलन दुनिया भर में है । उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि कांग्रेस और एमाले की सहमति किसी पार्टी के विरुद्ध नहीं है । आप लोग इसमें किसी तरह की आशंका नहीं करें । मैंने और ओली जी ने काफी सोचविचार कर सहमति की है ।

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कार्यक्रम में नेकपा (एकीकृत समाजवादी) के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल ने अपने मंतव्य में कहा कि नेपाली राजनीति में निष्ठा, नैतिकता और स्वच्छता का अभाव है । उन्होंने इस बात की भी चर्चा की कि मध्यरात में जो दोनों नेताओं ने कागजात पर हस्ताक्षर किया, सहमति की । इसे क्या कहेंगे ? कल तक यह कहने वाले कि प्रचंड जी के साथ ही स्वर्ग जाना होगा तो स्वर्ग जाएंगे, नरक जाना होगा तो वहाँ भी जाएंगे लेकिन क्या किया ? मध्यरात में दोनों बड़ी पार्टी मिल गए और प्रचंड जी को छोड़ दिया । ऐसे मध्यरात में सहमति नहीं करें करना है तो खुली बहस करें ।

कार्यक्रम में लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा)के महासचिव डा. सुरेन्द्र झा ने अपने मंतव्य की शुरुआत में स्व.प्रदीप गिरी को याद करते हुए कहा कि वह मेरे प्रेरणा थे । उन्हें देखकर ही मैंने अध्ययन अध्यापन के बावजूद राजनीति को चुना । उन्होंने कहा कि आज वो भौतिक रुप से हमारे साथ नहीं है लेकिन उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलने का हमें प्रयास करना चाहिए ।
महासचिव झा ने अपने मंतव्य में इस बात पर भी जोर दिया कि नेपाल के दोनों दल नेपाली कांग्रेस और नेकपा (एमाले) यदि कमजोर होती है तो ये लोकतन्त्र को ही कमजोर करेगा, और हम जैसे विभेद में पड़े व्यक्ति और भी कमजोर होंगे । उन्होंने देउवा से आग्रह किया कि वो केवल छठी बार प्रधानमंत्री बनने की होड़ में नहीं लगे वरन इतिहास रचें और किसी चीज की चाहत में इस गठबंधन को विफल नहीं करें ।

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इसी तरह कार्यक्रम में स्व. प्रदीप गिरी की पत्नी भारती सिलवाल गिरी भी शामिल थी । उन्होंने अपने मंतव्य में कहा कि – प्रदीप गिरी सबको साथ लेकर चलना चाहते थे । संविधान में हस्ताक्षर की जब बात चली थी तो प्रदीप गिरी ही थे जिन्होंने हस्ताक्षर नहीं किया था । क्योंकि उसमें मेधेशियों की मांग को नहीं शामिल किया गया था । वो जनजाति, महिला, मुस्लिम, मधेशी के पक्ष में थे ।

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