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लामिछाने का भव्य स्वागत भारत की कूटनीतिक जीत : कंचना झा

 

कंचना झा, हिमालिनी अंक अप्रैल 026। रास्वपा के सभापति रवि लामिछाने अपनी भारत के दौरे से वापस लौट चुके हैं । नेपाल के संचार माध्यमों की अगर बात करें तो इस बात की व्यापक चर्चा रही है कि भारत में लामिछाने का भव्य स्वागत किया गया । यह बहुत ही सम्मानजनक बात है कि पड़ोसी देश आपका इस तरह से स्वागत करता है ।

एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि ये भारत की कूटनीतिक जीत है । भारत ने यह संदेश भी दिया है कि वह अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को महत्व देता है । उसने यह भी दिखा दिया कि वह सचमुच बड़ा है । बड़े हमेशा संस्कार सिखाने का काम करते हैं । भारत और नेपाल दोनों देशों के बीच सभ्यता, संस्कृति, धार्मिक परंपराएँ, पर्व – त्योहार, खानपान, पहनावे में गहरी समानता है । तो फिर दूरी किस बात की ? नेपाल और भारत दोनों ही इसे बना कर रखना चाहते तो है लेकिन समय– समय पर मतभेद भी उभरते रहे हैं ।

सच तो यह है कि कि संबंध हमने नहीं बनाया है और न ही यह केवल राजनीतिक है बल्कि यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी है । धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो दोनों देश के बीच एक गहरा संबंध है । लेकिन वर्तमान अवस्था की अगर बात करें तो नेपाल में भारत को लेकर राजनीतिक स्तर पर खटास और असहमति देखी जा रही है । शायद इतिहास में ही यह समय सबसे संवदेनशील समयों में से एक है । इन सबके बावजूद भारत हमेशा इस बात की पहल करता है कि हम मिलकर रहें और दोनों देश आपसी सहयोग और संवाद के माध्यम से आगे बढ़े । । क्योंकि दोनो देशों का मिलकर रहना अति आवश्यक है । इस मामले में कहें तो भारत ने एक बार फिर अपनी उदारता दिखाई है ।

भारत द्वारा रास्वपा सभापति लामिछाने का जो भव्य स्वागत किया गया है वह काबिले तारीफ है । भारत ने लामिछाने के स्वागत के दौरान जिस संस्कार का प्रयोग किया वो मिथिला संस्कार था । लामिछाने के स्वागत में मिथिला परपंरा के सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग किया । मिथिला और भारत का जो संबंध है वो किसी से छिपा नहीं है । मिथिला पाग, और मिथिला के पोशाक से जो उन्होंने लामिछाने का स्वागत किया वो अद्भुत था । मिथिला का संबंध सीता माता से जुड़ा है । सीता यानी राम और राम कहाँ तो भारत । नेपाल भारत की ये साझा संस्कृति है । ये जोड़ने का काम है और बड़ी ही शालिन तरीके से भारत ने लामिछाने के स्वागत को मिथिलामय स्वागत बना दिया । यह बहुत बड़े सम्मान की बात है नेपाल के लिए ।

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भारत ने यह साबित किया है कि वह अपने से छोटों को संस्कार सिखाता है । एक परम्परा सी रही है नेपाल की कि जब भी नेपाल में नई सरकार या नेतृत्व बनता है तो उसकी पहली विदेश यात्रा प्रायः भारत की ओर होती है । भारत भ्रमण इसलिए भी जरुरी होता है कि वहाँ क्या चल रहा है ? नेपाल को लेकर, नेपाल की सरकार को लेकर भारत की क्या सोच है ? दोनों देशों के बीच लगभग १७०० किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, बिना पोसपोर्ट, बिना वीजा के आना जाना है दोनों देशों के बीच । सीमा की तो यह स्थित है कि एक ही परिवार कुछ लोग सीमा के उस पार हैं तो कुछ लोग सीमा के इस पार । इसे आप क्या कहेंगे ? तो ऐसे में दोनों देश के बीच दूरी नहीं आनी चाहिए । इसका भरसक प्रयास होना चाहिए कि इसे हम कैसे और प्रगाढ़ बना सकें ?

लामिछाने जब जेठ २२ गते को स्वदेश लौटे, तो उन्होंने त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बातचीत की । लामिछाने ने कहा कि दोनों देशों के बीच हितों से जुड़े विषयों पर सकारात्मक चर्चा हुई । उन्होंने यह भी जानकारी दी कि कूटनीतिक विषयों को संवेदनशीलता के आधार पर आगे बढ़ाने को लेकर भारत के साथ बातचीत हुई है । पत्रकारों ने उनसे सीमा विवाद, भूमि अतिक्रमण को लेकर भी प्रश्न किया । जिसका जवाब देते हुए लामिछाने ने कहा कि कूटनीतिक मामलों को सड़क या सार्वजनिक बहस की तरह नहीं चलाया जा सकता । उन्होंने कहा कि “सड़क पर चलने वाली चर्चा जैसी कूटनीति नहीं होती, कूटनीतिक में एक तरीके से आगे बढ़ना पड़ता है और कूटनीतिक विषयों को संवेदनशीलता के आधार पर आगे ले जाने के बारे में चर्चा कर मैं वापस आया हूँ ।”

तो इसबार जब फागुन २१ गते को नेपाल में चुनाव हुए और रास्वपा ने दो तिहाई से जीत दर्ज की तो भारत ने इसका स्वागत किया । जब चैत १३ गते को बालेन्द्र साह बालेन ने प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली तब भी भारत ने उन्हें स–सम्मान बधाई दी । एक नीति की तहत, एक भाईचारे के तहत, एक कुटनीति के तहत एक राजनीति के तहत भारत ने प्रधानमंत्री बालेन को निमंत्रण दिया भ्रमण के लिए । यदि इसे कूटनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण निमंत्रण था । इस निमंत्रण को देने के लिए भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री नेपाल आने वाले थे लेकिन अचानक से उनका नेपाल आना रुक गया । संचार माध्यमों से समाचार बनें कि प्रधानमंत्री बालेन ने कहा है कि अभी वो किसी भी देश का भ्रमण नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें अभी बहुत से काम करने है । बहुत अच्छी बात है कि आप अपने देश और जनता को लेकर सोचते हैं, आप काम को प्राथमिकता में रखते हैं । यहाँ तक तो बात ठीक ही है लेकिन यह कह देना कि मैं केवल समकक्षी से ही मिलूँगा तो यह उनकी हिनता बोध को दर्शाता है ।
यहाँ रास्वपा सभापति ने अपनी कूटनीति का प्रयोग किया , अपनी शालिनता को दर्शाया और भाजपा द्वारा दिए गए निमंत्रण को स्वीकार किया और पहुँच गए भारत के दौरे पर ।
उन्होंने अपनी और पार्टी की एक अलग छवि बनाई है । लामिछाने ने यह संकेत दिया कि उनकी पार्टी केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संवाद करने में सक्षम है । अपनी इस दौरे से उन्होंने यह संदेश भी देना चाहा है कि नेपाल “प्रो–इंडिया” या “प्रो–चाइना” की बजाय संतुलन की नीति अपनाना चाहता है । जो उनकी बहुत ही अच्छी नीति रही है । उनके इस दौरे से व्यापार, निवेश, और रोजगार के मुद्दों पर बातचीत से नेपाल को व्यावहारिक लाभ मिलने की संभावनाएं बनती है ।

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सच तो यह है कि प्रधानमंत्री बालेन के अभिव्यक्ति को लेकर यहाँ एक हंगामा सा उठा था । उसे शांत करना जरुरी था । ये कूटनीतिक बातें होती हैं । ये सड़क या पान की दुकान पर की गई बातें नहीं है । यह दो देश के स्वाभिमान की बातें हैं जिसका निदान केवल कूटनीति से हो सकता है । इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनके इस दौरे ने दोनों देशों के बीच जो तल्खी थी उसे थोड़ा कम करने का काम किया है । वैसे अतीत में भी कई राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष या सभापति की भारत यात्रा होती रही है, वो भारत के दौरे पर जाते रहे हैं लेकिन यह बहुत ज्यादा चर्चा का विषय कभी नहीं बना, इतनी सुखिर्यो में कोई नहीं रहा जितना की लामिछाने रहे । समाचार बनते थे लेकिन इतने ज्यादा नहीं । संचार माध्यमों में भी इतने हेडलाइन कभी नहीं बने थे । लेकिन लामिछाने का भारत जाना, वहाँ उनका भव्य स्वागत होना यह समाचार बना । कारण स्पष्ट है कि दोनों देश की जनता में किसी तरह की कोई दूरी नहीं है । लामिछाने का यह भारत भ्रमण क्यों इतना खास बना ? इसका एक स्पष्ट कारण राजनीतिक परिदृश्य में हाल के बदलाव और नए नेतृत्व की भूमिका को माना जा सकता है ।
हलांकि उन्होंने कारण स्पष्ट कर दिया था लेकिन जिस अहम और दंभ को वो दर्शा रहे हैं वो अच्छी बात नहीं है । स्वयं में शालिनता का लाना बहुत आवश्यक है । जल्दबाजी में कोई भी फैसला करना आगामी दिनों के लिए बेहतर नहीं है, इस बात का ख्याल रखना होगा ।

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भारत एक बड़ा प्रभावशाली देश है । भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो कभी नहीं कहा कि मैं केवल किसी समकक्षी से ही मिलूँगा । वो सभी का स्वागत करते हैं प्रोटोकॉल के तहत । एक प्रोटोकॉल होता है किसी भी देश के प्रधानमंत्री का किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री से मिलने का या अन्य किसी व्यक्ति से मिलने का । किसी भी विदेश नीति में प्रोटोकॉल प्रक्रिया का महत्वपूर्ण स्थान है ।
केवल यह कह देना कि मैं काम करना चाहता हूँ इसलिए किसी से मिलूँगा ही नहीं या कोई संवाद करुँगा ही नहीं, ये तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं है । ये तो समस्या से भागने की बात हो गई । भागना नहीं है समाधान की ओर जाना जरुरी है ।

रही बात भारतीय प्रधानमंत्री की तो वो स्वयं कई बार नेपाल आ चुके हैं । नेपाल के प्रति अपने लगाव को वो कई बार दर्शा चुके हैं । वो भी अच्छी तरह से जानते हैं दोनों देश के संबंधों को । इस संबंध को बनाए रखना बहुत आवश्यक है और इसके लिए जरुरी है कि दोनों देश के बीच आना जाना लगा रहे । राजनीतिक स्तर पर आना जाना हो । दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने के लिए कूटनीतिक आधार पर नियम बनने जरुरी हैं । यह केवल वर्तमान के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य की स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है । अपने भारत दौरे के दरम्यान लामिछाने ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन सहित कई नेताओं से मुलाकात की ।

यहाँ भारत की कूटनीतिक जीत साफ दिखाई देती है । उसका बड़ा होना दिखता है । उसका सोच समझकर कदम उठाना दिखता है । दोनों देशों की चिंता दिखती है । समाधान की ओर कदम बढ़ना दिखता है । न केवल लामिछाने को बुलाया जहाँ – जहाँ गए, जिनसे भी मुलाकात की सभी ने उनका शानदार स्वागत किया । यह स्वागत सच कहें तो सम्पूर्ण नेपाल का स्वागत था । नेपाल के मिथिला का स्वागत था । यह स्वागत नेपाल की जनता का स्वागत था । यह नेपाल के धार्मिक, आर्थिक राजनीतिक, सांस्कृतिक, तौर तरीके का स्वागत था जिसने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया और भारत ने अपनी कूटनीतिक जीत सुनिश्चित की ।

कंचना झा,
कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन
www.himalini.com

 

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