इंसानी संवेदना ( लघुकथा ) : विनोदकुमार विमल
विनोदकुमार विमल, 28 जून, काठमांडू । शुभतारा नाइट बस लहान बस स्टैंड पर रुकी । बस में चढ़ते समय बहुत भीड़ थी । बस के दरवाज़े पर भीड़ के बीच एक गंभीर रूप से घायल यात्री बैसाखी के सहारे खड़ा था । उसके दाहिने पैर और बाएँ हाथ पर स्टील का प्लास्टर लगा था और उसके हाथ – पैर बहुत कांप रहे थे । वह अपने दाहिने हाथ और सिर पर बैग लेकर बस में चढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि वह चढ़ नहीं पा रहा था ।
आखिरकार, उसने एक यात्री से कहा, ” कृपया मुझे बस में चढ़ने में मदद करें, मैं जेन-जी आंदोलन में बुरी तरह घायल हुआ मरीज़ हूँ । देखिए, मेरे हाथ – पैरों पर स्टील का प्लास्टर लगा है, मैं इलाज के लिए अकेले काठमांडू जा रहा हूँ ।” उसकी बात कोई नहीं सुन रहा था । बस कंडक्टर ज़ोर से कह रहा था, ” जल्दी चढ़ो, बस खुलने का समय हो गया है ।”
यात्रियों की भीड़ में से एक आवाज़ आई, ” अगर आपके हाथ – पैर पर प्लास्टर बंधे हैं, तो आपको बस से जाने की क्या ज़रूरत थी ? आपको तो हवाई जहाज़ से जाना चाहिए था, है ना ?” एक और आवाज़ आई, ” हम कोई कुली नहीं हैं जो आपका सामान उठा सकें ।” तीसरी आवाज़ आई, ” प्लास्टर लगवाने का क्या फ़ायदा ? बालेन सरकार ने आपको पहले ही 10 लाख रुपये दे दिए हैं, मुफ़्त इलाज भी दे रही है, और आप अभी भी दूसरी सुविधाएँ ले रहे हैं ।”
यात्रियों की प्रतिक्रिया भरी बातें सुनकर उन्हें दु:ख हुआ । उन्हें लगा कि उन्होंने देश में बदलाव के लिए इतनी कड़ी लड़ाई लड़ी, घायल भी हुए, लेकिन लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया; न तो उनमें इंसानियत दिखी और न ही मानवीय संवेदना ।
आखिरकार, उसने हिम्मत जुटाई और अपना सामान लेकर जल्दी से बस में चढ़ गया और अपनी सीट पर जा बैठा । कुछ देर बाद, प्लास्टर लगी जगह से खून बहने लगा । खून इतनी तेज़ी से बह रहा था कि सीट और सीट के नीचे की जगह खून से भर गई ।



