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आधुनिक राष्ट्र, राष्ट्रीयता, संघीयता एवं सम्प्रभुता:प्रो. नवीन मिश्रा

 
नवीन मिश्रा
नवीन मिश्रा

कभी कभी परिस्थिति यह सोचने पर विवश कर देती है कि हमारी राष्ट्रीयता इतनी कमजोर क्यों है, जिसे किसी अपने ही देश के प्रदेश विशेष की भाषा, भेषभूषा, संस्कृति से खतरा उत्पन्न हो जाता है । राष्ट्रीयता सिर्फ एक शब्दावली नहीं है, भावना है, व्यवहार है । अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित भावना है । एक जापानी प्राध्यापक का नेपाल के विषय में यह विचार था कि हम लोगों ने इसलिए प्रगति नहीं कि क्योंकि हमने भूख को नहीं देखा है । विश्वयुद्ध के पश्चात जापान में उत्पन्न परिस्थितियों का वर्णन करते हुए वे अपनी आपबीती बताते हैं कि कैसे वो लोग वर्षों तक खेत से आलू खोद कर लाते थे और उसे उबाल कर अपना पेट भरते थे । सरकार की ओर से प्रत्येक परिवार को प्रति दिन १०० ग्राम भूनी हुई मूंगफली प्रदान की जाती थी, जिसे पूरा परिवार अमृत समझ आपस में बाँट कर खाता था । जाहिर है, किसी एक व्यक्ति के हिस्से में कुछ दाने ही नसीब होते थे । बिजली रहती थी, लेकिन गर्मी के दिनों में भी वे लोग हाथ के पंखे से ही काम चलाते थे । घरेलू कामों के लिए लोग स्वेच्छा से बिजली खर्च नहीं करते थे, क्योंकि राष्ट्रीय कलकारखानों और उद्योगों को पर्याप्त बिजली प्राप्त हो सके, और आज आलम यह है कि जापान न जाने कितने जरुरतमंद देशों का पेट पाल रहा है । राष्ट्रीयता इसका नाम है । नेपाल में आलम यह है कि हम बिना मीटर लगाए ही डाइरेक्ट तार जोड़ कर बिजली का दोहन दिनरात करते रहते हैं, जिसके कारण देश के न जाने कितने कलकारखानों को बिजली किल्लत झेलनी पड़ती है और उत्पादन पर असर पड़ता है । बिजली विभाग के कर्मचारियों द्वारा अगर कभी बिजली चोरी पर नियन्त्रण करने का असफल प्रयास किया भी जाता है, तो हम उसे अपने गांवों या मुहल्ले से मारपीट कर भगा देते हैं । यह एक मात्र क्षेत्र का उदाहरण है । क्या यही हमारी राष्ट्रीयता है ? अपने राष्ट्र के प्रति यही हमारा समर्पण है । हमारा देश कैसे उन्नति करेगा ?
राष्ट्रीयता के बाद आज देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है– संघीयता । संविधान निर्माण का कार्य भी इसी मुद्दे पर आकर अटका हुआ है । संघीयता प्रजातन्त्र की पराकाष्ठा है । संघीयता का एक पहलू यह भी है कि इसमें राज्यों को संघ से अलग होने का भी अधिकार प्रदान किया जाता है । अगर संघ का कोई राज्य केन्द्र के शोषण से परेशान हो या केन्द्र उसके साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है या केन्द के व्यवहार से असंतुष्ट हो तो उसे केन्द्र से अलग होने का पूरा अधिकार होता है । रूस में यही तो हुआ था । लेकिन सवाल है कि जब नेपाल के शासक संघीयता तक देने की मनःस्थिति में नहीं है तो क्या वे अपने राज्यों को यह अधिकार प्रदान करने की हिम्मत जुटाएँगे ? अब चर्चा है देश के तीन मुख्य दल इस बात पर राजी हो गए है कि संघीयता को ठंढे बस्ते में डाल कर संविधान जारी कर दिया जाए ।
आधुनिक राज्य एक सम्प्रभु और स्वाधीन इकाई है यह समझा जाता था और सम्प्रभुता शासक में ही मूर्तिमान, प्रत्यक्ष देखी जाती रही है । सम्प्रभुता के आधुनिक सिद्धान्त के जनक ज्यांबोदां का मानना है कि सम्प्रभुता का अर्थ प्रजा तथा नागरिकों के ऊपर ऐसी सर्वोच्च नियन्त्रण शक्ति से है, जिसे कोई भी सीमित नहीं करता । इसी तरह विधिवेत्ता ओपनहाइम का कहना है कि प्रभुसत्ता किसी भी अन्य सत्ता के नियन्त्रण से मुक्त स्वाधीन शक्ति है । यह बात सर्वविदित है कि ऐसी सत्ता का स्वामी राज्य ही हो सकता है, कोई एक व्यक्ति नहीं । हॉब्स ने ऐसे ही राज्य को लेवियान की संज्ञा दी है और मेकिभावेली का प्रिन्स भी ऐसे ही सम्प्रभु राज्य का शासक है । उदारवादी चिंतकों, रुसो, बुड़रो विलसन आदि ने इस तरह के निरंकुश सम्प्रभुता, सम्पन्न राज्य की अवधारणा को चुनौती दी है, पर यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि यथार्थ में राज्य की सम्प्रभुता विशेष कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रियाकलाप में, अनुभवसिद्ध है । संयुक्त राष्ट्रसंघ घोषणा की पत्र धारा १४ में यह स्वीकार करता है कि राज्य आपसी सम्बन्धों की सम्प्रभुता के सिद्धान्त और अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार संचालित करेंगे ।
राष्ट्र–राज्य की अवधारणा में यह अन्तर्निहित है कि राज्य की पहचान के साथ राष्ट्रीयता का तत्व अभिन्न रूप से जुड़ा रहेगा । और जहाँ तक राष्ट्रीयता का प्रश्न है– इसके उल्लेख के साथ–साथ धर्म, भाषा तथा संस्कृति के उलझे हुए सवाल, राज्य की सत्ता, सामथ्र्य या उसकी कमजोरी के रूप में प्रकट होने लगते है । चूँकि आधुनिक राज्य की सत्ता का आधार धर्म निरपेक्षता बताया जाता है, धर्मगत अन्तर बहुधा राष्ट्र राज्य की एकता एवं अखंडता के लिए खतरा बन जाते हैं । साम्राज्यवाद के युग में उपनिवेशों में धार्मिक एवं भाषाई विविधता के बावजूद सर्वोच्च सत्ता की स्थापना बलपूर्वक सम्भव थी । स्वाधीनता के बाद राज्य की सत्ता को बलपूर्वक थोपना सम्भव नहीं रहा है । इसी कारण आधुनिक राज्य में राष्ट्रवाद की बुनियाद किसी धर्म विशेष या जाति अथवा भाषा पर नहीं रखी जा सकी ।
कुल मिलाकर राष्ट्र राज्य के नागरिक यह बात स्वीकार करते हैं कि उनके सामूहिक हित किसी दूसरे राष्ट्र–राज्य के नागरिकों के सामूहिक हितों की तुलना में अधिक साम्य रखते हैं और इनके संरक्षण के लिए परस्पर सहकार्य जरुरी है । विडंबना यह है कि भूमण्डलीकरण के दौर में अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रियाकलाप की विश्वव्यापी अन्तनिर्भरता ने इस सामान्य ज्ञान को भी विवादास्पद बना दिया है । विश्व व्यापार संगठन की नीतियों ने अप्रत्याशित रूप से संकीर्ण नस्लवाद, साम्प्रदायिक कट्टरपन्थी और प्रतिरक्षात्मक देश प्रेम को भड़काया है ।
उदारवादी तथा माक्र्सवादी चिंतकों का आरम्भ से यह कहना रहा है कि राष्ट्रवाद विभाजक मानसिकता है, जो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बहुत सारी हिंसक मुठभेड़ों के लिए जिम्मेदार है । फासीवाद और नाजीवाद जैसे विकार उग्र राष्ट्रवाद के कारण ही पैदा हुए हैं । माक्र्सवादी विचारक इस बात पर खासकर जोर देते हैं कि विश्व भर के सर्वहारा श्रमिकों के हित समान हैं और यह समझने की जरुरत है कि राज्य एक ऐसी संस्था है, जिसका आविष्कार बुर्जुआ वर्ग ने अपने स्वार्थ साधन के लिए किया था और जिसकी उपयोगिता अब समाप्त हो चुकी है । विडम्बना यह है कि खुद प्रमुख साम्यवादी राज्यों का आचरण राष्ट्रवादी ही देखने को मिला है और उनकी अन्तर्राष्ट्रीयता की पक्षधरता दोहरे मानदंडों वाली ही नजर आई है । द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले सोवियत संघ का आचरण हो या माओवादी चीन का, वियतनाम हो या क्यूबा, पोलैण्ड, रुमानिया अथवा अलबानिया, यही बात सामने आती है कि आधुनिक राज्य की पहचान अभी भी प्रमुखतः राष्ट्र राज्य वाली ही है ।
आधुनिक राज्य की पहचान एक जनतान्त्रिक संस्था के रूप में है । राज्य में सत्तारुढ़ सरकार भले ही तानाशाही हो, उसका प्रयत्न यही रहता है कि खुद को विधिसम्मत, न्यायोचित और शासितों की सहमति के आधार पर स्थापित प्रभावित करने की चेष्टा करे । अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में भी जनतान्त्रिक सिद्धान्त को इतना व्यापक समर्थन प्राप्त है कि जिस राज्य की पहचान जनतान्त्रिक नहीं होती, उसे पूरी तरह से मान्यता नहीं मिलती । आधुनिक राज्य को विकाशोन्मुख राज्य भी कहा जाता है क्योंकि राज्य का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों का सर्वांगीण विकास ही होता है । भौगोलिक एकता एवं अखण्डता की रक्षा के बाद राज्य के बचे हुए कर्तव्यों में नागरिकों के लिए खाद्यान्न, पेयजल तथा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाएँ जुटाना शामिल किए जाते हैं । नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार की यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है । अतः यह सोचना तर्कसंगत नहीं कि सम्पन्न राष्ट्र विकासोन्मुख नहीं होते और आधुनिक राज्य की यह पहचान केवल विकसित देशों पर लागू होती है ।

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