Mon. May 18th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

चार दलों ने मधेश के साथ साथ भारत को भी चुनौती दे दी है : श्वेता दीप्ति

 
श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति

 ९ जुन, काठमांडू | मधेश के प्रति विभेद की नीति ने अपना रूप दिखा ही दिया । सत्तापक्ष की नीयत तो साफ थी किन्तु मधेश के चंद मदारियों ने मधेश की डोर, सत्ता के लोभ में मतलबपरस्तों के हाथों में आखिर सौंप ही दी । आठ साल के तमाशे का अंत इतना कमजोर होगा यह अंदेशा नहीं था और उस पर से तुर्रा ये कि आज तक ऐसा अद्भुत निर्णय विश्व इतिहास में ही नहीं हुआ है और यह २०६२ मंसिर ७ गते को हुए समझौते कि राजनैतिक यात्रा की अंतिम कड़ी है । कहीं ऐसा न हो कि यह राजनैतिक यात्रा, समझदारी की अंतिम कड़ी ही साबित ना हो जाय । जो सरकार प्रदेश का नाम और सीमांकन नहीं निर्धारित कर सकती, एक इस मुद्दे पर सालों साल बरवाद कर सकती है, वो देश का भविष्य क्या निर्धारण करेगी ? आज जब हर ओर चुनौतियाँ ही चुनौतियाँ हैं उस समय बन्द कमरे का यह निर्णय निश्चय ही मधेश और जनजातियों को सशंकित बनाए हुए है । जातीय पहचान और क्षेत्रगत पहचान के विरोधी खुश हैं वहीं इसके पक्षधर असमंजस और सशंकित बने हुए हैं ।

किसी भी प्रदेश का नामकरण करने के लिए क्षेत्रगत विशेषता और जातीय पहचान एक मजबूत आधार होती है और यह प्रदेश की पहचान और संस्कृति बताने में सक्षम भी होती है । इतना तो देश के भविष्य निर्माता जरुर समझते होंगे । प्राकृतिक प्रकोप ने तो देश को हिलाया ही है किन्तु पहाड़ के प्रकोप ने तो मधेश की धरती ही नहीं उसके हृदय को भी छलनी किया है । वर्षों से चले आ रहे संघीयता के मुद्दे को प्राकृतिक प्रकोप की आड़ में सत्ता पक्ष की ओर से विध्वंशित करने की जो साजिश और कोशिश की गई है उसका परिणाम निःसन्देह विध्वंशकारी ही होगा । मधेशवादी नेता जिस माओवादी को अपना हमदर्द बनाए हुए थे वो अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए साथ छोड़ गए । बात उभर कर आई भी थी कि अगर मधेश को अपनी राह तय करनी है तो माओवादियों का साथ छोड़ना ही होगा ।

यह भी पढें   नेपाल-भारत के पत्रकारों की सहभागिता से सम्पन्न हुआ जिला पत्रकार सम्मेलन

जनता की भावना के विपरीत हुए इस फैसले को क्या मधेश और जनजातीय जनता स्वीकार कर पाएगी ? क्या सरकार के इस निर्णय ने गृहयुद्ध को निमंत्रण नहीं दे दिया है ? संघीयता को ताक पर रख कर और जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन प्रणाली की जो अनदेखी की जा रही है वह भविष्य में कौन सा रूप लेने वाली है यह तो समय बताएगा किन्तु आज के परिवेश में यह तो स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि प्राकृतिक प्रकोप ने सत्तालोलुप पक्ष के पौ बारह कर दिए हैं । एक ऐसे शासकीय स्वरूप का निर्माण होने जा रहा है जो आनेवाले वक्त में भी शोषित मधेश और जनजातियों की पक्षधर कभी नहीं हो सकती है । जो शोषित थे उन्हें आगे भी अपने अतीत के साथ ही जीना होगा यह तो स्पष्ट तौर पर जाहिर हो रहा है । आयोगों की कमी नहीं है और उसके नाम पर भत्ता और सुविधा प्राप्त लेने वालों की भी कमी नहीं है । कोई फर्क नहीं पड़ता कि जनता भूख से मरे किन्तु आयोगों का गठन तो होना ही चाहिए उसमें ऐसे सदस्यों की भी नियुक्ति होनी ही चाहिए जो मर्म को कम और भत्ता को ज्यादा समझे । फिर से इसी में लाखों बारे–न्यारे होंगे कुछ वक्त और गुजर जाएगा और उसके बाद ऐसा ही स्वर्णिम क्षण हमें देखने को मिलेगा यही हमारी नियति है । क्योंकि कोई भी आयोग सत्ता से बाहर जाकर निर्णय ले ही नहीं सकता है । क्योंकि पहले के दोनों आयोग के प्रतिवेदन को स्वीकार नहीं किया गया । आज जब नया आयोग गठन होगा तो तय है कि उसमें उनकी ही नियुक्ति होगी जो सत्ता पक्ष के हिमायती होंगे । यह भी हम सब जानते हैं कि आयोग के निर्णय को फिर से व्यवस्थापिका संसद दो तिहाइ मत से पारित करती है ऐसे में एक नए आयोग का क्या औचित्य ? इसलिए हमें कल के परिणाम को आज ही समझ लेना होगा ।

अचानक पूरा परिदृश्य बदल गया है । कल तक जो एक दूसरे से दामन बचाकर और नजरें चुराकर निकल रहे थे वे आज एक दूसरे के हिमायती बने हुए हैं । देश की बागडोर एक ऐसे राजनेता के हाथों में जाने वाली है जो मधेश के अस्तित्व को ही नकारते आ रहे हैं, जो यह समझते हैं कि मधेश को बिहार से अपना हक माँगना चाहिए न कि केन्द्र से, उस शख्स से मधेश की भलाई या विकास की उम्मीद करना तो निहायत बेवकूफी ही होगी । जिनकी बोली मधेश के लिए अधिकार मिलने से पहले गोली का काम करती आई है, वो ओली महाशय मधेश और जनजातियों का बेड़ा पार करेंगे यह सम्भावना दूर–दूर तक नजर नहीं आ रही है । आजतक मधेशी दल न जाने किस खुशफहमी में खोए हुए थे अब तो उन्हें जगना ही चाहिए और संविधानसभा से निकल कर मधेश के हक की लड़ाई लड़नी चाहिए । मधेशी सपूतों के बलिदान को क्या ऐसे ही बेकार जाने देना चाहिए ? आज के परिवेश में आने वाले कल की नब्ज को पहचानना आवश्यक है । जिस एजेण्डा के साथ जनता ने उन्हें संविधान सभा का रास्ता दिखाया था आज वही अपना अस्तित्व खो रहा है इस सच्चाई को मानना होगा और मधेशी जनता के साथ थोड़ी वफादारी तो करनी ही होगी । सिर्फ मधेश ही नहीं जनजातीय समुदायों को भी दाँव पर लगाया जा रहा है । सोलह बुन्दे इस समझौता में प्रदेश को कोई शक्ति हासिल नहीं होने वाली ऐसा नजर आ रहा है । इस हालात में बनने वाले संविधान का क्या होना चाहिए यह तो जागरुक जनता तय करेगी । दलों में संवैधानिक अदालत बनाने की भी सहमति हुई है । कितनी अजीब बात है एक गरीब देश जो विकास तो दूर विकास शब्द से भी कहीं दूर है वहाँ रोज आयोग बनते हैं, रोज एक सरकारी संस्था गठित होती है और उसका सम्भार जनता के खून पसीने की कमाई से होती है और वही जनता अपने मसीहों के द्वारा ठगी जाती है । क्या सर्वोच्च अदालत की परिकल्पना इतनी कमजोर है कि संवैधानिक अदालत बनाने की आवश्यकता आ पड़ी वह भी महज दस वर्षों के लिए और अगर दस वर्षों में कोई निदान नहीं निकला तो ? तो क्या इसकी देखभाल के लिए फिर कोई आयोग गठित की जाएगी ? यह प्रश्न अपनी जगह है ।

यह भी पढें   वर्तमान सरकार उन्हें किसी भी हालत में नहीं बचाएगी और उनपर कारवाई करेगी –सुदन गुरुङ

विनाशकारी भूकम्प के समय तो सत्ता पूरी तरह असफल हुई ही जिसका खामियाजा आज तक पीड़ित भुगत रहे हैं लेकिन अपने इस १६ बुन्दे सहमति के साथ उनकी असफलता और भी खुले रूप में सामने आ गई है । जिस नाम और पहचान के विवाद पर ना जाने कितनी बैठकें हुईं, खर्च हुए उसका आज अचानक समाधान मिल गया । मुद्दा झापा, मोरंग, पश्चिम कैलाली तथा कंचनपुर का था कि ये मधेश के अंग होंगे या पहाड़ के । एमाओवादी और विपक्षी मोर्चा इसे मधेश में चाहते थे और काँग्रेस और एमाले पहाड़ के साथ जोड़ना चाहते थे । किन्तु आज सीमांकन और नम के बिना हुए सहमति पर आसानी से मुहर लग गई है । इससे यह तो तय है कि राष्ट्रीय विपदा के नाम पर राष्ट्रीय सरकार बनाने और मधेशी और जनजातीय जनचाहना के विपरीत जाकर सत्ता हथियाना ही इनका लक्ष्य है । इस सहमति में अगर कुछ है तो सिर्फ और सिर्फ मधेश को दवाने की साजिश । कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा है कि इन चार दलों ने सहमति के नाम पर मधेश के साथ साथ भारत को भी चुनौती दे दी है कि अब देखते हैं कि क्या कर सकते हो ?

यह भी पढें   रक्सौल-वीरगंज मैत्री पुल पर एक चीनी नागरिक को अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते हुए गिरफ्तार

इन हालातों में अब तक मधेशी दलों की खामोशी समझ में नहीं आ रही । क्या अब भी वो सत्ता की गलियारों में भटकने की चाह रखे हुए हैं ? विरोध की जो हल्की और कमजोर सी आवाज उनके द्वारा निकली थी कहीं वो महज दिखावा तो नहीं ? जो भी हो समय मधेश को और मधेशी जनता के हक और अधिकार तथा संघीयता के पक्ष में निर्णय लेने का है ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *