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क्या नेपाल को ‘बांग्लादेश मॉडल’ की ओर धकेला जा रहा है ?

 
राष्ट्रपति रामचन्द्र पॉडेल

सेनापति नहीं, राष्ट्रपति करें वार्ता का नेतृत्व

काठमांडू, 26 भाद्र 2082 । नेपाल इस समय एक गहरे राजनीतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है। सवाल यह है कि इस संकट से देश को निकालने की भूमिका किस संस्था को निभानी चाहिए—सेना या राष्ट्रपति? संविधान का स्पष्ट प्रावधान है कि सेना का काम केवल देश की सुरक्षा और अराजकता रोकना है, न कि राजनीतिक वार्ताओं का नेतृत्व करना। लेकिन हालिया घटनाक्रम इस सीमा को धुंधला करता दिखाई देता है।

जेन-जी आंदोलन और अराजकता की शुरुआत

23 भाद्र को शुरू हुए जेन-जी आंदोलन ने केवल तीन घंटे (सुबह 9 से 12 बजे तक) शांतिपूर्ण ढंग से भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाई थी। लेकिन उसी शाम हालात बिगड़ गए। अराजक समूहों ने सिंहदरबार, सर्वोच्च अदालत, संघीय संसद और यहाँ तक कि राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय को भी आग के हवाले कर दिया।

इस आगजनी और लूटपाट से यह सवाल उठा कि क्या यह आंदोलन वाकई जेन-जी का था या किसी और शक्तिशाली गुट का षड्यंत्र? खासकर जब यह देखा गया कि आक्रमणकारी पहले से तय जीपीएस लोकेशन के आधार पर चुनिंदा नेताओं के घरों और दफ्तरों पर हमला कर रहे थे।

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सुरक्षा तंत्र की नाकामी और संदेह

आंदोलन से एक दिन पहले सुरक्षा अधिकारियों की बैठक में ही ‘घुसपैठ की संभावना’ जताई गई थी। इसके बावजूद पर्याप्त प्रबंध नहीं किए गए। 24 भाद्र को संसद भवन के सामने सुरक्षाबलों द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारी मारे गए। इसके बाद हिंसा और आगजनी और तेज हो गई।

सवाल यह भी है कि पुलिस को आत्मरक्षा तक का अधिकार क्यों नहीं दिया गया और ऊपर से कौन आदेश दे रहा था कि गोली न चलाओ या कार्रवाई मत करो? जब राज्य व्यवस्था विघटित थी, तो “माथि” से आदेश कौन दे रहा था, यह एक पहेली बनी हुई है।

सेना की विवादास्पद सक्रियता

नेपाल के संविधान (धारा 267) में स्पष्ट है कि सेना का सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति होता है और सेना का काम राजनीतिक नहीं बल्कि सुरक्षा संबंधी है। लेकिन हाल में सेनाप्रमुख अशोकराज सिग्देल ने सीधे प्रदर्शनकारियों से संवाद शुरू कर दिया।

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यहाँ तक कि बालेन शाह ने भी लोगों से कहा कि “सेना के साथ वार्ता करने के लिए तैयार रहो।” यह संविधान की भावना के विपरीत है। खासकर जब सेनाप्रमुख ने राष्ट्र के नाम संबोधन में राष्ट्रपति की तस्वीर की जगह पृथ्वीनारायण शाह की तस्वीर लगाई, तो संदेश और भी विवादास्पद हो गया।

क्या नेपाल को ‘बांग्लादेश मॉडल’ की ओर धकेला जा रहा है?

डिस्कॉर्ड चर्चाओं और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में बार-बार बांग्लादेश के छात्र आंदोलन और उसकी जगह बने सैन्य-समर्थित अंतरिम सरकार की चर्चा हो रही है। लेकिन नेपाल बांग्लादेश जैसा एक-भाषा, एक-धर्म वाला राष्ट्र नहीं है। नेपाल बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषिक समाज है। यहाँ यदि सेना को राजनीति में उतारा गया तो स्थिति बेकाबू हो सकती है और संविधान ध्वस्त हो सकता है।

राष्ट्रपति ही ‘इमरजेंसी लाइट’

नेपाल की राजनीति में राष्ट्रपति ही संवैधानिक समाधान के लिए वैधानिक रास्ता खोल सकते हैं। सेना के बजाय राष्ट्रपति कार्यालय को नेतृत्व संभालना चाहिए।
राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने भी हाल ही में बयान जारी कर कहा है कि “समस्या के समाधान की दिशा में काम हो रहा है।” यही संकेत है कि उन्हें संवैधानिक अधिकारों का स्वतंत्र प्रयोग करने दिया जाना चाहिए।

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निष्कर्ष

  • सेना का काम केवल सुरक्षा है, न कि राजनीति।
  • वर्तमान संकट का समाधान राष्ट्रपति के नेतृत्व में संवैधानिक और वैधानिक रास्ते से ही संभव है।
  • नेपाल को किसी भी हालत में ‘बांग्लादेश मॉडल’ की ओर नहीं ले जाना चाहिए।
  • 2072 का संविधान ही नेपाल के बहुलवादी समाज को जोड़े रखने का आधार है और यही लोकतंत्र की रक्षा कर सकता है।

आज आवश्यकता है कि राष्ट्रपति आगे आएं और संविधान के मार्गदर्शन में इस संकट का समाधान खोजें। सेना को राजनीतिक लालसा से दूर रहकर केवल अराजकता रोकने की अपनी मूल भूमिका पर टिके रहना चाहिए।

(जेबी पुन मगर, ध्रुव सिम्खडा और हिमाली दीक्षित द्वारा लिखे गए सम्पादकीय के आधार पर तैयार किया गया यह रिपार्ट)

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