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शेख हसीना – सत्ता से सजा तक की यात्रा : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी अंक नवंबर । बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ लगे ५ गंभीर आरोपों पर अदालत ने फैसला सुनाया है । कोर्ट ने पूर्व पीएम को दोषी बताते हुए, उन्हें फांसी की सजा दी है । अदालत के इस फैसले से न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई है ।

बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (क्ष्ऋत्) ने अपने फैसले में शेख हसीना को मानवता के खिलाफ कदम उठाने का दोषी माना है । कोर्ट ने पूर्व पीएम के अलावा बांग्लादेश के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल के खिलाफ भी कार्रवाई करने का आदेश दिया है ।

आखिर कैसे एक ताकतवर नेत्री के खिलाफ बांग्लादेश की जनता हो गई । जबकि शेख हसीना ने एक समय सैन्य शासित बांग्लादेश को स्थिरता प्रदान की थी । वह दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाली महिला शासन प्रमुखों में से एक रही हैं । सितंबर १९४७ में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) में जन्मी शेख हसीना राजनीति में १९६० में सक्रिय हुईं । उस समय वह ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं ।
अगस्त १९७५ में बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान उनकी पत्नी और उनके तीन बेटों की घर में सैन्य अधिकारियों द्वारा हत्या कर दी गई। हसीना भारत में होने की वजह से बच गई थीं । उन्होंने १९८१ में बांग्लादेश वापसी की और लोकतंत्र को लेकर मुखर हुईं । शेख हसीना ने १९८१ से अपने पिता द्वारा स्थापित अवामी लीग का नेतृत्व किया । हसीना ने अपनी प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया को हराने के बाद १९९६ से २००१ तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया । हसीना के पति परमाणु विज्ञानी थे, जिनकी २००९ में मृत्यु हो गई ।

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शेख हसीना २००१ में चुनाव हार गईं । वह २००९ में पीएम बनी । इसके तुरंत बाद १९७१ के युद्ध अपराध मामलों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया । विपक्ष के कुछ हाई–प्रोफाइल सदस्यों को दोषी ठहराया गया, जिससे हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए ।

इस्लामवादी पार्टी और बीएनपी की प्रमुख सहयोगी जमात–ए–इस्लामी को २०१३ में चुनाव में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया । बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोप में १७ साल जेल की सजा सुनाई गई थी । बीएनपी और उसके सहयोगियों ने गैर–पार्टी कार्यवाहक सरकार के तहत चुनाव की मांग करते हुए वोटों का बहिष्कार किया ।
जनवरी में हसीना ने लगातार चौथी बार जीत हासिल की । पीएम बनने के छह महीने बाद देश में १९७१ के मुक्ति संग्राम में शामिल लोगों के स्वजनों के लिए नौकरी में ३० प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ विरोध शुरू हो गया । विरोध ने हिंसक रूप ले लिया, जिसमें ३०० लोगों की मौत हो गई, जिसके कारण उन्हें देश छोड़ना पड़ा ।
पिछले एक दशक में शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण तरक्की देखने को मिली । किन्तु उसी शेख हसीना को आज उसके देश ने फांसी की सजा सुनाई है । हसीना वर्तमान में भारत में हैं । बांग्लादेश लगातार भारत से हसीना को सौंपने की ममांग कर रहा है । अब सवाल यह उठता है कि सजा के फैसले के बाद भारत क्या कदम उठाता है । वैसे फैसले के बाद भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता बांग्लादेश में शांति, लोकतंत्र, समावेशिता और स्थिरता सुनिश्चित करना है ।

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पूरी उम्मीद है कि शेख हसीना इस सजा के खिलाफ अपील करेंगी । क्ष्ऋत् एक्ट १९७३ की धारा २१ के अनुसार, उन्हें बांग्लादेश में ही घरेलू अपील करनी होगी ये अपील ६० दिनों के भीतर करनी होगी । अगर शेख हसीना ने ६० दिनों में मौत की सजा के खिलाफ बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की तो ये सजा अंतिम हो जाएगी यानि ये लागू मान ली जाएगी । यदि अपील सफल होती है, तो नई सुनवाई या सजा में कमी हो सकती है । बांग्लादेश क्ष्ऋत् के फैसले के खिलाफ सीधे संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार समिति या अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों में भी अपील की जा सकती है, जहां निष्पक्ष सुनवाई के मुद्दों पर शिकायत दर्ज की गई है लेकिन यह कानूनी अपील नहीं, बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायत होगी, जो सजा को स्थगित या रद्द नहीं कर सकती । फिलहाल बांग्लादेश एकबार सिफर सुलग उठा है

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डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक,
हिमालिनी

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