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सीमा पर सख्ती या मधेश को अस्थिर करने की साजिश ?

 

बिराटनगर, 10 अप्रैल । नेपाल–भारत सीमा पर अचानक पहचान पत्र अनिवार्य करने का फैसला केवल प्रशासनिक कदम नहीं दिखता, बल्कि यह तराई–मधेश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर सीधा हस्तक्षेप जैसा महसूस हो रहा है। जोगबनी नाका पर आज से लागू की गई कड़ाई ने हजारों आम नागरिकों को असमंजस में डाल दिया है, जिनका रोज़गार, व्यापार, इलाज, शिक्षा और पारिवारिक संबंध वर्षों से खुली सीमा व्यवस्था पर आधारित रहे हैं।

नेपाल और भारत के बीच 1950 की संधि केवल कागज़ी समझौता नहीं थी, बल्कि दोनों देशों के सीमावर्ती समुदायों के बीच विश्वास और सहज आवागमन की आधारशिला रही है। ऐसे में अचानक “पहचान पत्र अनिवार्य” जैसी नीति लागू करना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सरकार ने मधेश के सामाजिक यथार्थ को समझे बिना यह निर्णय लिया? क्या स्थानीय समुदायों से कोई परामर्श हुआ? या फिर सत्ता एक बार फिर सुरक्षा के नाम पर मधेश को संदेह की निगाह से देख रही है?

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कड़ाई की ज़रूरत अचानक क्यों पड़ी? क्या नेपाल किसी युद्ध जैसी मानसिकता में प्रवेश कर रहा है? क्योंकि जिस तरह की भाषा और प्रशासनिक रवैया सामने आ रहा है, उससे सीमावर्ती जनता में भय और असुरक्षा बढ़ रही है।

बिराटनगर–जोगबनी क्षेत्र केवल सीमा नहीं, बल्कि साझा संस्कृति और अर्थव्यवस्था का जीवंत उदाहरण है। रोज़ाना हजारों लोग बिना किसी जटिल प्रक्रिया के दोनों ओर आते-जाते रहे हैं। अब यदि हर नागरिक को कागज़ दिखाने की बाध्यता होगी, तो सबसे अधिक मार गरीब मजदूरों, छोटे व्यापारियों, छात्रों और मरीजों पर पड़ेगी।

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आलोचक यह भी कह रहे हैं कि काठमांडू की सत्ता बार-बार ऐसे कदम उठाती है, जिनका सबसे बड़ा असर मधेश पर पड़ता है। इससे यह आशंका गहराती है कि कहीं राजनीतिक असफलताओं और प्रशासनिक अव्यवस्था को छिपाने के लिए सीमा और राष्ट्रवाद का मुद्दा तो नहीं उछाला जा रहा।

मेयर की कार्यशैली पर पहले भी “आक्रामक प्रशासन” के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अब सीमा जैसे संवेदनशील विषय पर इस प्रकार की सख्ती ने बहस को और तीखा बना दिया है। लोकतंत्र में सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन जनता को शक की निगाह से देखना और सदियों पुराने सामाजिक रिश्तों को प्रशासनिक आदेशों से नियंत्रित करना खतरनाक प्रवृत्ति बन सकती है।

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यदि सरकार वास्तव में देशहित चाहती है, तो उसे संवाद, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से आगे बढ़ना होगा — न कि अचानक ऐसे फैसलों से, जो मधेश में अस्थिरता और भारत–नेपाल संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा करें।

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