अस्तित्वगत संकट में नेपाल
सी.एन. थारू, आर.के. तामाङ । अपने तीन हजार वर्षों के इतिहास में नेपाल पहली बार एक गंभीर अस्तित्वगत संकट झेल रहा है। भू-राजनीतिक टकराव, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण के शिकंजे में फँसे इस हिमालयी राष्ट्र की स्थिति एक लंबे संक्रमण-काल से गुजर रही है। यह कहना उचित होगा कि अतीत में बिखरी हुई अलग-अलग रियासतों को मिलाकर एक राष्ट्र-राज्य के निर्माण के बाद अपना अस्तित्व बचाने में सफल रहा नेपाल, आज महाशक्तियों के सभ्यतागत और आर्थिक साम्राज्य-विस्तार के बीच अपनी पहचान बचाने की दौड़ में संघर्षरत है।
उपर्युक्त संदर्भ में केवल वैकल्पिक विचार से ही नेपाल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सभ्यतागत और भौगोलिक आधार पर टिकी अपश्चिमीकृत आधुनिकता का मार्ग तय होगा। इसके लिए दार्शनिक बुद्ध छिरिंग मोक्तान ने ‘स्वदेशवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की है। हम इस लेख में वर्तमान समय में संकट से गुजर रहे नेपाल के परिदृश्य, बीते अस्सी वर्षों की राजनीतिक महाभूलों, स्वदेशवाद की दार्शनिक आधारशिला और राष्ट्रीय मुक्ति-क्रांति के विषय में विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे।
नेपाल के भू-राजनीतिक और अस्तित्वगत संकट
आज नेपाल का रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। भू-राजनीतिक स्थिति में रणनीतिक महत्व बढ़ने से कूटनीतिक चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। इसे संभालने के लिए समुचित तैयारी आवश्यक है, और नेतृत्व की परीक्षा इसी समय होने वाली है। महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के चलते संतुलित कूटनीति की आवश्यकता और अधिक मुखर होती जा रही है। आशा है कि नेपाल का यह संक्रमण-काल शीघ्र ही किसी तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचेगा।
नेपाल की स्थिति उत्तर में महाशक्ति चीन और दक्षिण में उभरती हुई शक्ति भारत के बीच है, इसीलिए उसकी भू-राजनीति अधिकांशतः चुनौतीपूर्ण ही दिखाई देती है। 2015 के संविधान के लागू होने के बाद ये चुनौतियाँ और जटिल हो गईं, क्योंकि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और अमेरिकी नेतृत्व वाली इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी (आईपीएस) जैसी रणनीतिक पहलों अर्थात् महाशक्तियों की टकराहट के चलते नेपाल वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन गया है। इन्हीं भू-राजनीतिक दबावों के चलते नेपाल आंतरिक रूप से तीन बड़े संकटों का सामना कर रहा है, जिन्हें हम पश्चिम-केंद्रित आधुनिकीकरण का परिणाम मान सकते हैं।
पहला संकट उच्छेदवादी चेतना के रूप में सामने आया, जिसके चलते हमारे परंपरागत, आध्यात्मिक और सामूहिक ज्ञान तथा मूल्यों को अवैज्ञानिक करार देकर खारिज करने की साजिश हुई। इसके परिणामस्वरूप नेपाली समाज अपनी जड़ों से उखड़ गया और साथ ही उसे अस्तित्वगत शून्यता की स्थिति में धकेल दिया गया।
दूसरा संकट शक्ति की उद्दंडता के रूप में सामने आया, जिसमें विकास के नाम पर पश्चिमी राष्ट्रों के राजनीतिक मॉडल तथा आर्थिक व सैन्य वर्चस्व स्थापित करने की साजिश रची गई। इसके प्रभावस्वरूप हमें स्थानीय ज्ञान और तकनीक से छुटाकर परनिर्भर बनाने का मार्ग दिखाया गया।
तीसरा संकट औपनिवेशिक शक्ति-व्यूह के रूप में सामने आया। हमारे मौलिक ज्ञान, अर्थतंत्र, राजनीति और संस्कृति पर पश्चिमी नियंत्रण बनाए रखने की शक्ति-संरचना थोपी गई, जिससे नव-उपनिवेशवाद विकसित होने लगा और नेपाल की मौलिक पहचान संकट की ओर बढ़ चली है।
बीते अस्सी वर्षों की महाभूलें
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में बीते अस्सी वर्षों के दौरान नेपाली नेतृत्व आधुनिकता के अभ्यास में उतरा। एक सौ चार वर्षों के राणा शासन के विरुद्ध यहाँ उदारवाद और मार्क्सवाद के ढाँचे में विद्रोह हुआ। बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के पश्चिमी उदारवाद और मार्क्सवाद को अपनी शासन-प्रणाली का हिस्सा बनाने के क्रम में नेपाल ने तीन बड़ी भूलें कीं।
पहली भूल, मिथक और परंपरा के प्राधिकार पर प्रहार। इसके कारण हमारे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान को मात्र अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता की कसौटी पर रख दिया गया। परिणामस्वरूप, नेपाली समाज को जोड़ने वाले सांस्कृतिक धागे कमजोर होते चले गए।
दूसरी भूल, झूठी चेतना का प्रवाह। मार्क्सवाद और अन्य आयातित विचारधाराओं के प्रभाव में वर्ग-संघर्ष के नाम पर किसान विद्रोह हुए, जिन्होंने लोगों को भ्रमित किया और समाज में विभाजन तथा द्वंद्व की एक अंतहीन यात्रा शुरू कर दी।
तीसरी भूल, झूठे वादे। उदारवाद और मार्क्सवाद, दोनों विचारधाराओं ने जनता के अधिकार, भूमि और आत्मनिर्णय के अधिकार जैसे प्रश्नों पर झूठे वादे किए। क्रांति के नारों में आकर्षक लगने वाले ये वादे व्यवहार में गरीबी और निराशा ही बढ़ाते रहे।
वैचारिक संकट और युवा पीढ़ी की निराशा
विशेषतः वे नवयुवा, जो परिवर्तन के नारे लगाते हुए गत वर्ष सितंवर में आंदोलन छेड़ बैठे, और वे सब वर्तमान सरकार के नेतृत्वकर्ताओं सहित वैचारिक रूप से खोखले सिद्ध हुए हैं। एक सटीक कहावत है कि देखने में बाँस जैसा लगता है, किंतु भीतर से खोखला होता है। अर्थात् आज का युवा नेतृत्व व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद में फँसा हुआ है। उन्होंने सामूहिक मूल्यबोध और सामाजिक सुरक्षा के मर्म को विस्मृत कर दिया है, अर्थात् वे औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार बन गए हैं।
नव-सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के इस माहौल में नेपाल की सांस्कृतिक विविधता प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित हो रही है। इसके कारण यहाँ की स्थानीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं पर आधुनिकीकरण के नाम पर आघात किया जा रहा है।
इसी वैचारिक शून्यता से देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुशासन जन्मे हैं। आज हजारों युवा पलायन के दौर से गुजर रहे हैं। यह केवल हमारी जनशक्ति का पलायन भर नहीं है, बल्कि इस देश के भविष्य और सांस्कृतिक निरंतरता पर किया जा रहा प्रहार भी है।
नेपाल-भारत के बीच कूटनीतिक आयाम
अंग्रेजों के शासन की शैली बिल्कुल विचित्र थी। उन्होंने हमें सभ्यता का पाठ पढ़ाते हुए भारतवर्ष की शासन-सत्ता हथिया ली। लगभग तीन सौ वर्षों के शासन के दौरान ‘फूट डालो और राज करो’ जैसी नीति अपनाकर उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। आज एक अलग ही मिजाज में नेपाल और भारत के बीच कूटनीतिक अभ्यास चल रहा है।
सभ्यतागत दृष्टि से नेपाल और भारत सनातन प्रज्ञा को भली-भाँति आत्मसात करते हुए चले हैं। दोनों देश सहोदर भाई-बहन की भाँति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना लिए एक ही मूल का प्रतिनिधित्व करते आए हैं। फिर भी, राज्य के स्तर पर नेपाल और भारत अलग-अलग हैं और अंतरराष्ट्रीय सीमा से विभाजित हैं।
यथार्थ यह है कि भारत और नेपाल के बीच सहोदर का संबंध होने के कारण, ये एक ही सभ्यता के दो भिन्न देश हैं। यदि हम यह समझ विकसित कर सकें कि भारत का आर्थिक उन्नयन नेपाल के लिए भी सहयोगी सिद्ध हो सकता है, तो दोनों देशों की जनता अपना भाग्य आजमाने के एक बहुत बड़े अवसर का उपयोग कर सकती है।

लंबे समय तक नेपाल स्वयं को ‘असली हिंदुस्थान’ सिद्ध करने की होड़ में समय गुजारता रहा, जबकि भारतीय उपमहाद्वीप गंगा-जमुनी सभ्यता के माध्यम से भारत को एकीकृत करने का प्रयास करता रहा। परिणाम यह निकला कि न तो भारत पश्चिमा एब्रहामिक (जुडो-ख्रिष्टिय-ईस्लाम) संस्कृति की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठ सका और न ही नेपाल अपने तथाकथित राष्ट्रवादी मनोविज्ञान से। रोटी-बेटी के संबंध टूटते चले गए, और भारतीय विस्तारवाद आरोपित कर के नेपाल में मार्क्सवादी-साम्यवादी शक्तियों का भारत विरोधी संघर्ष निरंतर चलता रहा।
आज हम युवाओं के सितंबर-विद्रोह के पश्चात् के समय में नेपाल और भारत के बीच कूटनीतिक संबंधों पर विमर्श कर रहे हैं। हमारा मानना है कि स्वदेशवाद की वैचारिकी को आत्मसात करते हुए ही नेपाल को अपनी कूटनीति तय करनी होगी। इससे राज्य-राज्य और जनता-जनता के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने का अवसर स्वदेशवाद ही प्रदान करेगा।
बुद्ध छिरिंग मोक्तान का समाधान: स्वदेशवाद
नेपाल के गहरे संकट के समाधान हेतु दार्शनिक बुद्ध छिरिंग मोक्तान का प्रस्ताव है, स्वदेशवाद। यह कोई आयातित विचारधारा नहीं, बल्कि नेपाल की अपनी मिट्टी, भूगोल, ऐतिहासिकता, संस्कृति और सभ्यता पर आधारित एक दार्शनिक दृष्टिकोण है। सनातन प्रज्ञा इस दार्शनिक दृष्टिकोण का स्रोत है, और हम भली-भाँति जानते हैं कि नेपाल की समृद्धि संस्कृति और विकास के संतुलित समन्वय से ही संभव होगी।
स्वदेशवाद पश्चिमीकरण के माध्यम से ‘आधुनिक’ दिखने के भ्रम को खारिज करता है और अपश्चिमीकृत आधुनिकता को अपनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार यह नेपाल के यथार्थ रूप में दिखाई देने वाली विविधता का सम्मान करते हुए एक साझा नेपाल के निर्माण की योजना प्रस्तुत करता है। भारतीय उपमहाद्वीप की तीन महान बौद्धिक परंपराओं और तीन सिद्धांतों पर आधारित स्वदेशवाद का यह दार्शनिक दृष्टिकोण हमें अपना-सा प्रतीत होता है और सर्वस्वीकार्य भी है।

स्वदेशवाद के तीन स्रोत और तीन सिद्धांत
स्वदेशवाद का दार्शनिक दृष्टिकोण समावेशी और समग्र प्रतीत होता है। यह केवल परंपरावादी नहीं है, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की तीन बौद्धिक परंपराओं का समन्वय करता है, अर्थात् यह तीन स्रोतों और तीन सिद्धांतों के माध्यम से संचालित होता आया है।
स्वदेशवाद के तीन स्रोत
1. ब्राह्मण परंपरा: यह परंपरा वैदिक ऋषि-परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। इसका ब्रह्मांडीय नियम, नैतिक व्यवस्था और मानव-प्रकृति संबंध से गहरा नाता है। इसीलिए ब्राह्मण परंपरा की शक्ति उसके समग्र दृष्टिकोण में निहित है। यह ऋषि-परंपरा के माध्यम से ज्ञान, तपस्या और आत्मज्ञान को मूल्य प्रदान करती है, जिसमें मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक सभी एक ही ढाँचे में समन्वित होते हैं।
2. श्रमण परंपरा: इसे बौद्ध और जैन परंपरा के रूप में समझा जाता है। यह परंपरा सभी जीवों के प्रति समान करुणा और अहिंसा की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाती है। ब्राह्मण परंपरा की तुलना में श्रमण परंपरा को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी माना जाता है, क्योंकि इसमें सभी लोगों के लिए मुक्ति का मार्ग समान रूप से दर्शाया गया है। इस परंपरा का बल सामूहिक कल्याण, अंतर-संबंध और सहकार्य के विस्तार में निहित है।
3. लोकायत परंपरा: लोकायत परंपरा भौतिकवादी दृष्टिकोण प्रदान करती है। तर्क, अनुभव और वैज्ञानिक पद्धति में विश्वास रखते हुए यह परंपरा अलौकिक शक्तियों को अस्वीकार करती है। इसमें भौतिक संसार के महत्व और सुख-दुःख की वास्तविकता को मान्यता दी गई है, साथ ही मानवीय बुद्धि और प्रकृति की शक्ति में विश्वास व्यक्त किया गया है।
स्वदेशवाद के सिद्धांत
1. ऋत (ब्रह्मांडीय नियम और नैतिक व्यवस्था): स्वदेशवाद में ऋत के प्रयोग से समाज में नैतिक व्यवस्था, न्याय और प्रकृति के सम्मान को जोड़ा गया है। यह हर मनुष्य को अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करने और कर्म (कार्य) के माध्यम से समाज तथा ब्रह्मांड के बीच समन्वय और संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इसीलिए ऋत केवल एक अमूर्त अवधारणा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक जीवन-पद्धति भी है।
2. प्रतीत्यसमुत्पाद (अंतर-संबंध और अंतर्निर्भरता): स्वदेशवाद में प्रतीत्यसमुत्पाद का गहरा महत्व है। यह आधुनिक पारिस्थितिकी-विज्ञान और प्रणाली-सिद्धांत (सिस्टम्स थ्योरी) के साथ पूर्णरूपेण संगत है। प्रतीत्यसमुत्पाद यह मान्यता प्रदान करता है कि कोई भी वस्तु स्वतंत्र और स्थायी अस्तित्व में नहीं रहती, बल्कि सभी वस्तुएँ आपस में अंतर-संबंधित रहती हैं।
3. अनेकांत (बहुविचार और सापेक्ष सत्य): जैन दर्शन पर आधारित अनेकांतवाद के अनुसार किसी भी सत्य को केवल एक ही दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। यह बहुविचार अथवा गैर-निरपेक्षवाद का एक स्वरूप है। अर्थात् अनेकांतवाद आधुनिक बहु-सांस्कृतिकवाद और समावेशी लोकतंत्र के सिद्धांतों से पूर्णरूपेण संगत है, और आज के तकनीक-युक्त संसार में भी विमर्श, संस्थाओं और नीतियों को महत्त्वपूर्ण मानकर चलने की राह प्रदान करता है।
तीन स्रोतों और तीन सिद्धांतों के बीच समन्वय
स्वदेशवाद से जुड़े ये तीन स्रोत और तीन सिद्धांत परस्पर अंतर्निहित और समन्वित प्रतीत होते हैं। यहाँ ब्राह्मण परंपरा ऋत के माध्यम से आध्यात्मिक और नैतिक आधार प्रदान करती है, तो श्रमण परंपरा बौद्ध मध्यमक के प्रतीत्यसमुत्पाद और जैन अनेकांतवाद के माध्यम से न्याय, करुणा और अंतर-संबंध का दृष्टिकोण देती है। साथ ही, लोकायत परंपरा लोक-जीवन के माध्यम से भौतिक वास्तविकता, तर्क और बहुविचार को मान्यता दिलाती है।
जीवन और जगत संबंधी समझ को स्पष्ट करने में ये तीनों स्रोत और तीनों सिद्धांत प्रभावकारी सिद्ध हुए हैं। संसार में जो अनिश्चितता और भ्रम का वातावरण व्याप्त है, उससे मुक्ति पाने का मार्ग भी स्वदेशवाद सुझाता है। इसीलिए बुद्ध छिरिंग मोक्तान का स्वदेशवाद का यह प्रस्ताव किसी जड़ता के लिए नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी के भ्रम को चीरने के लिए एक सशक्त ज्ञान-मीमांसीय विकल्प भी है।
राष्ट्रीय मुक्ति-क्रांति: एक सशक्त विकल्प
दार्शनिक बुद्ध छिरिंग मोक्तान के प्रस्ताव पर आधारित स्वदेशवाद राष्ट्रीय मुक्ति-क्रांति को दिशा-निर्देश देने में सक्षम है। नेपाल के संदर्भ में युवाओं के अधूरे विद्रोह के पश्चात् यह और भी सार्थक हो गया है। यह अतीत के हिंसात्मक और विभाजनकारी आंदोलनों के बदले एक एकीकृत आंदोलन है। एक एकीकृत योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय मुक्ति-क्रांति को संपन्न करने से साझा नेपाल का निर्माण सभी जाति, भाषा-भाषी और सांस्कृतिक समुदायों की जनभागीदारी के बल पर होगा। अहिंसा पर आधारित यह क्रांति स्वाभाविक रूप से सनातन प्रज्ञा में निहित विशेषताओं से परिपूर्ण होगी।
अंततः, जैसे-जैसे नेपाल अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है, इसका समाधान अत्यावश्यक हो गया है। यदि नेपाल को असफल राष्ट्र की ओर धकेला गया, तो सारा सपना एक राजनीतिक धोखाधड़ी (स्कैम) प्रतीत होगा। वर्तमान अयोग्य नेतृत्व और परंपरागत राजनीतिक दलों (नेपाली कांग्रेस, नेकपा, एमाले आदि) से अब पार पाना नामुमकिन है। बीते अस्सी वर्षों के परिणाम हमारे सामने हैं, जहाँ आयातित विचारधाराओं और शासन-प्रणालियों के अंधानुकरण ने देश को इस स्थिति तक पहुँचा दिया है।
अब एक निर्भीक नेतृत्व की आवश्यकता है, जो स्वदेशवाद की दार्शनिकी को आत्मसात कर सके। नेपाल के अस्तित्व की रक्षा करने और एक समृद्ध, शांत तथा साझा नेपाल के निर्माण के लिए जो भी भूमिका आवश्यक हो, उसे निभाने के लिए तैयार रहना होगा। अर्थात् ब्राह्मण परंपरा के ऋत (नैतिक नियम), श्रमण परंपरा के प्रतीत्यसमुत्पाद (अंतर-संबंध और करुणा) तथा लोकायत परंपरा के अनेकांत (बहुविचार और सहिष्णुता) को आत्मसात करके ही देश का संकट दूर किया जा सकेगा।
इसीलिए आवश्यक है कि स्वदेशवाद एक सशक्त दार्शनिक दृष्टिकोण सिद्ध हो, ताकि इसके सहारे नेपाल नव-औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त होकर सही अर्थों में स्वाधीन और समृद्ध बन सके। यह राह कठिन अवश्य है, किंतु आवश्यक भी है, क्योंकि नेपाल का भविष्य इसी राह से होकर गुजरेगा।
(सी.एन. थारू राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति के सह-संयोजक हैं और आर.के. तामांग ‘समान नेपाल’ के प्रवक्ता हैं।)


