Sun. Oct 25th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

‘हे भगवान, मेरा सिंदूर न मिटे’ रोती-बिलखती गर्भवती इदिरा की पुकार

 

रोती-बिलखती गर्भवती इदिरा की पुकार, जिसके भीतर एक पत्नी का डर और एक मां की चिंता दोनों समाई हैं

पिपरा, महोत्तरी, हिमालिनी विशेष। आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। आवाज कांप रही थी। चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। गर्भवती इदिरा बार-बार भगवान से एक ही प्रार्थना कर रही थी—“हे भगवान, मेरा सिंदूर न मिटे।”

उसकी यह पुकार महज एक महिला की भावुक अपील नहीं थी। इसके पीछे अपने पति को खो देने का भय था, आने वाले बच्चे के भविष्य की चिंता थी और उस परिवार के बिखर जाने का डर था, जिसकी उम्मीद अब एक मां की आंखों और माथे के सिंदूर से जुड़ी दिखाई दे रही थी।

इदिरा गर्भवती है। उसके गर्भ में एक नई जिंदगी पल रही है। जिस समय उसे अपने आने वाले बच्चे के स्वागत की तैयारियों और भविष्य के सपनों में होना चाहिए था, उस समय वह भय और अनिश्चितता के बीच अपने पति की सलामती के लिए प्रार्थना कर रही है।

उसकी सिसकियों के बीच निकलते शब्द आसपास मौजूद लोगों को भी विचलित कर देते हैं।

“मेरा सिंदूर न मिटे…”

यह वाक्य बार-बार उसके होंठों पर आता है।

एक पत्नी की सबसे बड़ी चिंता

किसी भी परिवार के लिए पति या पिता को खोने का डर असहनीय होता है। लेकिन गर्भवती महिला के लिए यह डर और गहरा हो जाता है। उसके सामने केवल अपना भविष्य नहीं होता, बल्कि उस बच्चे का भविष्य भी होता है जो अभी जन्म लेने वाला है।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 21 अक्टुबर 2026 बुधवार* शुभसंवत् 2083

इदिरा की स्थिति इसी पीड़ा को सामने लाती है।

वह अपने पति के साथ आने वाले दिनों की कल्पना कर रही थी। उसके घर में एक बच्चे के आने की तैयारी हो रही होगी। लेकिन परिस्थितियों ने उसके सामने ऐसा भय खड़ा कर दिया है, जिसमें खुशियों से ज्यादा चिंता दिखाई दे रही है।

उसके आंसुओं में सवाल है—अगर पति को कुछ हो गया तो?

बच्चे के जन्म के समय उसके साथ कौन होगा?

उस बच्चे के सिर पर पिता का हाथ कौन रखेगा?

इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है।

माथे का सिंदूर बना उम्मीद का प्रतीक

भारतीय समाज में सिंदूर को लंबे समय से वैवाहिक जीवन और सुहाग से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि इसके सामाजिक अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इदिरा के लिए इस समय यह उसकी निजी उम्मीद का प्रतीक बन गया है।

वह अपने माथे पर लगा सिंदूर बचाए रखना चाहती है।

उसके लिए यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अपने पति के जीवित और सुरक्षित होने की कामना है।

इसीलिए वह भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है।

उसकी आंखों से आंसू रुकते नहीं।

वह खुद को संभालने की कोशिश करती है, लेकिन मातृत्व और वैवाहिक जीवन से जुड़ा भय उसे बार-बार तोड़ देता है।

गर्भ में पल रहा बच्चा, बाहर खड़ा संकट

इदिरा की कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि वह अकेली नहीं है।

उसके भीतर एक बच्चा सांस ले रहा है।

यह भी पढें   जीवन संघर्ष : अभाव से सत्ता के शिखर तक पहुँचे लखन दास तत्मा : कैलास दास

वह बच्चा अभी इस दुनिया की मुश्किलों से अनजान है। उसे नहीं मालूम कि उसकी मां किस भय से गुजर रही है। उसे नहीं मालूम कि बाहर उसकी मां की आंखों से आंसू क्यों बह रहे हैं।

लेकिन इदिरा जानती है।

इसीलिए उसकी चिंता केवल अपने लिए नहीं है।

वह उस बच्चे के लिए भी डर रही है, जिसके जन्म से पहले ही उसके भविष्य पर अनिश्चितता की छाया पड़ गई है।

एक मां के लिए इससे बड़ा डर शायद ही कोई हो—अपने बच्चे को पिता के स्नेह से वंचित होते देखने की आशंका।

आंसुओं के बीच बची हुई उम्मीद

इदिरा की तस्वीर या उसका रोता हुआ चेहरा देखने वाला शायद सबसे पहले उसके आंसुओं को देखेगा। लेकिन उन आंसुओं के पीछे एक उम्मीद भी दिखाई देती है।

वह उम्मीद कि सब ठीक हो जाएगा।

वह उम्मीद कि उसका पति सुरक्षित रहेगा।

वह उम्मीद कि उसके बच्चे का जन्म एक पूरे परिवार के बीच होगा।

और वह उम्मीद कि उसके माथे का सिंदूर यूं ही बना रहेगा।

इसी उम्मीद के सहारे वह भगवान को पुकार रही है।

“हे भगवान, मेरा सिंदूर न मिटे…”

कुछ वाक्य खबर से आगे निकलकर मानवीय दस्तावेज बन जाते हैं। इदिरा के ये शब्द भी ऐसे ही हैं।

इन शब्दों में एक पत्नी की व्याकुलता है, एक होने वाली मां की चिंता है और उस परिवार की पूरी उम्मीद है जो इस वक्त संकट से गुजर रहा है।

यह भी पढें   भारत में बने प्रियागोल्ड बिस्किटों के आयात, बिक्री और वितरण पर नेपाल ने रोक लगाया

सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं

इदिरा की पीड़ा को केवल व्यक्तिगत घटना मानकर छोड़ देना आसान है। लेकिन ऐसी घटनाएं यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि संकट के समय सबसे ज्यादा कीमत आखिर कौन चुकाता है?

अक्सर घटना का केंद्र कोई एक व्यक्ति होता है, लेकिन उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है।

एक पति संकट में होता है तो पत्नी की दुनिया बदल जाती है।

एक पिता संकट में होता है तो बच्चों का भविष्य अनिश्चित हो जाता है।

और जब पत्नी गर्भवती हो, तो आने वाली संतान भी उस अनिश्चितता का हिस्सा बन जाती है।

इदिरा के आंसू इसी व्यापक मानवीय पीड़ा की तस्वीर हैं।

अंत में बस एक प्रार्थना

उसके पास इस समय शायद बहुत कुछ कहने के लिए नहीं है।

न कोई लंबी मांग।

न कोई बड़ी इच्छा।

न भविष्य के लिए कोई बड़ा सपना।

उसकी प्रार्थना बहुत छोटी है, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा है—

“हे भगवान, मेरा सिंदूर न मिटे।”

एक गर्भवती पत्नी अपने पति की जिंदगी की दुआ मांग रही है।

एक मां अपने बच्चे के भविष्य की सुरक्षा मांग रही है।

और एक परिवार अपने बिखरने से बच जाने की उम्मीद लगाए बैठा है।

इदिरा की आंखों से गिरता हर आंसू इसी उम्मीद की कहानी कह रहा है—
कि उसका सुहाग बचा रहे, उसका परिवार बचा रहे और उसके आने वाले बच्चे को अपने पिता का हाथ न खोना पड़े।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com