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निकष पर नेपाल–भारत सम्बन्ध

 

कुमार सच्चिदानन्द:नेपाल और भारत का सम्बन्ध आज इतिहास के सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है । पेट्रोलियम और आवश्यक

यह तो माना ही जाना चाहिए कि लोकतंत्र और प्रजातंत्र की बात हमारी राष्ट्रीय राजनीति में चाहे जितनी भी की जाए मगर हम अपने राजनैतिक संस्कारों को स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व की मीठी चासनी में अब तक नहीं डुबा पाए हैं । यही कारण है कि नए संविधान का मसौदा जब सर्वसमक्ष आया तो उसमें वे बिन्दु भी गायब थे जो विगत में धारावाहिक रूप में हुए मधेश आन्दोलन के द्वारा स्थापित थे । नागरिकता आदि के मामले में यह मसौदा और अधिक दक्षिणपंथी सिद्ध हुआ जिसे कम से कम मधेश किसी भी हालत में स्वीकार करने की मनःस्थिति में नहीं था
सामानों की आपूर्ति की दृष्टि से सीमाएँ लगभग बन्द हैं । नेपाल जहाँ अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारत द्वारा अघोषित नाकाबन्दी का आरोप लगाकर उसे कठघरे में खड़ा करना चाहता है वहीं भारत नेपाल की तराई में लगभग विगत पचास दिनों से चल रहे आमहड़ताल, बन्द और कर्प्mयू का हवाला देकर सामानों की सहज आपूर्ति न हो पाने की बात लगातार कह रहा है । विवाद जारी है मगर अभाव और दुश्चिन्ता का काला साया पूरे नेपाल को अपने आगोश में समेटने लगा है । विडम्बना यह है कि इस मुद्दे पर पूरा देश दो पाटों में विभाजित है । एक वर्ग ऐसा है कि इस अभाव को भारत द्वारा सृजित मानकर उसके प्रति अपनी आक्रामकता प्रकट कर रहा है और अनेक स्थलों पर यह सतह पर और सड़कों पर भी देखी जा रही है जिसके तहत अनेक अशोभनीय काम भी हुए हैं और हो रहे है, जबकि एक वर्ग ऐसा है जो वत्र्तमान परिस्थिति की जटिलताओं को समझते हुए भी किसी हाल में झुकने के लिए तैयार नहीं है और इस सन्दर्भ में भारतीय पक्ष का समर्थन करते आ रहे हैं । आज ऐसी जटिल परिस्थिति में अगर देश उलझा हुआ है तो इसके केन्द्र में उस शासक मनोविज्ञान को माना जा सकता है कि जब नव–संविधान के मसौदे में अपने हितों की उपेक्षा की बात को लेकर देश की लगभग आधी आवादी आन्दोलन करती रही मगर सरकार और उसे समर्थन दे रहे राजनैतिक दलों ने अपनी अभिजात्यवादी मानसिकता के कारण उससे बात तक करना अपने लिए शर्मनाक माना ।

लगभग पूरी तराई में आन्दोलन चलता रहा, अराजकता के नाम पर निहत्थी जनता पर गोलियाँ दागी जाती रही, कपर््mयू तथा दंगाग्रस्त क्षेत्र की आड़ में बन्द की अवहेलना कर बन्दूक की नोक पर ट्रकों और कण्टेनरों का काफिला राजधानी भेजा जाता रहा । एक ओर तराई–मधेश में केन्द्र के प्रति आक्रामकता और निराशा बढ़ती जा रही थी दूसरी ओर ‘हाँ–ना’ के यान्त्रिक आलाप पर संविधान की धाराएँ पास होती रही । कहा जाता है कि राजनीति भावुकता नहीं लेकिन राजधानी में इसकी नदी ऐसी बही कि सारे दल, नेता और यहाँ तक कि अधिकांश जनता इस नदी में अवगाहन कर तथा शासनादेश पाकर दीपावली मना रहे थे, दूसरी ओर पूरी तराई विशेषतः मधेशी बहुल क्षेत्र अंधकार को निमंत्रित कर अपनी उपेक्षा और निराशा का संकेत राज्य को दे रहे थे । लेकिन राज्य ने एक अबोध और जिद्दी बच्चे के अनवरत रोदन से अधिक इसकी अहमियत नहीं दी । बस क्या था अब तो ऐसी लकीर खींची जा चुकी कि सही–गलत सब परिभाषाशून्य, एक का गलत दूसरे का सही । आज स्थिति यह है कि विपरीत मानसिकता के मल्ल–युद्ध में देश फँसा है मगर समस्या को जड़ से समाप्त करने की दिशा में जो प्रयास होने चाहिए वह नहीं देखा जा रहा है और विकल्पों की तलाश की बात ओजमय वाणी में लगातार अभिव्यक्त की जा रही है ।
यह तो माना ही जाना चाहिए कि लोकतंत्र और प्रजातंत्र की बात हमारी राष्ट्रीय राजनीति में चाहे जितनी भी की जाए मगर हम अपने राजनैतिक संस्कारों को स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व की मीठी चासनी में अब तक नहीं डुबा पाए हैं । यही कारण है कि नए संविधान का मसौदा जब सर्वसमक्ष आया तो उसमें वे बिन्दु भी गायब थे जो विगत में धारावाहिक रूप में हुए मधेश आन्दोलन के द्वारा स्थापित थे । नागरिकता आदि के मामले में यह मसौदा और अधिक दक्षिणपंथी सिद्ध हुआ जिसे कम से कम मधेश किसी भी हालत में स्वीकार करने की मनःस्थिति में नहीं था । प्रतिनिधित्व से समावेशी शब्द को गायब कर तथा अन्य अनेक प्रावधानों को असंगत रूप में अपनाकर या हटाकर मसौदा समिति ने एक तरह से यह संकेत मधेश के लिए दे दिया कि इस देश में लोकतंत्र या गणतंत्र का अर्थ नेपाल की तराई में पारम्परिक रूप से रहने वाली जाति–जनजाति के लिए शासकों के पारम्परिक भेदभावपूर्ण मनोविज्ञान को झेलने के सिवा और कुछ नहीं है । यहाँ तक कि पहाड़ की अनेक जनजातियाँ भी इसमें अपनत्व का एहसास नहीं कर रही थी । परिणाम तो साफ था कि राष्ट्रव्यापी विरोध प्रारम्भ हुआ और मधेश में आन्दोलन को नई दिशा देने की चेतना प्रवाहित हुई । इसी के तहत भारत के साथ नेपाल के प्रमुख नाकों के अवरुद्ध किया गया जो आलेख लिखने तक जारी है । कारण जो भी हो सामानों की आपूर्ति सहज रूप से न हो पाने का कारण यही है और मधेश की जनता इस नाकाबंदी के पक्ष में गाँव–गाँव में सचेत है और भारत के प्रति कृतज्ञता का अनुभव महज इसलिए कर रही है क्योंकि नाकाबन्दी को नेपाल की आन्तरिक अशांति मानते हुए स्थिति सहज न होने तक सामग्रियों की सहज आपूर्ति नहीं हो पाने की बात जगजाहिर कर चुकी है । यह सच है कि चालीस दिनों की बन्दी से शासनतंत्र के कान पर जूँ तक नहीं रेंगे थे, मगर नाकाबन्दी का एक–एक दिन उन्हें बखूबी समझा रहा है कि इस देश के तराई–मधेश में भी लोग हैं, जो जीवित हैं और अब षड्यंत्र तथा शब्दजाल से शासन चलाने का दिन गुजर चुका । कालान्तर में समानता के आधार पर एक–एक चीज का हिसाब उन्हें देना होगा ।
आज अनेक लोग हैं जो सम्पूर्ण घटनाक्रम के लिए भारत को जिम्मेवार मान रहे हैं । वे यह मानने के लिए कथमपि तैयार नहीं कि शासन हो या संविधान, देश की लगभग आधी आबादी उनकी कार्यनीतियों के विरोध में है । यह अलग बात है कि भारत सुरक्षा का हवाला देकर आपूर्ति सहज नहीं हो पाने की बात कह रहा है और यह असुरक्षा का भाव मधेश की जनता द्वारा उत्पन्न की गई है । उनकी बौखलाहट इस लिए भी है कि उनके पास दमन की डंडे और गोलियाँ हैं मगर इसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो गया है और आन्दोलन को मूकदर्शक के रूप में देखना और किंकत्र्तव्यविमूढ़ होकर असन्तुष्ट पक्ष से बात करना उनकी मजबूरी बन गई है । मगर एक बात तो मानी ही जा सकती है कि आज जो परिस्थिति उत्पन्न हुई है उसका जिम्मेवार महज यह मधेश आन्दोलन मात्र नहीं वरन इसके बीज तो अतीत में ही मिट्टी में डाले जा चुके थे और यह विकसित होता गया । जब हम निकट अतीत के पन्नों को पलटते हैं तो देखा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब भारत में भाजपा गठबंधन की सरकार बनी तो उन्होंने भारत की पारम्परिक विदेश नीति मे परिवत्र्तन का संकेत देते हुए पड़ोसियों से अच्छे सम्बधों की दुहाई दी और नेपाल की यात्रा को भी अपनी प्राथमिकता में रखी तथा अपनी दूसरी विदेश–यात्रा के लिए नेपाल को चुना ।
यह जितना बड़ा सच है कि भारत संवैधानिक रूप एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, यह भी उतना ही बड़ा सच है कि सनातन धर्म और प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति व्यक्तिगत रूप से मोदी में गम्भीर आस्था है । इसी के तहत उन्होंने जगत–जननी–जानकी की जन्मभूमि मे जाकर माथा टेकने की इच्छा जतलायी । लेकिन नेपाल उनका अपना देश नहीं था । जनकपुर और उनके आसपास की जनता लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष छू रहे मोदी के लिए पलक पाँवड़े बिछाकर बैठी थी दूसरी और सरकार और अन्य दलों ने उनकी इस आकांक्षा को विवाद का विषय बना दिया और अन्ततः उन्हें अपनी यह यात्रा स्थगित करनी पड़ी । लेकिन इसका शिकन तक उन्होंने अपने चेहरे पर नहीं आने दिया । जब उन्होंने नेपाल की व्यवस्थापिका संसद को संबोधित किया तो उस भाषण में नेपाल के प्रति उनकी आत्मीयता और भावुकता की ऐसी धारा प्रवाहित हुई कि वहाँ उपस्थित सारे लोग तालियों की गड़गड़ाहट करते हुए इसमें डूबते–उतराते नजर आए । मगर सत्ता और उसके भागीदारों का एक पक्ष ऐसा था कि जो उनकी जनकपुर यात्रा को स्थगित करवाकर उसे अपनी मानसिक विजय समझ रहा था । लेकिन जो यहाँ की भूराजनैतिक परिदृश्य और श्री मोदी के मनोविज्ञान को समझ रहे थे, उन्होंने सम्बन्धों में दरार की पतली रेखा तो वहीं देखी थी ।
नेपाल की विधायिका संसद को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने ऋषिमन की बात कही थी, ऐसे गुलदस्ते का हवाला दिया था जिसमें हर वर्ग के फूल होने का एहसास हो । उन्होंने यहाँ की शान्ति प्रक्रिया की दुहाई देते हुए ऐसे संविधान की बात कही थी जिसमें सदियों तक देख सकने की क्षमता हो । दरअसल यह मोदी नही ंबल्कि एक प्रजातांत्रिक देश का अनुभव बोल रहा था । मगर इसकी भी आलोचना दबी जुबान में संचार माध्यमों में हुई कि उनका भाषण अभिभावकत्व के भाव से भरा था । शायद इस लिए संविधान निर्माण में सहभागिता दे रहे देश के महत्वपूर्ण दलों ने संविधान निर्माण की प्रक्रिया और इसमें की गई व्यवस्थाओं में इस बात का स्पष्ट संकेत दिया कि वे इन आदर्शपरक बातों को सुन और समझ तो सकते हैं मगर व्यवहार में उतारना उनके लिए संभव नहीं । कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस दल ने दशकों जनयुद्ध का संचालन किया, हजारों जनता ने दोहरे भीड़ंत में अपनी कुर्बानी दी, वह भी परिवत्र्तन के नाम पर राजतंत्र के अंत और संविधान के नाम पर जननिर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संविधान निर्माण की बात छोड़कर परिवत्र्तनविरोधी दलों के ताल में ताल मिलाते नजर आ रहे हैं । आज जो परिस्थिति सृजित हुई है उसके मूल में किसी न किसी रूप में देश के महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों का वह मनोविज्ञान है जिसके तहत सदियों से विकसित शासन संजाल जो शोषण और उपेक्षा की जमीन तैयार करता है, उसके मोह से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाना है ।
लेकिन इन बातों से पूरी तरह स्वयं को अलग रहते हुए भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नेपाल की शांति प्रक्रिया से इतने अभिभूत थे कि कई अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से उन्होंने इसकी सराहना की और शस्त्र छोड़कर बुद्धत्व का संदेश विश्व को दिया । अपनी बेमिसाल उदारता का परिचय तो उन्होंने तब दिया जब महाभूकंप की विनाश लीला यहाँ आई और महज चन्द घण्टों में उन्होंने बिना किसी औपचारिकता राहतदल और सामग्री नेपाल की धरती पर उतार दिया और मुक्त हृदय से सहयोग की न केवल घोषणा की वरन् अपनी घोषणाओं को अमली जामा भी पहनाया । एक स्वर से नेपाल की जनता जब भारत धन्यवाद दे रही थी और उसके प्रति अभिभूत नजर आ रही थी तो अप्रत्याशित रूप से नेपाल में ऐसा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समूह सक्रिय हो गये जो यहाँ भारत के विरुद्ध भ्रम की खेती करते हैं । उन्हें लगा कि कहीं न कहीं उनकी जमीन गुम हो रही है । नेपाल के जिस खास वर्ग में समय–समय पर भारत के विरोध का बहाना बनाकर बितण्डा मचा देने की प्रवृत्ति हावी रही है । ऐसे लोगों का आधार एकाएक जब गुमने लगा तो उनकी सक्रियता बढ़ी । बेबुनियाद और तर्कहीन विरोध की आवाज बुलंद करने वालों की प्रथम पंक्ति में नेपाल के सूचना तंत्र थे और दूसरी पंक्ति में ऐसे राजनीतिकर्मी जो उग्रराष्ट्रवाद के नाम पर जन–संग्रह कर अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकतें हैं । सामाजिक संजाल में इसी मनोविज्ञान के लोग बेबुनियाद विरोध की हवा को गति देते रहे और भारतीय कूटनीति किंकत्र्तविमूढ़ की अवस्था में यहाँ के लोगों का मनोविज्ञान और घटनाक्रमों को निहारती रही । गौरतलब है कि मधेश उस समय भी पूर्ण रूप से भारतीय सहयोग के प्रति सकारात्मक सोच से भरा था । नेपाल के शासकीय दृष्टि से इस घटना का चाहे जो भी विश्लेषण किया जाए मगर भारतीय कूटनीति के लिए तो यह सोचने का विषय बन ही गया कि मुक्त हृदय से सहयोग पर भी अगर गालियाँ मिलती है तो इस आलोचक मनोवृत्ति के मन पर विजय का दूसरा माध्यम क्या हो सकता है ?
तस्वीर का दूसरा रुख यह था कि महाभूकंप की आपदा से मिलकर निबटने के लिए सहमतीय सरकार की बात की गई । यद्यपि लोकतंत्र की दृष्टि से यह एक महाभूल थी क्योंकि उस समय भी सरकार के पास दो तिहाई का बहुमत था जो शासन के समस्त तंत्रों को नियंत्रित करने में सक्षम था लेकिन इसने सत्ता से बाहर के दल को सत्ता में शामिल होन का अवसर दिया और एक तरह से व्यवस्थापिका संसद विपक्ष विहीन बन गया जो लोकतंत्र का सौन्दर्य होता है । विपदा के मुद्दे गौण हो गए, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की समस्याएँ ओझल में चली गई और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने के मोह में शासन में सहभागिता दे रहे दलों ने पीडि़त–उपेक्षित वर्ग की आवाज और संवेदना को बिना सुने संविधान निर्माण की प्रक्रिया में तीव्र और अवैज्ञानिक गति से संलग्न हो गए । इसे आत्मीयता का तकाजा कहें या कूटनीति का कि भारत बार–बार कहता रहा कि नेपाल और भारत की सीमाएँ खुली हैं । सीमावर्ती क्षेत्र में अशांति, संघर्ष और अराजकता का खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है, इसलिए उस वर्ग की माँगों को भी समेटा जाना चाहिए । मगर ‘बनायुद्धेन केशवः’ के मनोविज्ञान से पीडि़त देश के शीर्ष नेताओं ने इसे किसी विक्षिप्त का अरण्य–रोदन मात्र माना । भारतीय राजनय की अवस्था यहाँ हास्यास्पद हो गई । यहाँ तक कि दिल्ली में नेपाल के शीर्ष नेताओं के राजनैतिक मुलाकात भी कोई रंग नहीं ला पायी । समग्र रूप में उनका चरित्र यह रहा कि दिल्ली में दिल्ली की तरह और नेपाल में आते ही छलावा और भेदभाव की नीति के संवाहक । अन्ततः भारतीय प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में वहाँ के विदेश सचिव एस. जयशंकर ने भी नेपाल की यात्रा की, उच्चस्तरीय राजनैतिक मुलाकातों में भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी का संदेश सुनाया । लेकिन उनकी यात्रा को भी शीर्ष नेताओं ने अपने वक्तव्यों द्वारा विवाद का विषय बना दिया ।
जिस रूप में भारतीय विदेश सचिव की यह यात्रा समाप्त हुई उससे तो यह साफ झलकने लगा था कि नेपाल के लिए आगे का मार्ग इतना सहज नहीं होगा, लेकिन परिस्थितियाँ इतनी जल्दी बदलेगी इस बात का अनुमान किसी ने नहीं किया था । शीघ्र निर्णय और कार्यान्वयन की नीति पर चलती दिल्ली की सरकार का मनोविज्ञान न समझते हुए उसे चिढ़ाने वाले कोई भी कदम नेपाल के लिए विधायी नहीं हो सकता, इस बात को त्रिदलीय उच्चपदस्थ नेतृत्व नहीं समझ सका । वे यह भी नहीं समझ पाए कि धृतराष्ट्र की तरह सत्ता का मोह पाल कर नवयुग की समस्याओं का संबोधन नहीं कर सकते । सत्ता का अन्धत्व आज के समय में सारी जनता को अन्धा बना कर नहीं रख सकता । महाशक्तियों को उकसाकर देश को समरभूमि में परिवर्तित करने की नीति अगर हमारे राजनैतिक दलों की है तो जनता आज न कल उनका साथ छोड़ेगी ही । जिस संख्याबल की दुहाई राजनैतिक दलों द्वारा नवसंविधान के पक्ष में दी जा रही है, इस कटु सत्य को समझना चाहिए कि असन्तुष्टि का प्रदर्शन कर रहे क्षेत्रों में आज वही जनप्रतिनिधि निर्बाध घूमने की अवस्था में नहीं है जिसे कभी जनता ने माथे पर बैठाया था ।
मधेश आन्दोलन की आज सबसे बड़ी शक्ति यह उभर कर सामने आयी है कि यह शांतिपूर्ण सहअस्तिव में विश्वास करता है । इतने लंबे आन्दोलन के बावजूद आमलोग सदभाव बनाए हुए हैं । जिस भाव से वे भूकंप के समय पीडि़त समुदाय के साथ अपने सहयोग का हाथ लेकर खड़े थे आज भी वे उसी मनोविज्ञान में हैं और इस आन्दोलन में उनकी मानसिक सहभागिता तलाश रहे हैं । लेकिन एक वर्ग ऐसा भी जो आग उगलने का काम कर रहा है । तथ्यों को तोड़–मरोड़कर प्रस्तुत करता है और अपव्याख्या भी करता है । लेकिन इसका एक खामियाजा निकल कर सामने आ रहा है कि तराई राजनैतिक दृष्टि से पूरी तरह विपरीत मनोभाव में है । केन्द्र की हर क्रिया यहाँ विपरीत प्रतिक्रिया दे रही है । इसके बावजूद बुद्धिजीवियों की एक जमात ऐसी भी है जो नब्ज को समझ रही है और इस आन्दोलन को सम्बोधित किए जाने की वकालत भी कर रही है । मधेश आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे नेता और इसमें सहभागिता दे रही जनता आज उनका उच्च मूल्यांकन कर रही है और उनके प्रति कृतज्ञता भी अभिव्यक्त कर रही है । अभी के तनावपूर्ण राजनैतिक हालात में उनका दायित्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि वे नकारात्मक वृत्तियों को रोकने में अपना अमूल्य वैचारिक योगदान दे ।
इस आन्दोलन के क्रम में आम लोगों का जो मनोविज्ञान सामने आया है उससे भारतीय राजनीति और राजनय को यह बात तो साफ–साफ समझ में आ गया होना चाहिए कि नेपाल में एक वर्ग ऐसा है जिनके पास उनके लिए आलोचना और गालियों के सिवा कुछ नहीं है और अगर उनकी आवाज कभी बदलती है या शांत होती है तो सिर्फ सत्ता के समीकरणों को साधने के लिए ही । लेकिन नेपाल की तराई में पारम्परिक रूप से निवास करने वाले लोग ‘बेटी–रोटी के सम्बन्धों’ को भावनाओं के स्तर पर अंगीकार कर उसे सौन्दर्य प्रदान करते हैं । यह भी सच है कि एक पीढ़ी यहाँ ऐसी भी है जिनमें राजनैतिक प्रभाव के कारण हो या किसी अन्य कारण ही, थोड़ी–बहुत विरोध की भावना प्रवाहित होने लगी थी । इस आन्दोलन की एक विशेषता यह भी रही कि भारत विरोध की इस भावना को इस आन्दोलन ने पूरी तरह से साफ कर दिया । आज भारत पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उसने अघोषित नाकाबन्दी कर रखी है लेकिन सीमा पर रह रहे लोग भली भाँति जानते हैंं कि मुख्य मार्ग पर अगर राजनैतिक दलों का धरना–प्रदर्शन है तो ग्रामीण रास्तों की नाकाबन्दी तो गाँवों के किशोर कर रहे हैं और वह भी स्वतःस्पूmर्त ढंग से ।
आज जो नेपाल की तराई में आन्दोलन चल रहा है उसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह पूरी तराई की चेतना को झकझोर कर रख दिया है । गाँव–गाँव में इसकी आग फैली हुई है । इसलिए शासन का चरम दायित्व है कि इसे शीघ्रातिशीघ्र सम्बोधित करे अन्यथा यहाँ से फैली नकारात्मकता और निराशा प्रतिक्रियात्मक रूप से देश को पुनः द्वन्द्व में धकेल सकती है । इस आन्दोलन की महत्वहीनता सिद्ध करने के लिए चाहे जितना ही कुतर्क दिया जाए लेकिन उसे खण्डित करने के लिए मधेश की वत्र्तमान पीढ़ी में भी आवाज और तर्क है । यह ऐसा आन्दोलन है कि इसमें दर्जनों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी है और सैकड़ों ने अपना रक्त बहाया है । इसे किसी भी देश के द्वारा प्रयोजित कह कर इस उत्सर्ग का अपमान किसी भी पक्ष से नहीं होना चाहिए । रही बात भारत की तो जब तक इस देश में समानता और सामाजिक न्याय की बात सुनिश्चित नहीं होगी, राजनीति का अर्थ देश की सुव्यवस्था और विकास नहीं होगा ‘ताली और गाली’ के बीच भारत–नेपाल सम्बन्ध आगे बढ़ता रहेगा ।

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