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अवध की रसीली होली :- सच्चिदानन्द चौवे

 

ऋतुराज बसंत का सबसे रसीला प्रेम सौहादर््र भरा यह पावन पर्व है होली। पाश्चात्य देशों में वर्षमें केवल एक दिन ‘प्रेम दिवस’ मनाने का प्रचलन है। व्रज में तो यह पूरे वर्षरहता है। ‘बारो मास वसत बसंत वरसाने में’। इस पावन पर्व पर लोग अपनी पुरानी वैमनस्यता, गिले-शिकवे भूलकर एक दूसरे को रंग-अबीर लगाते हैंर्।र् इष्र्या द्वेष की कलुषता को ‘होली’ की लपटों में विर्सर्जित कर देते हैं। गोबर से बने कण्डे- बल्ले, लकडÞी एवं नए अन्नों की बालियों की आहुति देकर अग्नि देव से पर््रार्थना करते है- ‘हे अग्नि देव ! आगामी महीने गृष्म ऋतु आ रही है अतः हमारी पकी हर्ुइ फसल, खेत खलिहान, घरों की छत-छप्परों पर कृपा बना

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