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चुनाव ! जहाँ नोट के बदले वोट बिकता आया है : .बिम्मीशर्मा

 

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बिम्मीशर्मा, वीरगंज ,२२ मार्च (व्यग्ँय) | अन्य देशों मे चुनाव ५ साल में एक बार आता है हमारे देश में यह २० साल में एक बार आता है । अब जो लेट या देरी से आए उसकी प्रतीक्षा भी उतनी ही ज्यादा होगी लोगों को । ईसी लिए अधी दशहरा और दिवाली का जैसा माहौल है । दशहरे में जिस तरह नए कपडे सिलाए जाते है उसी तरह चुनाव नाम के ईस महापर्व पर चुनाव को नए वस्त्र पहनाने के लिए निर्वाचन आयोग मतपत्र नाम का वस्त्र छापने का आदेश दे चूका है । पर चुनाव होगा कि नहीं यह संशय अभी भी बना हुआ है ।
जिस देश की जनता सडे और अच्छे टमाटर के बीच फर्क नही कर सकती । जिसे अच्छी तरह से सब्जी चुनना नहीं आता वह अपना भाग्य विधाता यानीकि नेता कैसा चुनेगी ? यह तो अभी तक राजस्थान के बारिश की तरह हुए चुनाव से पता चल जाता है । जनता भी अब बिकाउ है वह अपने वोट का प्रयोग सही आदमी का चुनाव करने में नहीं उस वोट को भजा कर अपनी अंटी को मालामाल करना चाहती है । ईसी लिए तो चुनाव में नोट के बदले वोट बिकता आया है ।
जिस देश में एक साल के अंतर में सरकार गठन होती विभिन्न जोड, घटाउ के माध्यम से । उस देश में चुनाव कि क्या जरुरत है । दो, चार लोग मिल कर नारे लगाओ किसी नेता के लिए और उसे टीका लगा कर पद पर बिठा दो । हो गया चुनाव ईतने ताम झाम कि क्या जरुरत है ? आखिर निर्वाचन से चुन कर आए नेता भी कौन सा तीर मार लेते है । काम मिला तो कुर्सी उठा पटक कर लेते हैं नही तो बेचारे बेकाम के संसद में उंघते रहते हैं । नेता और दल जितने खुश नहीं हैं उस से ज्यादा खुश जनता है । जनता मतलब जन्तु, विभिन्न राजनीतिक दल के पिछवाडे में खुंटे से बंधी पाल्तु पशु ही तो है जनता । जो दल का फेंका हुआ चारा खा कर उग्राती है और हमेशा नेताओं के हां में मुडीं हिलाती है । यह जनता कार्यकता नाम की विशेष जीव है जिसकी चमडी बहुत मोटी होती है । जो अपने आकाओं और बडे नेताओं का तलुआ चाट्ने में ही अपना जीवन सफल मानती है ।
चुनाव दरअसल नेताओं से ज्यादा कार्यकता और ईनके दलाल को लगता है । चुनाव के बहाने से ही महिनों तक शराब, शबाब और कबाब का दौर चलता है । बहुतों के ईसी चुनाव में वारे न्यारे हो जाते है । ईसी लिए चुनाव का यह बेसब्री से उगंली चट्काते हुए ईंतजार करते है । ईसी चुनाव में ईन के बाल, बच्चे पल जाते है । कच्चा मकान पक्का बन जाता है, घर में चापा कल लग जाता है । पत्नी की देह में नए सारी और जेवर आ जाते हैं । यह चुनाव न हुआ मुआ कुम्भ का मेला हुआ । जिस में सभी की चांदी ही चांदी है । ईसी लिए सब के होठों में एक ही सवाल है कब है चुनाव ?
जनता की ही खून, पसिने की कमाई जो वह कर के रुप में सरकार को देती है चुनाव के बहाने से खर्च किया जाता है । उस के सर पर उसी के लाठी से प्रहार किया जाता है चुनाव के बहाने से । पर जनता चूं भी नहीं कर पाती । जनता को लगता है कि यह मेला है वोट और नोट के खरिद फरोख्त का । ईसी लिए वोट के बहाने से जितना चाहे नोट को लूट लो । लुटाने वाले नेता हैं ही और लुटने के लिएजनता नाम की जन्तु हाजिर है । ईसी लिए यह चुनाव का बेसब्री से ईंतजार कर रहे हैं । आखिर ईस देश में चुनाव और संसद में सांसदों की नौटंकी के सिवाए देखने और मनोरंजन करने के लिएअन्य साधन है ही क्या ? चुनाव के बहाने से लोग कुछ महिने सूर्ती और खैनी मांड्ते हुए व्यस्त रहेगें ।
गाँव, चौपाल, नुक्कड हर जगह ईसी चुनाव के चर्चे हैं । लोगों को भले वोट देना या सही व्यक्ति चुनना न आता हो पर राजनीति और चुनाव की बात वह ऐसे करते है जैसे सबसे बडे सयाने वही हैं । सरकार भी चुनाव का ढिढोंरा तो खुब पिटती है पर अपने नागरिकों को सही और गलत का चुनाव कैसे करना है, वोट किस आधार पर किस को देनी है ईसका सलिका नहीं सिखाती । बस मीडिया में बजवा दिया की फंला, फंला दिन चुनाव है । अपने अधिकार का प्रयोग करे और सही प्रतिनीधि चूने ।  पर कैसा और काहे काअधिकार । जब सही व्यक्ति निर्वाचन में भाग नहीं लेगा, खडा नही. होगा तो चुनाव में वोट देना या न देना एक ही बात है । खराब व्यक्ति या नेता अच्छे लोगों को धकियाते हुए हासिए में फेंक देता है और जनता का वोट खरिद लेता है । तब कैसा चुनाव और क्यों  ?
यह चुनाव तो फगत एक नाटक है जनता की आखों पर धूल झोकंने का । बांकी सबको मालूम है बूथ कब्जा और वोट की खरिदारी या निलामी का । देखते और जानते सब है पर बोलता कोई कुछ नहीं । सबकी आंखो में नोट की पट्टी लगी हुई है । बहुत से लोगों के लिये चुनाव एक प्रकार का व्यापार है । कुछ लोग चुनाव को सट्टा या जुवा समझ कर अपना पैसा और भविष्य दोनों दावं पर लगाते है । मतपत्रों कि छपाई में हीकितनों को कमिशनमिलजाता है । यह ईस देश कादुर्भाग्यही है किजहां स्कूल में विद्यार्थीयों को पाठ्य पुस्तक समय पर छपाई हो कर उनतक नहीं पहुंचती वहां पर करोडों मतपत्र बहुत कम समय में चुनाव से पहले सही वक्त पर छप कर आ जाती है ।
स्कूल की शिक्षा और किताब से ज्यादा चुनाव और ईसके मतपत्र को ज्यादाबार पढ्ते होगें लोग ? चुनाव भी तो एक पाठशाला ही है शिक्षा हासिल करने के लिए । अठार साल के किशोर या युवाजमात को यह चुनाव सबसे ज्यादा आकर्षित करता है । अच्छे, बुरे अपने मताधिकार का प्रयोगतो सभी करते है पर सही व्यक्ति का चयन विरला ही कर पाता है । और वह बिरला व्यक्ति वही है जिसके पास बुद्धि के साथ विवेक भी हो । क्योंकि चुनाव में वोट के रुप में मतपेटिका में हम सब अपने विवेक का ही प्रयोग करते है ? पर नोट में अपने वोट को बेचने वाला क्या समझेगा चुनाव को ?

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