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संविधान, स्थानीय चुनाव और काला दिवस : गुरुशरण सिंह

 

गुरुशरण सिंह (आभाष),गोलबजार, 9 , सिरहा |  नेपाल के इतिहास को गौर से देखें तो, यहाँ सात दशकों मे सात संविधान बना है । बर्षों के रस्साकस्सी के बाद अन्ततोगत्वा २०७२ असोज ३ गते पहली बार आम जनता मार्फत संविधान जारी हुआ । वर्षो से उत्पीडित नेपाल के मधेसी जनताको भी इस संविधान से बहुत ज्यादा आशा थी लेकिन इस बार का संविधान भी पहली बार से कुछ खास नहीं आया । एक समुदाय का वर्चस्व स्थापित करवाने के ईरादे से ही इस संविधानको भी डिजाइन किया गया और फिर से एकबार मधेसी जनता को उपेक्षित किया गया । नेपाल के संविधान २०७२ को इतना विभेदकारी बनाया गया कि नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ मार्फत दिए हुए हक अधिकारो को भी छीन लिया गया ।

संविधान बनने के क्रम से ही मधेस में संविधान के प्रारम्भिक मसौदा के विरोध में भीषण आन्दोलन चल रहा था लेकिन नेपाल के मुख्य कहलाने वाला सत्तारूढ दलों के नेताओ सत्ता के मोह और संसदीय गणित के दम्भ मे एैसे लिप्त हो गए थे कि अपने ही देश के आधे से ज्यादा जनसंख्या मसौदा के विरुद्ध होते हुए भी शान्तिपूर्ण आन्दोलन के सहभागियों पर व्यापक दमन किया गया, गोली चलाकर हत्या की गई । राज्य के तरफ से गम्भीर मानव अधिकार का उल्लंघन करते हुए द्रुतगति मे रक्तरँजित संविधान घोषणा की गई जिसके फलस्वरुप कुछ ही महिनों मे संविधान निर्माणकर्ता द्वारा उपमा दिए गए संसार का सर्वोत्कृष्ट संविधान का संशोधन किया गया ।
नेपाल का संविधान २०७२ को कार्यान्वयन करने के लिए इसी माघ ८ ( २०७४ तक् तीनों तह का निर्वाचन करना है । संविधान कार्यान्वयन करने के लिए ७४४ स्थानीय तह में तीन तह के निर्वाचन करने का निर्णय किया गया जिसके अनुसार ५०८ स्थानीय तह ओर २,१०,९०,३६५ जनसंख्या रहे २ नम्बर प्रदेश सिवा अन्य प्रदेशों में पहले और दूसरे चरण में निर्वाचन सम्पन्न हुआ जिसका मधेस केन्द्रीत दलो द्वारा संविधान संसोधन ना किए जाने के कारण बहिष्कार किया गया। अब तीसरे चरण के चुनाव में २३६ स्थानीय तह और ५४,०४,१४५ जनसंख्या वाले २ नम्बर प्रदेश के लिए तय हुआ है जिसमे संशोधन बिना चुनाव बहिष्कार करने वाली पार्टी भी शामिल हो चुकी है । विभेदकारी संविधान का विरोध कर रहे मधेस केन्द्रित दल भी उसी रक्तरञ्जित संविधान को कार्यान्वयन करने के लिए हो रहे चुनाव मे भाग लेने के बाद, समग्र राष्ट्रीय एकता के पक्ष में रहे संविधान संशोधन के लिए ही खुद को कुरबान करने वाले ५४ वीर शहीदों की शहादत व्यर्थ करने पर पर तुला है । अौर फिर वो ६ महीना तक का आन्दोलन ओर नाकाबन्दी क्यों ? कहके उसी संघर्ष के अंग मधेसी जनता द्वारा ही सवाल उठ्ने लगा है । समग्र नेपाल अौर मधेस मामला के राजनितीक विश्लेषक भी, मधेस १० वर्ष पीछे चला गया कहते हुए विश्लेषण कर रहे हैं और मधेसियों को फिर शुरु से ही संघर्ष की आवश्यकता होगी ।
मधेस केन्द्रित दल चुनाव में जाते ही जब राज्यपक्ष मानने लगे कि मधेसी जनता भी इस संविधान को स्वीकार कर ली है तब एक युवा बुद्धिजीवी का संगठन तराई मधेस राष्ट्रिय परिषद द्वारा संविधान संशोधन बिना चुनाव मे सहभागी ना होने का संकल्प करते हुए माइतीघर मन्डेला मे जन प्रदर्शन किया गया अौर ये विभेदकारी अौर रक्तरञ्जित संविधान के विरुद्ध मे अभी भी मधेसी युवा बुद्धिजीवी का बडा जमात है कह कर राज्य पक्ष को सन्देश दिया है । मधेसीयो के लिए ईतिहास के ही सब से अन्धकार मय दिन रहा असोज ३, मधेस आन्दोलन में शहीद हुए उन अमर आत्माओं के बलिदानी, अधिकार प्राप्ति के लिए थी अौर अभी तक उनकी आवाज को संविधान मे जगह नहीं दी गई है । एक तरफ काला दिन मनाकर पूरी दुनियाँ को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि मधेस के लिए संघर्ष कर रहे राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव में जाने के बावजूद भी मधेस की एक बडी युवा जमात इस नश्लिय संविधान को स्वीकार नहीं किया है अौर अधिकार के लिए संघर्ष जारी है । दूसरी तरफ शहीदों की शहादत के सम्मान के लिए काला दिवस मनाना उपयुक्त रहेगा

 

यह भी पढें   जनता समाजवादी पार्टी,  नेपाल द्वारा संविधान में संशोधन के लिए 30 सूत्रीय सुझाव

नाम : गुरुशरण सिंह (आभाष)
गोलबजार, 9 , सिरहा

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