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बालेन की ईमानदारी की परीक्षा : क्या संघीयता पर किए वादे सिर्फ चुनाव जीतने के लिए थे ?

 

महेष कुशवाहा के सोशल मीडिया स्टेटस पर आधारित एक विस्तृत और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट 

काठमांडू, 24 जून, हिमालिनी डेस्क। नेपाल की राजनीति में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की हालिया जीत और सत्ता में आगमन के बाद एक नया वैचारिक मोड़ आ गया है। इस मोड़ ने न केवल पार्टी के भीतर की प्राथमिकताओं बल्कि इसके शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन) की राजनीतिक ईमानदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनकपुर का वो वादा और आम मधेसी का भरोसा

चुनावी अभियान के दौरान जनकपुर की धरती पर बालेन शाह ने जब स्थानीय लोकभाषा यानी ** मैथिली (colloquial Maithili)** में अपना भाषण दिया, तो उन्होंने मधेस के लोगों का दिल जीत लिया था। उस समय मधेसी समुदाय के सामने उनका सबसे बड़ा और स्पष्ट आश्वासन था—**नेपाल में संघीयता (federalism) को और मजबूत करना।**

बालेन शाह के इसी आक्रामक और आत्मीय रुख ने मधेस प्रदेश में RSP के पक्ष में जबरदस्त माहौल बनाया, जिसके परिणामस्वरूप पार्टी को वहां ऐतिहासिक और शानदार जीत हासिल हुई। लेकिन आज, चुनाव खत्म होने और सत्ता हाथ में आने के कुछ ही महीनों बाद, तस्वीर पूरी तरह बदलती दिख रही है।

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राजनीतिक दस्तावेज़ से ‘संघीयता’ गायब: यू-टर्न या रणनीति?

हाल ही में RSP द्वारा पारित एक राजनीतिक दस्तावेज़ ने मधेस के वोटरों को सकते में डाल दिया है। इस दस्तावेज़ में **प्रांतीय विधानसभा (provincial assembly) को भंग करने** का प्रस्ताव रखा गया है।

> इस दस्तावेज़ की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ (democratic republican) शब्द का बार-बार उल्लेख किया गया है, लेकिन **’संघीयता’ (federalism) शब्द को बहुत ही चालाकी से पूरी तरह नजरअंदाज या गायब कर दिया गया है।** प्रांतीय व्यवस्था को खत्म करने का सीधा मतलब नेपाल के मौजूदा संघीय ढांचे की नींव को हिलाना है।

ऐसे में जनता के बीच कुछ बेहद कड़वे सवाल उठ रहे हैं:

* **क्या वह सिर्फ एक चुनावी झूठ था?** क्या बालेन शाह ने मधेस का वोट बैंक हासिल करने के लिए संघीयता का खोखला वादा किया था?
* **क्या सत्ता मिलते ही रुख बदल गया?** क्या प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उनकी राजनीतिक सोच में बदलाव आ गया है?
* **या यह पार्टी के भीतर का वैचारिक मतभेद है?** क्या यह कोई ऐसा मुद्दा है जिस पर बालेन शाह और उनकी पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान चल रही है?

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वजह चाहे जो भी हो, मधेस की जनता, जिसने बालेन शाह के चेहरे और उनके वादों पर भरोसा करके अपनी किस्मत RSP को सौंपी, वह आज अपने नेता से एक स्पष्ट जवाब की हकदार है।

## संवैधानिक पेंच: क्या प्रांतीय विधानसभा को हटाना इतना आसान है?

तकनीकी और कानूनी रूप से देखा जाए, तो RSP के इस दस्तावेज़ में आश्वासन दिया गया है कि संविधान संशोधन की कोई भी प्रक्रिया मौजूदा संविधान की **धारा 274 और 275** के तहत ही पूरी की जाएगी। लेकिन यहीं पर एक बड़ा संवैधानिक पेंच फंसता है।

नेपाल के संविधान की **धारा 274** के अनुसार:

1. प्रांतीय सीमाओं में बदलाव या **अनुसूची 6 (Annex 6)** से जुड़े किसी भी विषय पर संशोधन विधेयक को संबंधित प्रांतीय विधानसभाओं में भेजा जाना अनिवार्य है।
2. प्रांतीय विधानसभाओं को तीन महीने के भीतर इस संशोधन को बहुमत से पास करना होगा, अन्यथा वह विधेयक स्वतः ही निष्क्रिय (void) हो जाएगा।
3. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि **अनुसूची 6 में प्रांतीय विधानसभा के अधिकार और उसकी स्वायत्तता की सूची शामिल है।**

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### निष्कर्ष: जनमत संग्रह या प्रांतीय सहमति अनिवार्य

इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि यदि RSP संवैधानिक तरीके से प्रांतीय व्यवस्था या प्रांतीय विधानसभाओं को पूरी तरह खत्म करना चाहती है, तो उसे खुद उन्हीं प्रांतीय विधानसभाओं से इसकी मंजूरी लेनी होगी जिन्हें वह हटाने जा रही है (जो कि व्यावहारिक रूप से असंभव लगता है)।

अगर प्रांतीय विधानसभाएं इसे खारिज करती हैं, तो संविधान की **धारा 275** के तहत पार्टी के पास केवल एक ही रास्ता बचता है—**इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर पूरे देश में जनमत संग्रह (Referendum) कराना।**

अब देखना यह है कि अपनी लोकप्रियता के दम पर देश की सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाले बालेन शाह मधेस के साथ किए गए अपने वादों पर टिके रहते हैं, या फिर अपनी ही पार्टी के इस नए एजेंडे के आगे घुटने टेक देते हैं। यह वाकई में बालेन की राजनीतिक ईमानदारी और साख की सबसे बड़ी परीक्षा है।

महेश कुशवाहा

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