Thu. Aug 6th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

#METOO – मैं अपनों के ही द्वारा बार–बार छली गयी : बिम्मी शर्मा

 

 वह कभी घर की नौकरानी पर मुँह मारता था तो कभी मुझ को पटाने की हर तरह से कोशिश करता था । वह शराब के नशे में चूर हो कर मुझे अपने गाल पर किस करने के लिए कहता मैं गुस्से से मना कर के वहां से हट जाती तो रात में मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाता

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,शिकारी या अपराधी अपनों के भेष में घर में ही छुपे होते हैं और हम बाहर वालों को दोष देते हैं कि फलां अपराधी है या बलात्कारी है । बचपन में जिन की गोदी में हम विश्वास से चढ़ते हैं और वह हमें दुलारते भी हैं । उस समय हमें पता नहीं होता कि यही गोदी एकदिन हमारे लिए जानलेवा सिद्ध होगी । मेरे साथ भी यही हुआ जब मेरी कथित बड़ी बहन की शादी हुई थी तब मैं बहुत छोटी थी । उस समय मेरी बहन के पति नाम का राक्षस घर आने पर मुझे गोदी में उठाता था और पुचकारता था ।

 

 

उस समय मुझे उस के हाथों के स्पर्श में छुपी गदंगी या बदनियति पता नहीं चली । पर जब मैं १५, १६ वर्ष की थी और काठमाँडू के जावलाखेल स्थित उन के डेरे पर गई थी । दर असल कथित बहन वीणा पोखरेल का बेटा जो उस समय करीब पांच साल का था । उस का हाथ फ्रैक्चर हो गया था । मैं और माँ उसे ही देखने गए थे । माँ कुछ दिन रह कर वापस चली आयी और मुझे बहन के बेटे को देखने के लिए वहीं छोड दिया । चैत्र का महीना था, हल्की ठंड अभी भी थी । शनिवार का दिन होने से सभी घर पर ही थे । मैं वीणा पोखरेल और उन के पति खगेन्द्र मणि पोखरेल रेडियो सुनते हुए वहीं बैठे थे । अचानक बहन के पति नाम के उस कमीने इंसान मेरे वक्ष पर हाथ रख कर हंसने लगा । साथ में मेरी बहन भी हंसने लगी । न उस ने अपने पति को रोका न टोका । मै लाज और शर्म से पानी पानी हो गई । मैंने डर के मारे यह बात किसी से भी नहीं बताई । मेरी नजर से वह कमीना आदमी उसी दिन से नीचे गिरने लगा था पर अभी तो उस के बहुत सारे अटैम्ट अफ रेप बाकी थे जो मुझे झेलने थे । उस के बाद मुझे जीजा साली का रिश्ता बहुत ही गंदा और घिनौना लगने लगा ।

 

उस के बाद मैं कालेज पढ़ने लगी और पढ़ाई में व्यस्त हो गई । २०५८ साल की बात है, राज दरबार हत्या कांड होने से कुछ दिन पहले की जेठ महीने की उमस भरी गर्मी थी । मैं शाम को नहा कर करोड़पति देख रही थी । उसी समय मेरा सबसे छोटा भाई बिमल शर्मा शराब के नशें में धुत हो कर आया जो हमेशा उसी रूप में रात को लड़खड़ाते हुए घर आता था । शराब पीने और जूवा खेलने में मशहूर बिमल शर्मा को कई बार उस के दोस्त घर तक पहुंचाने आते थे । कई बार वह नाली में ही लुढ़क जाता था । वहां से उठा कर उस को बाहर वाले घर पहुंचा देते थे । उस दिन भी वह एकदम नशे में था । उस के पैर सीधे नहीं हो रहे थे । वह आ कर दूसरे बिस्तर में बैठ गया और करोड़पति देखने लगा मैं भी गीले बाल झाडते हुए करोड़पति देख रही थी । अचानक उस ने तकिया मेरी और फेंका और हंसने लगा । उस की आंखो में कांईयापन साफ झलक रहा था । मेरे हाथ से कघीं गिर गई । उस की आंखों के गंदे हावभाव और उस की बोली से बदनियति साफ झलक रही थी । उस के बाद मैं कमरे से बाहर आ गई मैं माँ से गुस्सा हुई । माँ ने उस को डांट कर उसके कमरे में भेजा । उस के बाद मैं ६ महीने तक उस के कमरे में और न ही कमरे से सटे हुए किचन में ही गई । मेरा खाना नीचे ही आता था । उसके बाद कार्तिक में भाईदूज आया । मैंने बिमल शर्मा जैसे कमीने को भाईटीका लगाने से मना कर दिया । माँ के बहुत समझाने पर और बिमल शर्मा के माफी मागंने और ऐसा व्यवहार फिर न दोहराने की शर्त पर मैं भाईटीका के लिए राजी हुई । इस तरह मैं अपने घर में अपने भाई के हाथों से ही शिकार होते होते बची ।
२०६० साल में जब वीरगंज में एफएम खुलने वाला था तब उस में सात दिन कि ट्रेनिंग दी गई थी । मैंने भी वह ट्रेनिंग ली । उस के बाद मेरी उसी कथित बहन वीणा पोखरेल ने मुझे काठमाडूं आ कर एफएम में काम करने के लिए बारबार फोन किया । वह माँ को भी मुझे भेज देने के दिए बोलने लगी । काठमाडूं महानगर द्धारा संचालित मेट्रो एफएम में उस का कोई एकदम परिचित स्टेशन म्यानेजर था । जिस के चलते मुझे वहां आराम से काम मिल जाएगा । माँ ने भी मुझे कहा कि जब बड़ी बहन इतना बुला रही है तो एक बार काम कर के देख लो । मेरी किस्मत मुझे पत्रकारिता की तरफ खींच रही थी और मेरा दुर्भाग्य उस शैतान जीजा के पास धकेल रहा था । मैं मन न होते हुए भी २०६१ साल में बहन के यहां रहने गयी यानी कि अब मेरे बुरे दिन शुरु हो गए । जहां मैने पूरे एक साल किसी नर्क से ज्यादा यातना सही ।
खगेन्द्र मणि पोखरेल भी एक नबंर का शराबी, शबाबी और जुवाड़ी था । बीबी के आईएनजिओ में काम करने और देश विदेश के सैर के कारण उसकी शारीरिक क्षुधा पूरी नहीं हो पाती थी । इसी लिए वह कभी घर की नौकरानी पर मुँह मारता था तो कभी मुझ को पटाने की हर तरह से कोशिश करता था । वह शराब के नशे में चूर हो कर मुझे अपने गाल पर किस करने के लिए कहता मैं गुस्से से मना कर के वहां से हट जाती तो रात में मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाता । और आफिस से घर आने के बाद बिना पिए ही वह मेरे कमरे में आ कर कपड़े बदलने लगता और बिल्कुल नंगा हो जाता । उसे कोई लाज, शर्म या डर नही था । कई बार मैं उस को नौकरानी को पैसे दे कर पटाते हुए देख कर भी अनदेखा कर देती थी । वह सरकारी अफसर था तीन बच्चे थे, गाडी लेने आती थी पर घर में उस का रूप किसी पिउन से भी जाहिल और बदत्तर था ।
२०६१ साल आश्विन ११ गते सोमवार ईन्द्रजात्रा की छुट्टी के कारण वह घर पर ही था । उस की बीबी आफिस गई हुई थी शायद उस समय वह सेभ द चिल्ड्रेन में काम करती थी । १० बजे खाना खा कर मैं एफएम जाने के लिए तैयार हो रही थी । कपडेÞ बदल कर मैं बाल संवार रही थी । तभी उस ने मेरा हाथ पीछे से पकड़ लिया और बोला “आओ तुम और मैं साथ में सोते हैं” । मैं सुन कर सन्न रह गई मेरे हाथपैर कांपने लगे । उसी समय उसकी बीबी का फोन आया तो उसने बोला “मैं और बिम्मी साथ में सो रहे हैं” । उस के बाद मैं वहां से तुरन्त निकल गयी और दिनभर रास्ते में भटकती रही । कहां जाऊं, क्या करुं, कौन मेरी बात पर यकीन करेगा ? मैं उस दिन एफएम भी नहीं गयी । देर शाम को लौटी मेरा वहां बैठना खतरे से खाली नहीं था । मैनें एकदिन अपनी उसी बहन से बोला कि आप का पति दोगला है, आप के आगे मेरे साथ एक व्यवहार करता है और आप के पीछे दूसरा । आप के पति की नीयत ठीक नहीं है । पर बहन ने उल्टे मुझे डांटते हुए कहा कि तुमको मेरे पति बहुत प्यार करते हैं और तुुम गलत सोचती हो । दरअसल बहन की भी अपने पति से मिलीभगत थी वह आईएनजिओ के काम से ज्यादातर बाहर ही रहती थी । वह चाहती थी मैं उस के घर के काम को संभालते हुए उस के पति को भी हर तरह से खुश रखुं । दोनों मियांबीबी क यह बात घर की नौकरानी पवित्रा ने सुन ली थी उसी ने बाद में बताया । अपने पति के खराब चालचलन से बहन वाकिफ थी और देख कर भी अनदेखा करती थी । एकदिन उसी पवित्रा नाम की नौकरानी के साथ जब अपने पति खगेन्द्र मणि पोखरेल को रंगे हाथों पकड़ा तब उसने नौकरानी को तो घर से निकाल दिया पर अपने भ्रष्ट पति को कुछ नहीं कहा । इस बारे में आफिस के काम से काठमांडू आए हुए मैंने अपने मझले और छाटे भाइयों से उस कमीने जीजा की शिकायत करते हुए कहा कि यह आदमी ठीक नहीं है मुझे तंग करता है । तब उन लोगों ने मेरा साईड लेने की बजाय मुझे ही डांटा और कहा कि “तुम अपने जीजा के बारे में इतना घटिया सोचती हो । वह ऐसे बिल्कूल नहीं हैं ।”
जब हर तरह से प्रयास करने के बाद भी वह आदमी अपने ईरादे में सफल नहीं हुआ तो उसने अब मुझे शारीरिक की बजाय मानसिक यातना देनी शुरु कर दी । मुझे खाना न देना, मेरे पैसे गायब कर देना या चुरा लेना, जब मैं नहाने जाती तो वह आदमी टंकी का नीचे पानी आने का मेन भल्भ ही बंद कर देता था । मैं शाम को टीवी देखने लगती तो टीवी के आगे खड़ा हो जाता या टीवी ही बंद कर देता । या फिर उसी समय मुझे कुछ काम करने के लिए कहता । घर में सभी काम करने के लिए नौकरानी थी पर वह मुझे ही परेशान करता रहता । मैं शाकाहारी थी इसी लिए मुझे नानवेज खाने या छूने में घिन आती थी । तो वह आदमी चुपके से स्टिल के गिलास में हड्डी चिबा कर उस में रख देता था और मुझे उठाने या साफ करने के लिए बोलता था । कभी अंडा कटोरी में फेंट कर उस को साफ करने के लिए बोलता था । मै घिन मानती तो मुझे डांटता था । एकदिन तो हद हो गई उसने अपने चाय पीने के बाद उसी कप में गला खखार कर थूक दिया और मुझे उस कप को उठा कर साफ करने के लिए बोला ।
२०६२ साल जेठ की गर्मी में माँ मुझ से मिलने काठमांडू आई हुई थी । माँ और मैं रात में सोए हुए थे उस आदमी ने जोर से मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया । माँ समझ गयी कि इस आदमी की नीयत ठीक नहीं हैं तब माँ ने मुझे कहा “अब तुम यहां मत रहो, पत्रकारिता की बांकी पढ़ाई होस्टल में रह कर पूरा करो । क्यों कि उस समय मैं नेपाल प्रेस ईन्सिटच्यूट से जर्नलिजम में डिप्लोमा कर रही थी । तब मैं आषाढ ७ गते मंगलवार मैतीदेवी स्थित सूर्योदय गल्र्स होस्टेल रहने के लिए गयी । मैंउस दिन बहुत रोयी । सिनामंगल से मैतीदेवी टैक्सी से जाते हुए मेरे आंसू थम ही नहीं रहे थे । उस के बाद मैं होस्टल जा कर भी खुब रोयी और वीणा पोखरेल और खगेन्द्र मणि के नाम पर जलाजंली दिया कि आज से ये मेरे लिए मर गए । उस रात बाहर जोरो की बारिश हो रही थी और अंदर मैं रो रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे आसमान भी रो कर मेरे दुख में मुझे साथ दे रहा है । माँ ने और मैंने उनसे सारे सम्बन्ध तोड़ लिए । माँ ने वीणा पोखरेल को अपनी बेटी मानने से ही इंकार करते हुए कहा “मेरे अब ६ नहीं ५ बच्चे हैं” ।
इस के बाद २०६४ साल जेठ २६ गते शनिवार खगेन्द्र मणि पोखरेल मुझ से मांफी मांगने के लिए वीरगंज आया था । पर मैंने उसे घर में ही नहीं घुसने दिया और मुँह में थूक कर उस को गाली देते हुए वापस भेज दिया । उस के बाद वह जा कर मकालु होटल में ठहरा । २०६५ साल आश्विन में यातायात व्यवस्था विभाग के डायरेक्टर रहते हुए अपने टेबल पर ही घूस लेते हुए पकड़ा गया । जिसे टीवी में लाईभ दिखाया गया था और कान्तिपुर में भी उस के घोटाले के बारे में समाचार प्रकाशित हुआ था । बाद में वह निलंबन हुआ और रिटायर्ड भी । इस तरह उस के पाप का भांडा फूटा ।
(ये लेखिका के अपने अनुभव हैं)

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com