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सबाल्टर्न का सवाल : चन्दा चौधरी

 

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |मन तब दुखता है जब सुबह सुबह पत्रिका पढ़ने बैठती हूँ, कुछ अच्छी खबर पढ़ सकूँ इस सोच के साथ पत्रिका के पन्ने पल्टाती हूँ । परंतु ऐसा एक दिन भी नहीं कि जिस दिन यह खबर पढ़ने को न मिले कि दलित होने के नाम पर किसी को पीटा गया और प्रताडि़त किया गया । नेपाल की बड़ी बिडम्बना है ये । और सभ्य समाज के नाम पर काला कलंक । पिछले महीने सिरहा के लहान में कथित उच्च जाति के बच्चे के शरीर को छू देने के कारण ही एक बच्ची को उनके घर मे जा कर पीटने की घटना मीडिया के माध्यम से पढ़ने को मिला था । यह घटना महज एक प्रतिनिधीमूलक घटना है । क्यों नहीं कम हो रही हैं ऐसी घटनाएँ हमारे समाज से ? आखिर कबतक ऐसी परिस्थिति से गुजरना होगा हमें ? हम कब यह पाएंगे कि नेपाल दुनिया के लिए सभ्य समाज का एक उदाहरणीय देश है ? क्या यही नया नेपाल है ?
वैसे तो बिसं २०६३ मे ही देश छुआछूत मुक्त हो गया । दलित हक अधिकार की सुनिश्चितता के लिए कानून भी निर्माण किया गया जिसको निरन्तरता नेपाल के नए संविधान ने भी दिया है । परंतु यह भेदभाव का बीज समाज से हट नही रहा है । हमे इसकी ऐतिहासिक अन्त के बारे मे थोड़ी चर्चा करनी चाहिए । अवस्था अगर ऐसी ही रही तो न हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकते हैं और न ही समृद्धि को आमन्त्रण कर सकते हैं ।
कहा जाय तो नेपाल के शासकों की गलती के कारण हमें यह दिन देखना पड़ रहा है । इतिहास गवाह है कि नेपाल के एकीकरण के समय ही वर्ण के आधार पर विभेद का बीजारोपण किया गया था । दलिताें को सम्पत्ति और अधिकार से उसी वक्त से ही वंचित रहा है । हालांकि विभेद विश्व के हरेक देश मे था और है भी । परंतु जिस तरह हमारा देश आन्तिरिक विभेद के चपेट में है यह बहुत निन्दनीय है ।
१८वीं शताब्दी में बेलायत मे सेना, कर्मचारीतन्त्र और राजनीति सिर्फ उच्च घराने के लोगाें के लिए सुरक्षित किया जाता था । वहाँ के उत्पादन और सेवा क्षेत्र में सभी को प्रवेश करने की छूट थी । वहाँ पर औद्योगिक क्रान्ति होने से पहले एकाधिकार, विशेषाधिकार, बन्देज, नियन्त्रण, बहिष्करण की व्यवस्था हटायी गयी थी । परंतु, नेपाल मे पृथ्वीनारायण शाह के पाला में राज्य के माध्यम से आम जनता को देने वाली जमीन अर्थात बिर्ता सिर्फ पहाड़ी ब्राह्मण को प्राप्त हुआ । व्यापार में मुट्ठी भर व्यक्तियाें का एकाधिकार कायम रहा । और यह अवस्था अभी भी है ।
वैसे अब दलित और छुआछूत जैसे शब्दो से में परहेज रखती हूँ, हम सबको रखना चाहिए । लेकिन हमारी देश की वर्ण व्यवस्था ने अपनी जड़ अब तक जमा रखने के कारण इसके विरुद्ध की लड़ाई को आगे तक ले जाने की आवश्यकता है, कानून को व्यवहार मे लागू करवाते हुए । जिसके दौरान हमें इन शब्दों का उच्चारण करना पड़ जाता है, न चाहते हुए भी । अब थोड़ी चर्चा करे विभेद के इतिहास का । जिसके लिए पहले हमें सबाल्टर्न इतिहास की चर्चा करनी होगी ।
नेपाल मे भी सबाल्टर्न आन्दोलन का ५० वर्ष का इतिहास है । यह तीब्र रूप में आगे बढ़ रहा है । सबाल्टर्न का अर्थ हरेक अर्थ मे निचले स्तर के व्यक्ति की तरह या समुदाय को समझा जाता है । सबाल्टर्नवादियों के अर्थ में, सबाल्टर्न हैकमवादी, औपनिवेशिक तथा शासकों को लम्बे समय से दबाना और भेदभाव से उत्पीडि़त, शासित व्यक्ति वा निमुखा वर्ग को बताता है, जो कि शक्तिशाली होने के बावजूद भी कमजोर बनाकर रखा जाता है ।
जितना भी योगदान कर दे परंतु सबाल्टर्न का अपना इतिहास नहीं है । क्येंकि सम्भ्रान्त वर्ग सबाल्टर्न को अपना इतिहास बनाने नही देता । सबाल्टर्न के इतिहास लेखन मे सम्भ्रान्तो का बिचार स्वतः मंचन होता है । युँ कहें तो सम्भ्रान्तो के द्वारा सबाल्टर्न के इतिहास को छाया मे रख दिया जाता है । जो कि अतिनिन्दनीय एवं अन्यायोचित व्यवहार है । समाज के लिए काला धब्बों से भरा पुर्ण कार्य ।
नेपाल मे सबाल्टर्न वर्ग मे उत्पीडि़त, अछूत वर्ग को रखा गया है । लम्बे समय से यह वर्ग संघर्षरत है । खासकर कहे तो माओवादी जनयुद्ध के बाद से यह वर्ग अपने दर्द सहते आ रहे हैं । दक्षिण एसिया मे दलितवर्ग को सबाल्टर्न वर्ग के रूप में हिन्दू वर्णाश्रम व्यवस्था के संरचनात्मक संयन्त्र मे ढालने के कारण विश्व के दूसरे जग्ह की तुलना में नेपाल मे इसकी अलग विशेषता है ।
हम संविधान मे जातीय आधार पर किए जाने वाले विभेद को अपराध के रूप मे दर्ज किए है । परंतु दलितो के साथ होने वाले विभेद में आरोपित अपराधियों को सजा दिया गया ऐसा समाचार नही पढ पाते है । आखिर क्यों ? सरकार सीमांतकृत वर्ग एवं दलितो को राज्य के हरेक निकाय मे समावेशी और समानुपातिक व्यवस्था के माध्यम से स्थान देने की बात कहते हैं । लेकिन व्यवहार में नहीं लाते । क्यों ? इन सभी क्यों का का जवाब है ब्राह्मणवादी सोच । यहाँ मे ब्राह्मण वा किसी खास जाति के बारे में प्रश्न नहीं उठा रही हूँ अपितु मानसिकता की बात कर रही हूँ । ब्राह्म्णवाद एक ऐसी सोच है जो कि वर्णव्यस्था जैसी कुरीतियों को पीढ़ी दर पीढ़ निरन्तरता देती आ रही है । इसीलिए तो कानूनी व्यवस्था होने के बाबजूद भी हमारे समाज मे स्थान बनाने में सफल होते दिख रहे है ।
नेपाल के संविधानभाग २७ (२५४) में राष्ट्रीय दलित आयोग की व्यवस्था की गयी है । और काम कर्तव्य का क्षेत्राधिकार भी निर्धारित किया गया । इस आयोग का महत्व है । क्योंकि दलित सम्बन्धी घटना प्रत्येक दिन अधिक संख्या में घटित हो रहे हैं जिसमें से कुछ ही घटना बाहर आ पाती है । बहुत सारी घटनाएँ समाज के उच्च कहलाने वाले सम्भ्रान्तों के दबाब में समाज के भीतर ही दफना दी जाती है । दलितवर्ग अभी भी खुलकर बोल नहीं पाते हैं । प्रशासनिक निकाय मे उनकी पहुँच नहीं है । पुलिस प्रशासन के सामने जाने से डरते हैं । ऐसे में आयोग का स्थापना अगर जल्द हो पाती है तो इस संबैधानिक आयोग मे पीडि़त की सहज पहुँच हो सकती है । वे अपने पीड़ा खुल कर बयान कर सकते हंै । और आयोग अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर अनुसंन्धान करके राज्य को सिफारिश कर सकता है ।
अन्त में, हमें याद रखना होगा कि सन २०११ की जनगणना के मुताबिक नेपाल में १३.६ प्रतिशत जनसंख्या दलित है । हुनर के धनी माने जाने वाले समुदाय को अगर हम राज्य मे वंचित रखेंगे तो देश विकास की कल्पना करने की छूट तक भी नही है हमें । हमे अपनी सोच मे परिवर्तन लाने की आवश्यकता है । विभेद रहित समाज ही विकास का आधारशिला बन सकता है ।

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(लेखक चौधरी संघीय सांसद तथा राष्ट्रिय जनता पार्टी नेपाल के महासचिव हैं ।)

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