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चीन द्वारा वित्त पोषित केरुंग–काठमांडू रेलवेः एक दुःस्वप्न अनिल तिवारी

 

हिमालिनी  अंक अगस्त , सितंबर  2019 |प्रस्तावित महत्वाकांक्षी केरूंग–काठमांडू रेलवे परियोजना, जिसके अन्तर्गत केरूंग (चीन का तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र) और काठमांडू (नेपाल) के बीच ७२.२५ किलोमीटर लंबी हिमालय रेलवे लाइन बनाई जाएगी । इस परियोजना की लागत १२ अरब अमेरिकी डॉलर है, जो कि नेपाल के वार्षिक बजट के लगभग बराबर है । नेपाल को उम्मीद है कि चीन परियोजना को अनुदान के माध्यम से निधि देगा जबकि चीन को नेपाल से योगदान की उम्मीद है । लेकिन नेपाली राजनीतिक नेतृत्व ने योगदान के लिए अनिच्छा व्यक्त की है ।

इस परियोजना से आगे चलकर पोखरा और लुम्बिनी को जोड़ने के लिए रेलवे लाइन भी बिछाया जाएगा और इसे नेपाल के पर्यटन उद्योग के लिए संभावित पवनचक्की के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जहां लगभग २.५ मिलियन चीनी पर्यटकों को सालाना यात्रा करने की उम्मीद है, अगर रेलवे लाइन पूरी हो जाती है । परन्तु यह एक बहुत बड़ा सपना है, जिसके पूरे होने के आसार फिलहाल काफी कम लग रहे हैं । परियोजना पर संदेह और चिंता व्याप्त है क्योंकि भूवैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञों ने परियोजना की व्यावहारिकता पर गंभीर संदेह जताया है ।

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विश्वासघाती हिमालय पर्वत के कारण इस महत्वाकांक्षी रेलवे परियोजना के लिए कई सुरंगों और पुलों का निर्माण करना पड़ेगा । विशेषज्ञ इस तथ्य का उल्लेख करने में भी विफल नहीं हुए कि हिमालय पर्वत, भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और उत्तरी यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट के संयोजन पर स्थित है । चूंकि हिमालय और तिब्बती पठार इन दो टेक्टोनिक प्लेटों के बीच टकराव के परिणामस्वरूप बने थे, जो कि करीब ५० मिलियन साल पहले शुरू हुए थे और आज भी जारी है, यह एक भूकंप के खतरे वाला क्षेत्र है ।
हमें २०१५ के भूकंप के प्रकोप को कभी नहीं भूलना चाहिए जिसने हमारी विरासत संरचनाओं और हमारे अपने जीवन की नींव हिला दी थी । भूकंप ने हिमालय को भी हिला दिया जिसने सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में विनाशकारी हिमस्खलन पैदा किया । इस रेलवे परियोजना को शुरू करने से पहले दो बार सोचना हमारे पक्ष में होगा । काठमांडू में अब मुख्य और गंभीर बहस इस बात पर होनी चाहिए कि क्या यह रेल परियोजना तकनीकी और आर्थिक रूप से नेपाल के लिए संभव है । इस सवाल के अलावा, एक और ज्वलंत मुद्दा यह है कि क्या रेलवे परियोजना चीन से भारी ऋण के साथ या अनुदान÷सहायता के माध्यम से बनाई जाएगी । यदि चीन परियोजना के लिए ऋण देने का प्रस्ताव रखता है, तो यह निश्चित है कि हम चीनी के ऋणजाल में फस जाएंगे ।

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अर्थशास्त्री चिंतित हैं कि नेपाल का भविष्य भी लाओस, श्रीलंका और मालदीव के समान हो जाएगा, अगर उस पर चीन के भारी कर्ज का बोझ हो जाएगा । लाओस ने अपने ऋण को जीडीपी के ६८प्रतिशत तक पहुंचते देखा है और जिसके कारण चीन द्वारा बनाए जा रहे ६ बिलियन अमरीकी डालर के रेलवे प्रोजेक्ट के अपने हिस्से का भुगतान करने में उसे काफी कठिनाई होगी । इसी तरह, मालदीव भी जिसे चीन को वार्षिक भुगतान के रूप में ९२ मिलियन अमरीकी डालर देना है, एक ऋण जाल का सामना कर रहा है । हमारे नेताओं को इन परिस्थितियों से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिए और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसे सपने से भरे परियोजनाओं में निवेश करने से बचना चाहिए क्योंकि प्रथम दृश्य केरूंग–काठमांडू रेलवे परियोजना एक काफी महंगा, अविभाज्य और अनुत्पादक सौदा प्रतीत हो रहा है ।

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