9
September , 2010
Thursday
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laxmi narayan chauमधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया राणा शासक द्वारा पहाडÞ के लिए पहाडÞ माल-सवाल तथा मधेश के लिए मधेश माल-सवाल नामक दो कानून बनाकर एकीकृत नेपाल को दो भाग पहाड और मधेश के नाम से विभाजित कर देने के कारण मधेश के वस्तुतः कानूनी रुप में ही आ जाने की वजह से मधेश में रहनेवालों को मधेशी कहना कोई नई बात नहीं हैं । नेपाल को पहाड और मधेश दो नामाकरण करने के बावजूद पहाड के निवासियों जैसा व्यवहार मधेश के लोगों के साथ नहीं किया गया सिर्फमधेस माल-सवाल जैसा कानून मधेश के जगह जमीन तक ही सीमित रखा गया । पृथ्वी नारायण शाह ने भी नेपाल में ३६ जात की फूलवारी है यह कहकर उद्घोषण किया परन्तु राजा के दरबार में कभी भी मधेशी को स्थान नहीं दिया । यहाँ तक कि अपने को महान् प्रजातान्त्रिक बताने वाले राजा महेन्द्र ने तो मधेश का जंगल काटकर पहाडी लोगों को तर्राई में बसाया और उसका एकमात्र उद्देश्य तर्राईवासी को अल्पसंख्यक करना तथा भविष्य में मधेशी के बढते वर्चस्व को रोकना था । यहाँ तक कि उत्तरी सीमा से दक्षिण सीमा को जोडकर मधेशी राजनीतिक भविष्य को खत्म करने के उद्देश्य से राज्य को १४ अंचल तथा ५ विकास क्षेत्र में विभाजित किया गया । इतिहास गवाह है कि जहानिया राणा शासन के अन्त का आन्दोलन भी मधेस से ही उग्ररुप लिया और प्रजातन्त्र की स्थापना हर्इ । परन्तु मधेशी का स्थान दूसरे दर्जे का ही रहा । तर्राई की राजनीति में भी तर्राई में निवास करने वाले पहाडी मूल के व्यक्ति का वर्चस्व रहा । उस वर्चस्वशाली व्यक्ति के बीच कहीं लाचारीवश एक-आध मधेशी को समावेश किया भी तो वह अपवाद में ही हं और उस अपवादित व्यक्ति का स्थान भी सम्बन्धित क्षेत्र में दूसरे दर्जा का ही रहा हैं ।

२०४६ साल के जनआन्दोलन के द्वारा प्रजातन्त्र की पुनर्स्थापना हरुइ वह भी मधेश के कारण फिर भी मधेशी की समस्या के ऊपर तत्कालीन पार्टर् भी ध्यान नहीं दिया । संपर्ण् मधेशवादी दल भी शासन सत्ता के कारण मधेशी समस्या को ओझल में रख दिये । इतने सारे मधेशी दल होने के बावजूद मधेशी के सही विचार और अवधारणा का प्रतिनिधित्व नही हो पा रहा है । ऐसा देखा गया है कि मधेश और मधेशी को स्वार्थ सिद्धि का विषय बनाया गया है । तर्सथ मधेशी के लिए नहीं मधेशी पर राजनीति किया जा रहा है । यहाँ तक कि मधेश और मधेशी के बारे में गैर-मधेशी वादीपार्टर् उच्च आवाज उठाने में पीछे नहीं है । जबकि गैर-मधेशी दल का उद्देश्य बिलकुल स्वार्थ परक है । गैर-मधेशी दल में समाहित मधेशी नेता भी अपने दल में मधशी के विचार और भावना को सहीरूप से रखने में र्समर्थ नहीं हैं और यह समस्या ज्यों का त्यों रहा । इस बीच माओवादी पार्टर् मुल्क को आतंकित अवस्था में पहुँचाया । आतंकित करने के उद्देश्य से माओवादी ने विभिन्न क्षेत्र, क्षेत्रीयता, सम्प्रदाय, विभिन्न जाति के विकास को नारा बनाया । माओवादी ने भले ही अपने उद्देश्य पर्र्ति के लिए नारा लगाया परन्तु यह किसी न किसी रूप में वर्ग-सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता को संगठित होने मे सहायक ही रहा । जब माओ के उद्देश्य के विपरीत दूसरे संगठन को उभरते देखा परिणामतः माओवादी ने उसके वर्चस्व को खत्म करने के लिए अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया । फलस्वरुप तर्राई में माओवादी और मधेशी के बीच भीडÞन्त हुइ । मधेशी ने अपना वर्चस्व जमाया उस आन्दोलन में किसी पार्टर्वशेष का सहयोग नहीं था । वह मधेशी का स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन था । वह आन्दोलन अपने अस्तित्व और स्वामित्व का आन्दोलन था । मधेशी समुदाय के स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन का लाभ उठाने हेतु विभिन्न दल और उनसे सम्बन्धित कुछ लोग जैसे तमलोपा -महन्थ ठाकुर), मधेशी जनअधिकार फोरम -उपेन्द्र यादव) ने अपना नेतृत्व स्थापित करने का प्रयास किया । आर्थिक लाभ उठाकर मधशी पार्टर् गैर-मधेशी लोगों को स्थान देकर मधेशी आवाज को विफल बनाया गया । यह संकेत किसकी ओर है वह कहने की बात नही हं । इसके बावजूद भी मधेशी की पहचान, प्रतिनिधित्व और स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए संविधान बनाने की ओर अग्रसर होने की जगह अन्य पार्टर् तरह अपने को मधेश का मसीहा कहते नहीं थकने वाले नेता भी सत्ता-संर्घष् में अपने आप को समर्पित कर चुके हैं । विगत के इतिहास का हम मनन करें तो तर्राईवासी के हक-हित का जडÞ गहरायी तक पहुँचाने के लिए संविधान में जड जमाना होगा । संविधान में मधेशी का हक सुरक्षित होने के बाद मधेशी का भविष्य सदा के लिए उज्जवल हो जाएगा । यह समझने के लिए हमें सात समुन्द्र पार नहीं जाना पडेगा । अपने पडÞोशी देश भारत जहाँ आज दलित तथा निचले वर्ग के लोग भी बडे से बडे पद पर हैं, क्योंकि उनका हक संविधान में सुनिश्चित है । मधेश और मधेशी के हक-हित के बारे में आवाज उठाने या संर्घष् करने का अर्थ पहाड और पहाडी का विरोध करना नहीं हैं । अपना हक खोजने का अर्थ दूसरे की हकमारी है यह नहीं समझना चाहिये । हम अपनी भाषा के स्थान के लिए आवाज उठाते हैं तो इसका अर्थ यह नही हैं कि हम दूसरे की भाषा का अपमान करना चाहते हैं । हम उनकी भाषा-संस्कृति का सम्मान करते हैं, अपनी भाषा संस्कृति का विकास करना कोई गुनाह नहीं है । क्योंकि भाषा के कारण ही उपराष्ट्रपति को बरखास्त किया गया । कहा गया हमलोगों का अस्तित्व और स्वतन्त्रता !

यह सब तभी सम्भव है, जब हम एक हो । हमारी पहचान जात, धर्म वर्ग से न होकर मधेश से हो । साथ ही यह स्थापित करने के लिए मधेशी को हक-अधिकार, राज्य संचालन तथा नीति-निर्माण के हरेक अंग, तह और निकाय में ५० प्रतिशत मधेशी का समावेश करना होगा ।

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