कोरोना -कोरोना ! अति आधुनिक होने की सजा है कोरोना : अलका गोयनका
अलका गोयनका, नेपालगंज | कहते हैं कि अति हर एक चीज की बुरी होती है, आज दुनिया भर जो संकट मंडरा रहा है, वो इंसान की अति का नतीजा है, जंगल, नदी, पहाड़, झरने, सब को काट काट कर शहर बसाये, बड़े बड़े माल,सिनेमा हाल बनाए, शरीर से कुछ काम नहीं करने वालों और के लिए जिम् बनाए, कहीं समंदर में रास्ते बना दिए, कहीं नदियों में सुरंग, प्रकृति से इंसान की छेड़छाड़ की अति हो गई ।
और उस अति का भुगतान अब मानव जाति को करना पड़ रहा है, कभी सोचा नहीं था, कि कोई एक वायरस पूरी दुनिया की रफ्तार धीमी कर देगा, यही परिस्थिति रही तो आगे की तरफ दौड़ती दुनिया कई साल पीछे हो जाएगी। हम अपनी जमीन अपनी संस्कृति से जुड़े लोग भी आज, अपनी धरती छोड़ कर विदेश विदेश बसने की चाह रखते हैं, अपने बच्चों को मांसाहार खाने से इसलिए मना नहीं करते, कि कभी विदेश गया तो एडजस्ट करने में दिक्कत नहीं होगी, क्यो, क्योंकि सब की ये चाह होती है, कि एक बार उनका बच्चा विदेश जरूर जाए। अब समझ रहे होंगे कि हमारा देश, हमारी संस्कृति, हमारा खान-पान, दुनिया भर से बेहतर है।
चीन जैसा देश जहाँ मांसाहार के नाम पर हर जीव खाया जाता है, वहां से इस वायरस की उत्पत्ति शायद दुनिया को एक सबक दे जाये। दुनिया इस क्षति की वजह से तरक्की में बेशक पीछे हो जाएगी, पर इंसानियत शायद कुछ बढ जायेगी ।
हम कहते हैं ना कि भगवान जो करते हैं, अच्छे के लिए करते हैं, रात,दिन भागते, इंसान एक दूसरे से दूर हो चला था, खुद के लिए वक्त नहीं था, घर का खाना खा नहीं पाता था, या पसंद नहीं आता था। तो दुनिया वापस से पुराने दौर में वापस चली गयी, अब मजबूरन लोग घरों में है। ये कुछ समय लोग सब कुछ भूल कर बस अपनी, अपने परिवार की,अपने देश की सुरक्षा में लग गयें हैं ।
अति आधुनिक होने की सजा है कोरोना,
प्रकृति को नोचने की सजा है, कोरोना,
विदेश जाने का मोह है कोरोना,
अपनी संस्कृति से दूर होना है कोरोना,
निर्दोष प्राणियों की आह है कोरोना,
एक दूसरे को नीचा दिखाने की चाह है कोरोना,
इंसान से हैवान बनने की ललक है कोरोना,
मानवता के लिए, एक धनक है कोरोना,
सुलगती हुई धरती की, भभक है कोरोना,
अपनी संस्कृति से दूर होने की कसक है कोरोना,
विनाश सूचक एक तड़प है करोना,
दुनिया के लिए, एक बड़ा सबक है कोरोना,
फिर से एक नई दुनिया, बसाने की राह है कोरोना,

