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लड़की और नसीहत साथ-साथ पैदा होती हैं : सत्यकेतु

 

 दिलों काे झकझोरती सत्यकेतु की दो कविताएं ।

लड़की

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लड़की और नसीहत साथ-साथ पैदा होती है
ओंकार के रास्ते पर पत्थर रख
लड़की अपने लिए नकार लेकर आती है
उसका असली दोस्त उसके आंसू होते हैं
जो आमरण साथ निभाते हैं
उसे घड़ी-घड़ी दी जाती है
पिता की पगड़ी की दुहाई
मां की ममता की कसम
भाई के भविष्य का वास्ता
उसे सिखाया जाता है
झाड़ू मारना
आंगन लीपना
बर्तन मांजना
चूल्हा जलाना
गोबर पाथना
धीरे हंसना
मौके पर मुस्काना
नजर नीचे रखना
पैर दबाकर धीरे चलना
सबसे पीछे बचा-खुचा खाना
परिवार और समाज के लिए
उसका रोना महत्वहीन होता है
और खोना कलंक
उसकी चाहत अशुभ होती है
और पसंद खतरनाक
इसलिए गर्भनाल में ही बिछा दिया जाता है
उसके लिए नकार
और वह पैदा होती है नसीहत के साथ।

प्रेम

——-
प्रेम करना जहां गुनाह है
और बच्चे पैदा करना जुर्म
कितनी गर्म होगी वहां की हवा!
खिलने की कल्पना से ही
सिहर उठते होंगे फूल
कांपती होंगी कलियां;
दहशत कायम करने का सबसे सुगम उपाय है
लगाना हर तरह की अभिव्यक्ति पर लगाम
जड़ तत्व और तम गुण की पैदाइश
हुकूमत को मंजूर नहीं मुस्कान
आंखों में पानी;
मगर मुहब्बत को चाहिए स्वतंत्रता
हर उस बंधन से जो करती है
मस्तिष्क को निश्चेतन
हृदय को भावनाहीन,
जैसे पक्षियों को विचरने के लिए चाहिए
सारा आकाश
नहीं मंजूर उन्हें कोई बंधन
धरती उजाड़,
बुलबुलों के चहकने से
उमड़ती हैं भावनाएं
जगती है मन में आस
जो नहीं मानतीं फरमान
वहशी हुक्म,
जब घोर यातनाएं सहना
और सलाखों के पीछे जाना
लगता है आसान
महसूस होता है कैसा भी दंड कमजोर
तभी मन में जागता है संकल्प
और करता है कोई प्रेम।
रणविजय सिंह सत्यकेतु, हिन्दुस्तान, इलाहाबाद।

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