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राही कुछ भटक रहे मंजिलों की आस में, ढूंढ रहे हैं रोटियां तप्त बैसाख में : लालिमा घाेष

 

विवशता

आशंकाओं की छांव में
गुजर रहे हैं आज हम
विश्व के हर तरफ़
विवश है हर कदम।

त्राहि-त्राहि हो रही
यह कैसी परिस्थिति
हमें नहीं दिख रहा
कुछ निदान देश का।

हर तरफ नफरतें
गूंज रही चीख है
दिख रही दुर्दशा
समय आज विवश है।

बंद है द्वार आज
दिख रहे ताले हैं
लड़खड़ाते पांव में
पड़ रहे छाले हैं।

राही कुछ भटक रहे
मंजिलों की आस में
ढूंढ रहे हैं रोटियां
तप्त बैसाख में।

राजनीति की चपेट में
लड़ रहे हैं नेताओं
देश के नाजुक पलों में
आगे खड़े हैं योद्धाओं।

युद्ध की इस रणभूमि में
अभाव आज साज की
फिर भी ये निर्भीक होकर
लड़ रहे जंग आज की।

सचेत कब होंगे सब
चेतना कब आएगी
गरीबी इस देश की
समझ इन्हें कब आएगी।

अब इस व्यथित राष्ट्र की
शुभ घड़ी कब आएगी
मील के पत्थरों की भांति
बने आज हम भारतवासी।

लालिमा घाेष

हावडाऽ पश्चिम बंगाल

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