कहानी : सन्नाटा
डॉ. ममता शर्मा “अंचल”
जब से प्राध्यापक पद पर पदोन्नत हो दूसरे स्कूल में आई हूँ ,तभी से स्कूल आने-जाने के साधन की समस्या बनी हुई है । सड़क ऐसी हैं जैसे गरीब बच्चे के फ़टे कपड़ों में जगह-जगह पैबंद लगे हों। बड़े-बड़े गड्ढ़ों में से हमारी वैन ऐसे चलती है जैसे बचपन में बरसात के पानी में कागज़ की बनाई नाव हिचकोले खाते चलती थी।…. और उधर गाड़ी पांच मिनिट भी लेट हो जाये तो आते ही प्रिंसिपल की डांट ऐसे मिलती जैसे मंदिर में जाते ही पुजारी द्वारा दिया गया प्रसाद। इतने पर यह झेल रहे थे कि अब आये दिन वैन वाला धमकी देता पैसे बढ़ाओ नहीं तो कल से बंद कर दूंगा वैन लाना। हम बढ़ा भी दें तो दो-तीन माह बाद वैन वाले की वही रट। ऐसा लगता है जैसे कोई साहूकार बार- बार कर्ज का तकाजा करता हो।
कल मैंने सोचा कि पुराने स्कूल की वैन वाले से ही बात करूँगी वह बहुत भला लड़का था।समय का पाबंद और मेहनती इंसान। आज जब मैंने उसका नम्बर मिलाया तो उसका फोन बंद मिला। सोचा कि उसके पापा भी तो अलवर से अकबरपुर तक अलवर वाहिनी चलाते हैं उनसे ही उनके बेटे विक्रम के नम्बर ले लेती हूँ। मैं लालडिग्गी गई और अकस्मात ही सामने उनके पापा ही वैन में बैठे मिल गए।मैंने कहा नमस्ते अंकल जी! कैसे हैं आप?उन्होंने धीरे से गर्दन हिलाकर इशारा किया कि ठीक हूँ किन्तु बोल न पाए। मुझे आश्चर्य हुआ कि पहले तो ये जब भी कहीं मिल जाते थे तो हाथ जोड़कर हँसते हुए नमस्कार करते थे। खैर छोड़ो होंगे गर्मी से परेशान शायद।मैंने कहा- अंकल विक्रम के नम्बर दे दीजिए, मुझे उससे बात करनी है और गाड़ी लगवानी है। ये सुनकर वे धीरे से बोले-वह तो नहीं रहा अब।……मतलब अंकल जी?वह तो दो माह पहले ही गुजर गया। मैं सुनकर स्तब्ध रह गई। कंठ अवरुद्ध हो गया मेरा और आँसुओं ने पलकों की देहरी ऐसे लांघी जैसे बाढ़ तोड़ देती है हर पाल को।
बहुत ही मुश्किल से मैंने पूछा- क्या हुआ था उसे?
जी! उसने आत्महत्या कर ली!!!
क्या?????मात्र 30-31 साल का ही तो था और ऐसा…….
अब दोनों तरफ से आंखे हमें ऐसे भिगो गईं जैसे बादल कोई फटकर बरस गया हो। दोनों तरफ था सन्नाटा….सिर्फ सन्नाटा।



