बाजारवाद की चकाचौंध में, कहीं खो न जाए बचपन की मासूमियत ?
बिमल सरार्फ, रक्सौल, 16 अगस्त 2026 । बचपन जीवन का वह दौर है, जिसमें मन सबसे अधिक निर्मल, भावनाएँ सबसे अधिक सहज और कल्पनाएँ सबसे अधिक सुंदर होती हैं। यही मासूमियत आगे चलकर व्यक्तित्व, संस्कार और चरित्र की नींव तैयार करती है। लेकिन आज बाजारवाद, अत्याधुनिक जीवनशैली और तकनीक की बढ़ती निर्भरता के बीच यही मासूमियत धीरे-धीरे दबती और भटकती दिखाई दे रही है। बच्चों के हाथों में खिलौनों से पहले मोबाइल और कहानियों से पहले स्क्रीन आ गई है। यह बदलाव केवल जीवनशैली का परिवर्तन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के मानसिक और भावनात्मक विकास से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
मासूम उम्र को बहुत संभालकर रखना पड़ता है, क्योंकि इसी अवस्था में मन जिस दिशा में जाता है, व्यक्तित्व उसी दिशा में आकार लेने लगता है। यदि बचपन को प्रेम, संस्कार, अनुशासन और सकारात्मक वातावरण मिलता है तो वही बच्चा संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनता है। इसके विपरीत यदि उसका बचपन अकेलेपन, असंतुलित तकनीकी प्रयोग और नकारात्मक सामग्री के बीच बीतता है तो उसके मन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
आज एकल परिवारों का चलन बढ़ा है। माता-पिता स्वयं कामकाजी जीवन और भागदौड़ में व्यस्त हैं। ऐसे में बच्चों के पास भौतिक सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, लेकिन भावनात्मक संवाद और पारिवारिक समय कम हुआ है। कभी दादा-दादी की कहानियाँ बच्चों की कल्पना को दिशा देती थीं, माता-पिता का स्नेह उनके मन को सुरक्षा देता था और परिवार के संस्कार उनके व्यवहार को आकार देते थे। आज उसी स्थान पर मोबाइल फोन, टेलीविजन और इंटरनेट ने काफी हद तक कब्जा कर लिया है।
बच्चे स्क्रीन पर जो देखते हैं, उसे वे हमेशा कल्पना और वास्तविकता के अंतर के साथ नहीं समझ पाते। बालमन के लिए आभासी दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच अंतर करना आसान नहीं होता। इसलिए हिंसा, अश्लीलता, दिखावा और असंयमित व्यवहार से जुड़ी सामग्री उनके मन पर अनजाने में प्रभाव डाल सकती है।
आधुनिक तकनीक को दोष देना समाधान नहीं है। तकनीक शिक्षा, ज्ञान और रचनात्मकता का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब तकनीक बच्चों की जरूरत नहीं बल्कि उनकी आदत और फिर निर्भरता बन जाती है।
माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बच्चों को मोबाइल से केवल दूर रखने की कोशिश न करें, बल्कि उन्हें यह सिखाएँ कि मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग किस उद्देश्य से और कितनी सीमा तक किया जाना चाहिए। बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखने के साथ-साथ उनसे मित्रवत संवाद भी जरूरी है।
किशोरावस्था व्यक्तित्व निर्माण की अत्यंत संवेदनशील अवस्था है। इस समय शरीर में परिवर्तन के साथ विचारों, भावनाओं और इच्छाओं में भी तेजी से बदलाव आता है। यदि इस अवस्था में उचित मार्गदर्शन न मिले तो किशोर गलत संगति, नकारात्मक डिजिटल सामग्री, हिंसक प्रवृत्तियों, दिखावे और असंयम की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
आज समाज में बढ़ती हिंसा, अपराध, अश्लीलता और उपभोक्तावादी मानसिकता के बीच यह प्रश्न गंभीरता से उठाना होगा कि हम अपनी नई पीढ़ी को केवल आधुनिक बना रहे हैं या वास्तव में सक्षम और संस्कारित भी बना रहे हैं।
भारतीय परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं था, बल्कि मनुष्य का निर्माण करना था। गुरुकुल व्यवस्था में ज्ञान के साथ संयम, अनुशासन, आत्मनियंत्रण, सदाचार और जिम्मेदारी की शिक्षा दी जाती थी। आधुनिक समय में उसी भावना को नए रूप में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि समाज पुराने समय में लौट जाए। आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ भारतीय जीवन-मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं का संतुलन बनाया जाए।
बच्चों को महंगे खिलौनों से अधिक माता-पिता का समय चाहिए। उन्हें केवल अच्छी शिक्षा नहीं, बल्कि अच्छा व्यवहार भी चाहिए। उन्हें आदेश देने से अधिक संवाद की जरूरत है और मोबाइल देने से अधिक अपनेपन की आवश्यकता है।
माता-पिता यदि प्रतिदिन कुछ समय बच्चों के साथ बैठकर उनकी बातें सुनें, उनके प्रश्नों का उत्तर दें, उनके साथ खेलें और उन्हें परिवार के बुजुर्गों से जोड़ें तो बच्चे के भीतर सुरक्षा, आत्मविश्वास और संवेदनशीलता विकसित होगी।
बच्चों का बचपन केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय, समाज और मीडिया—सभी की इसमें भूमिका है। जिस समाज में बच्चों के लिए सुरक्षित, संस्कारित और सकारात्मक वातावरण तैयार किया जाता है, वही समाज भविष्य में मजबूत और संवेदनशील पीढ़ी का निर्माण कर सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की दौड़ में बच्चों के बचपन को पीछे न छोड़ दें। बाजार हमें वस्तुएँ दे सकता है, तकनीक हमें सुविधाएँ दे सकती है और आधुनिकता हमें गति दे सकती है, लेकिन बच्चों को संस्कार, संवेदना, अपनापन और चरित्र केवल परिवार और समाज ही दे सकते हैं।
मासूमियत को बचाना अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करना है। यदि आज हमने अपने बच्चों के मन को समझ लिया, उनके साथ समय बिताया और आधुनिकता के साथ संस्कार का संतुलन बना लिया, तो यही मासूम बचपन कल एक संवेदनशील, विवेकशील और जिम्मेदार समाज की सबसे मजबूत नींव बनेगा।

